विष्णु का अब तक का सबसे भयंकर रूप
विष्णु के 10 अवतारों में नरसिंह एकमात्र हैं जिनकी कथा सुनकर आज भी बच्चों की आँखें फटी रह जाती हैं और वयस्क हाथ जोड़ लेते हैं।
आधे मानव, आधे सिंह। आँखें लाल अग्नि सी। पंजे तलवार सम। दहाड़ से पहाड़ काँप उठे।
वे एक ही वरदान तोड़ने हेतु प्रकट हुए - वह वरदान जिसने हिरण्यकशिपु को व्यावहारिक रूप से अमर बना दिया था। और विष्णु ने यह रूप केवल इसलिए लिया क्योंकि एक 5 वर्षीय बालक ने हरि नाम जपना बंद नहीं किया।
नरसिंह जयंती 2026 सोमवार, 11 मई 2026 - वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को है। पूजा संध्या काल (सायं 4 – 7) में अनिवार्य - वही समय जब नरसिंह स्तंभ से प्रकट हुए थे।
जहाँ अधिकांश विष्णु पर्व कोमलता व कृपा मनाते हैं, नरसिंह जयंती उस क्षण को मनाती है जब कृपा प्रचंडता बन जाती है। शत्रु, मुकदमा, बुरी नज़र, काला जादू या खतरनाक यात्रा से डरने वाले भक्त रक्षा हेतु यह व्रत रखते हैं।
🙏 नरसिंह कवच मंत्र समस्त वैष्णव परंपरा का सबसे शक्तिशाली रक्षा मंत्र है - नरसिंह जयंती इसके 11-दिवसीय निरंतर जप आरंभ का श्रेष्ठ दिन है।
नरसिंह जयंती 2026 - तिथि, संध्या मुहूर्त व व्रत समय
📅 तिथि: सोमवार, 11 मई 2026 🕒 चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 10 मई 2026, सुबह 8:32 🕒 चतुर्दशी तिथि समाप्त: 11 मई 2026, सुबह 11:11
सर्वाधिक महत्वपूर्ण - संध्या पूजा: 11 मई, सायं 4:35 – 7:18 (वह समय जब नरसिंह प्रकट हुए) मध्याह्न संकल्प: सुबह 11:51 – दोपहर 12:46 श्रेष्ठ मंत्र जप समय: प्रातः-पूर्व (सुबह 4:30 – 5:30) व संध्या काल
संध्या काल क्यों अनिवार्य: हिरण्यकशिपु के वरदान में था - दिन या रात में मृत्यु न हो। नरसिंह ने उसे संध्या में मारा - वह क्षण जो न दिन है न रात। अतः नरसिंह जयंती पर सायं पूजा अनिवार्य। केवल प्रातः पूजा अधूरी।
व्रत प्रारंभ: 11 मई सूर्योदय (स्नान + संकल्प के बाद) व्रत पारण: 12 मई सूर्योदय (प्रातः नरसिंह आरती के बाद)
बचें: सोमवार राहु काल (सुबह 7:11 – 8:51) - इसमें संकल्प न लें। सुबह 9:00 बजे के बाद आरंभ करें।
हिरण्यकशिपु-प्रह्लाद कथा - विष्णु ने यह रूप क्यों लिया

हिरण्यकशिपु शक्तिशाली असुर राजा था। उसके भाई हिरण्याक्ष को विष्णु के वराह अवतार ने मारा। क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने प्रण किया - 'मैं विष्णु को मार दूँगा और उसके हर भक्त का अंत करूँगा।'
उसने इतनी कठोर तपस्या की कि स्वयं ब्रह्मा प्रकट हुए - 'क्या वरदान चाहिए?' हिरण्यकशिपु ने वरदान के नियम जानते हुए सावधानी से माँगा:
'आपकी रची किसी भी सृष्टि से मेरी मृत्यु न हो। न घर के भीतर, न बाहर। न दिन, न रात। न पृथ्वी, न जल, न आकाश में। न किसी अस्त्र-शस्त्र से। न मानव, न पशु। न देव, न दानव से।'
ब्रह्मा ने सब दे दिया। हिरण्यकशिपु अब व्यावहारिक रूप से अमर था।
उसने स्वयं को भगवान घोषित किया। राज्य में विष्णु नाम पर प्रतिबंध। 'ॐ नमो नारायणाय' जपते पकड़े जाने पर यातना व मृत्यु।
फिर उसका अपना पुत्र जन्मा - प्रह्लाद। गर्भ में ही प्रह्लाद ने नारद मुनि को माँ को विष्णु तत्व सिखाते सुना। बालक भक्त ही जन्मा।
5 वर्ष की आयु में प्रह्लाद 'हरि, हरि, नारायण' जपना न रोकता। हिरण्यकशिपु क्रोधित। उसने पूछा - 'ब्रह्मांड में सबसे बलवान कौन?' प्रह्लाद ने बिना संकोच - 'भगवान हरि।'
हिरण्यकशिपु ने अपने ही पुत्र की हत्या के प्रयास किए। पहाड़ से फेंका - हरि नाम जपते बच गया। विष पिलाया - अमृत बना। बहन होलिका (जिसके पास अग्नि-निरोधक चादर थी) को प्रह्लाद को जलाने भेजा - चादर प्रह्लाद पर उड़ी, होलिका जल गई (यही होली का मूल)। हाथियों से कुचलवाया - दाँत टूटे। नागों से डँसवाया - उन्होंने आलिंगन किया।
अंततः क्रोध में हिरण्यकशिपु ने सभा कक्ष के एक पत्थर के स्तंभ की ओर इशारा कर चीखा - 'कहता है तेरा विष्णु सर्वत्र? क्या इस स्तंभ में भी? सिद्ध कर!'
उसने लात मारकर स्तंभ तोड़ा।
टूटे स्तंभ से एक ध्वनि उठी - दहाड़ इतनी प्रचंड कि सात समुद्र हिल उठे। फिर धीरे-धीरे एक रूप प्रकट हुआ - आधा मानव, आधा सिंह। आँखें लाल। पंजे फैले। नरसिंह।
उन्होंने हिरण्यकशिपु को पकड़ा। सभा कक्ष की देहरी पर ले गए - न भीतर, न बाहर। संध्या की प्रतीक्षा की - न दिन, न रात। देहरी पर बैठे, हिरण्यकशिपु को अपनी जाँघ पर रखा - न पृथ्वी, न जल, न आकाश। वे न मानव थे न पशु - ब्रह्मा के वरदान से परे। और अपने पंजों से - न शस्त्र, न सजीव, न निर्जीव - हिरण्यकशिपु को विदीर्ण किया।
असुर चीखता हुआ मरा। प्रह्लाद अब भी क्रोधित नरसिंह के पास शांति से प्रणाम कर खड़ा हुआ। बालक का हाथ नरसिंह के अयाल पर - उन्हें शांत कर गया। नरसिंह ने प्रह्लाद के सिर पर हाथ रखा, उसे अगला राजा बनाया - और एक महान भक्त जिसके वंश में बाद में बलि भी आए।
शिक्षा - जब भक्त संकट में हो, भगवान प्रकृति का हर नियम तोड़ देते हैं।
नरसिंह जयंती पूजा विधि - चरणबद्ध

एक दिन पहले (त्रयोदशी - 10 मई): सूर्यास्त से पहले एक सात्विक भोजन। पूजा कक्ष स्वच्छ करें। नरसिंह की मूर्ति या मुद्रित चित्र तैयार करें (अधिमानतः लक्ष्मी-नरसिंह - शांत नरसिंह जिनकी जाँघ पर लक्ष्मी)।
चरण 1 - प्रातः स्नान व संकल्प (सुबह 5:30, 11 मई): सूर्योदय से पहले बाल्टी में कुछ बूँद गंगाजल मिलाकर स्नान। स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र। पूजा कक्ष में पूर्व मुख बैठें। संकल्प:
'मैं [नाम], इस वैशाख शुक्ल चतुर्दशी पर सभी शत्रुओं - दृश्य व अदृश्य - से रक्षा हेतु तथा परिवार के कल्याण हेतु यह नरसिंह जयंती व्रत धारण करता/करती हूँ। ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युर्मृत्युं नमाम्यहम्॥'
चरण 2 - मंत्र जप (प्रातः): दोपहर से पहले उपरोक्त नरसिंह महामंत्र का न्यूनतम 108 जप। संभव हो तो दिन भर में 11 माला (1188 जप)।
चरण 3 - फलाहार (दिन भर): अन्न, नमक (केवल सेंधा), प्याज/लहसुन वर्जित। अनुमत - फल, दूध, साबूदाना, मखाना। दिन में जागें। क्रोध, झूठ, कठोर वाणी से बचें।
चरण 4 - संध्या पूजा (सायं 4:35 – 7:18, 11 मई) - मुख्य पूजा:
- सूर्यास्त पर पुनः स्नान। ताज़े वस्त्र।
- नरसिंह मूर्ति को लाल वस्त्र पर चौकी पर स्थापित करें।
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक - फिर गंगाजल से।
- पीला चंदन + कुमकुम तिलक। लाल फूल अर्पण (विशेषतः लाल गुड़हल या कमल)।
- पंच-बत्ती घी दीया। धूप (चंदन उत्तम)।
- भोग - दूध + शक्कर + मेवा खीर, फल, पंचामृत। महाभोग - एक साबूत नारियल पूजा में नरसिंह के सामने तोड़ें।
- हिरण्यकशिपु-प्रह्लाद कथा सबको सुनाएँ। बच्चे साथ बैठें।
- नरसिंह कवच स्तोत्रम जप (शक्तिशाली रक्षा मंत्र - अगला खंड)।
- नरसिंह आरती से समापन।
चरण 5 - प्रतीकात्मक नारियल फोड़ना: यह नरसिंह जयंती की विशेषता। जैसे नरसिंह स्तंभ तोड़कर प्रकट हुए, नरसिंह के सामने नारियल तोड़ना घर में वही रक्षा शक्ति आमंत्रित करता है। नारियल पर कुमकुम, नरसिंह के सामने रखें, अनुमति लें, एक तेज़ प्रहार से तोड़ें। टुकड़े प्रसाद बाँटें।
चरण 6 - दान (अत्यंत अनुशंसित): तिल, लाल वस्त्र, स्वर्ण/ताम्र, खीर, गुड़ दान, या मंदिर भोजन प्रायोजन। नरसिंह जयंती दान 7 पीढ़ियों के दुष्ट कर्म नष्ट करता है।
चरण 7 - पारण (सुबह 5:30, 12 मई): स्नान, प्रातः नरसिंह आरती, पहले प्रसाद, फिर सात्विक भोजन (प्याज/लहसुन नहीं, बासी नहीं) से व्रत खोलें।
रक्षा, विजय व भय निवारण हेतु नरसिंह मंत्र
नरसिंह मंत्र सनातन धर्म के सर्वाधिक शक्तिशाली रक्षा मंत्र हैं। संकल्प से आरंभ - 'मैं [नाम/परिवार/घर/कार्य] की समस्त दृश्य व अदृश्य शत्रुओं से रक्षा हेतु जप करता/करती हूँ।'
1. नरसिंह महामंत्र (सर्वाधिक महत्वपूर्ण - जयंती पर 108 बार) ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युर्मृत्युं नमाम्यहम्॥ → उग्र, वीर, सर्वशक्ति महाविष्णु को नमन - स्वयं मृत्यु की मृत्यु।
2. नरसिंह बीज मंत्र (आकस्मिक संकट हेतु) ॐ क्षौं नमः → एकाक्षरी बीज मंत्र। संकट का आभास हो तो 108 जप। संस्कृत ध्वनि 'क्षौं' में स्वयं नरसिंह की दहाड़ निहित।
3. नरसिंह गायत्री मंत्र ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि। तन्नो नृसिंहः प्रचोदयात्॥ → योद्धा चेतना जागृत। कानूनी विवाद, अन्याय, कार्यस्थल पर शोषण झेलने वालों हेतु सर्वश्रेष्ठ।
4. नरसिंह 32-अक्षरी मंत्र (गंभीर संकट हेतु) ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा। → काला जादू, बार-बार दुर्भाग्य या आध्यात्मिक आक्रमण की आशंका हो तो जप। न्यूनतम 11 बार।
5. नरसिंह कवच बीज (दैनिक धारण रक्षा) ॐ ह्रीं नमो भगवते नरसिंहाय ज्वालामालिने दीप्तदंष्ट्राय अग्निनेत्राय सर्वरक्षोघ्नाय सर्वभूत-विनाशनाय सर्वज्वर-विनाशनाय दह दह पच पच रक्ष रक्ष ह्रौं ह्रीं फट् स्वाहा। → पूर्ण नरसिंह कवच। अनेक भक्त इसे छोटे कागज पर लिखकर ताम्र लॉकेट में धारण करते हैं।
🎧 पाँचों मंत्र संस्कृत + हिंदी + अंग्रेजी अर्थ + वैदिक उच्चारण के साथ वंदना ऐप पर उपलब्ध। नरसिंह जयंती सुबह 4:30 बजे बीज मंत्र लूप पर लगाकर आरंभ करें।
नरसिंह जयंती पर क्या करें, क्या न करें
✅ अवश्य करें:
- सूर्योदय से पहले उठें (ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:30)
- मंत्र जप समय न्यूनतम 1 घंटा पूर्ण मौन
- हिरण्यकशिपु-प्रह्लाद कथा बच्चों को सुनाएँ - यह उन कुछ पर्वों में है जिसे शास्त्र निर्भय भक्त बनाने हेतु 'बच्चों का पर्व' मानते हैं
- लाल, पीले या केसरिया वस्त्र - नरसिंह के रंग
- संध्या पूजा में मूर्ति के सामने नारियल फोड़ें (प्रतीकात्मक स्तंभ)
- ब्राह्मण को दान, विशेषतः लाल वस्त्र + मिठाई + गुड़
- सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक (24 घंटे) निरंतर घी दीया
- पास हो तो नरसिंह मंदिर दर्शन - अहोबिलम (AP), सिंहाचलम (विजाग), यादगिरिगुट्टा (तेलंगाना) प्रमुख नरसिंह क्षेत्र
❌ कठोरता से बचें:
- अन्न, नमक, प्याज, लहसुन, मसूर, बैंगन, इमली नहीं
- क्रोध, कठोर वचन नहीं - अकुशल कर्मचारी या असभ्य अजनबी पर भी (यही नरसिंह व्रत का कठिनतम अनुशासन - स्वयं की उग्र रसना नियंत्रण)
- बाल, नाखून, दाढ़ी न काटें
- काले या भूरे वस्त्र नहीं
- शमशान/अंत्येष्टि नहीं
- मुकदमा, लड़ाई आरंभ नहीं (दिन की ऊर्जा जो आरंभ करें उसे बढ़ाती है - रक्षा प्रार्थना आरंभ करें, युद्ध नहीं)
- बासी, बाहर का, लहसुन-युक्त भोजन नहीं
मुकदमा/शत्रु झेल रहे विशेष उपाय: संध्या काल में नरसिंह के सामने तिल तेल दीया, 'ॐ क्षौं नमः' बीज मंत्र 1008 बार जप। स्कंद पुराण में यह एक अनुष्ठान सबसे शत्रु स्थिति को आपके पक्ष में बदलता है।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
क्या उग्र नरसिंह मंत्र घर में जपना सुरक्षित है?+
हाँ, पूर्णतया सुरक्षित - और अत्यंत शुभ। नरसिंह की 'उग्रता' भक्त की रक्षा हेतु है, आपके लिए संकट नहीं। नरसिंह मंत्रों की ऊर्जा घर पर रक्षा कवच बनाती है। उग्र मंत्र से पहले सदैव लघु लक्ष्मी-नरसिंह (शांत रूप) पूजा करें - यह ऊर्जा संतुलित करती है। गर्भवती 'ॐ क्षौं नमः' जप सकती हैं, पर लंबा 32-अक्षरी मंत्र नहीं।
नरसिंह पूजा संध्या (सायं) में ही क्यों, प्रातः क्यों नहीं?+
क्योंकि हिरण्यकशिपु के वरदान में दिन व रात मृत्यु निषिद्ध थी - संध्या देहरी समय है, न दिन न रात। नरसिंह ठीक इसी समय प्रकट हुए। उसी देहरी समय पर पूजा वह ब्रह्मांडीय क्षण दोहराती है जब नरसिंह जन्मे, ऊर्जा कई गुना। प्रातः पूजा पूरक है, विकल्प नहीं। प्रातः पूजा न कर सकें, पर जयंती पर संध्या पूजा कभी न छोड़ें।
क्या यह सच है कि नरसिंह काले जादू व नज़र से रक्षा करते हैं?+
हाँ - नरसिंह नकारात्मक ऊर्जा (काला जादू, नज़र/दृष्टि, तांत्रिक आक्रमण, दुःस्वप्न) से रक्षा हेतु सर्वोच्च देव माने जाते हैं। उच्च-जोखिम वाले व्यवसायों (पुलिस, न्यायाधीश, सर्जन, राजनेता) में लोग इसी कारण दैनिक नरसिंह कवच जपते हैं। निरंतर रक्षा हेतु - बीज मंत्र 'ॐ क्षौं नमः' छोटे कागज पर लिखें, ताम्र लॉकेट में रखें, गंगाजल से शुद्ध कर दैनिक धारण करें।
क्या मैं मंदिर गए बिना नरसिंह व्रत कर सकता/सकती हूँ?+
हाँ - अधिकांश नरसिंह जयंती व्रत घर पर ही होते हैं। केवल स्वच्छ पूजा स्थान, नरसिंह चित्र या मूर्ति, व पूजा विधि सूची की वस्तुएँ चाहिए। नरसिंह मंदिर दर्शन अतिरिक्त पुण्य देता है पर अनिवार्य नहीं। पास नरसिंह मंदिर न हो तो संध्या में किसी विष्णु/कृष्ण मंदिर जाएँ।
नरसिंह जयंती व होलिका दहन में क्या संबंध है?+
दोनों पर्व एक ही प्रह्लाद कथा से। होलिका (हिरण्यकशिपु की बहन) ने प्रह्लाद को जलाने का प्रयास किया, स्वयं जल गई - वह रात्रि होलिका दहन। दो माह बाद नरसिंह स्तंभ से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का वध - वह संध्या नरसिंह जयंती। अतः होलिका दहन भक्त की अग्नि से रक्षा मनाता है, नरसिंह जयंती असुर के नाश को। मिलकर ये प्रह्लाद की पूर्ण कथा बनाते हैं।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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