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संत तुकाराम - जीवन कथा, अभंग और विट्ठल भक्ति
Spiritual Wisdom

संत तुकाराम - जीवन कथा, अभंग और विट्ठल भक्ति

10 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 10, 2026
RS

By Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

Reviewed by Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

संत तुकाराम कौन थे?

संत तुकाराम (लगभग 1608-1650) सत्रहवीं शताब्दी के महान भक्त संत थे, जिनका जन्म महाराष्ट्र में पुणे के पास इंद्रायणी नदी के किनारे बसे देहू गाँव में हुआ। उनका पूरा जीवन विट्ठल की भक्ति में बीता, जिन्हें विठोबा या पांडुरंग भी कहते हैं - पंढरपुर में ईंट पर खड़े भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय रूप। तुकाराम वाणी (व्यापारी) परिवार में जन्मे थे, पर संसार उन्हें व्यापार के लिए नहीं, उनके अभंगों के लिए याद करता है - मराठी में रचे छोटे, हृदय को छू लेने वाले भक्ति गीत जिन्हें किसान, माताएँ और मजदूर काम करते हुए गा सकते थे। वे वारकरी संप्रदाय के सबसे उज्ज्वल संतों में से एक बने - वह परंपरा जिसके यात्री हरिनाम गाते हुए पंढरपुर की पैदल यात्रा करते हैं। महाराष्ट्र के लिए वे बस तुकोबा हैं - वह संत जिन्होंने सिद्ध किया कि गहनतम आध्यात्मिक सत्य रसोई और खेत की भाषा में भी कहा जा सकता है।

प्रारंभिक जीवन और वे दुख जिन्होंने भक्ति की ओर मोड़ा

तुकाराम का सांसारिक जीवन उनके आध्यात्मिक जीवन के आरंभ से पहले ही टूट चुका था। किशोरावस्था में माता-पिता का देहांत हुआ और परिवार की दुकान तथा लेन-देन का भार उनके युवा कंधों पर आ गया। फिर आया 1629-30 का भीषण अकाल। उनकी पहली पत्नी रखुमाबाई और छोटे पुत्र की मृत्यु हो गई, फसलें नष्ट हुईं, व्यापार डूब गया और जो पड़ोसी कभी परिवार का सम्मान करते थे, वे उपहास करने लगे। परंपरा कहती है कि यही गहन दुख उनके जीवन का मोड़ बना। तुकाराम भामनाथ और भंडारा पहाड़ियों के एकांत में चले गए, जहाँ वे दिनों तक विट्ठल का नाम जपते रहे। लौटे तो बदले हुए व्यक्ति थे। उन्होंने गरीब ग्रामीणों के कर्ज के कागज निकाले और इंद्रायणी नदी में बहा दिए, उन्हें सदा के लिए मुक्त कर दिया। व्यापारी ने संसार से अपना हिसाब बंद कर भगवान से खाता खोल लिया था।

उनके अभंग - हर भक्त के जानने योग्य पंक्तियाँ

अभंग का शाब्दिक अर्थ है 'अखंड' - ऐसा गीत जिसकी भक्ति-धारा को कोई तोड़ न सके। तुकाराम ने हजारों अभंग रचे, जो आज तुकाराम गाथा के रूप में संकलित हैं। तीन प्रिय उदाहरण उनका हृदय दिखाते हैं। उन्होंने गाया, 'जे का रंजले गांजले, त्यासी म्हणे जो आपुले' - 'जो दुखी और पीड़ित को अपना कहे, उसे ही सच्चा साधु जानो, क्योंकि उसी में भगवान बसते हैं।' दूसरे अभंग में समर्पण सिखाया: 'ठेविले अनंते तैसेचि रहावे, चित्ती असो द्यावे समाधान' - 'अनंत ने जैसा रखा है वैसे ही रहो, और हृदय में संतोष बसने दो।' और आनंद में उन्होंने घोषणा की, 'आनंदाचे डोही आनंद तरंग' - 'आनंद के सरोवर में आनंद की ही लहरें उठती हैं।' तुकाराम के लिए भगवान कोई दूर का विचार नहीं थे; विट्ठल उनकी माता, मित्र और अंतिम आश्रय थे, जिनसे वे रोजमर्रा की सहज, अपनेपन भरी मराठी में बातें करते थे।

गाथा और इंद्रायणी नदी - परंपरा में अमर परीक्षा

गाथा और इंद्रायणी नदी - परंपरा में अमर परीक्षा

तुकाराम का बढ़ता प्रभाव उस समय के कुछ रूढ़िवादी विद्वानों को अखरने लगा। उनका तर्क था कि एक सामान्य व्यापारी आम मराठी में वेदों के सत्य कैसे कह सकता है? परंपरा के अनुसार रामेश्वर भट्ट ने आदेश दिया कि तुकाराम के अभंगों की पोथियाँ इंद्रायणी नदी में डुबो दी जाएँ। तुकाराम ने आज्ञा मानी, अपने जीवन भर की रचनाएँ जल में रख दीं और फिर नदी किनारे उपवास और प्रार्थना में बैठ गए कि विट्ठल स्वयं निर्णय करें। तेरह दिनों तक वे अन्न-जल त्यागकर अपने प्रभु को पुकारते रहे। भक्तों की मान्यता है कि तेरहवें दिन पोथियाँ नदी की सतह पर सूखी और अक्षत अवस्था में ऊपर आ गईं - प्रभु ने सत्य को डूबने नहीं दिया। रामेश्वर भट्ट नतमस्तक होकर उनके प्रशंसक बन गए। संदेश आज भी जीवित है: शुद्ध भक्ति से जन्मे शब्दों को कोई सांसारिक सत्ता नष्ट नहीं कर सकती।

वारकरी संप्रदाय और वारी यात्रा

तुकाराम वारकरी संप्रदाय के संत हैं - 'वारी करने वालों की परंपरा'। वारकरी वह है जो वारी करता है - पंढरपुर की नियमित पैदल तीर्थयात्रा, विशेषकर आषाढ़ी एकादशी (जून-जुलाई) और कार्तिकी एकादशी पर। आज भी लाखों भक्त संतों की पादुकाएँ ले जाने वाली पालकियों के पीछे कई दिनों तक पैदल चलते हैं - आलंदी से संत ज्ञानेश्वर की पालकी और देहू से संत तुकाराम की - ताल और मृदंग की थाप पर अभंग गाते हुए। हर वारकरी तुलसी की माला पहनता है, सादा सात्विक भोजन करता है और साथी यात्रियों को विट्ठल का ही रूप मानकर प्रणाम करता है। वारी जाति और हैसियत के भेद मिटा देती है: सब साथ चलते, गाते और भोजन करते हैं। तुकाराम एक दिव्य परंपरा की कड़ी हैं - ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और फिर तुकोबा - इसीलिए पूरी यात्रा एक ही जयघोष से गूँजती है: 'ज्ञानोबा-तुकाराम!'

सदेह वैकुंठ गमन - जैसा परंपरा कहती है

तुकाराम की इस संसार से विदाई भी एक गीत की तरह कही जाती है। 1650 में फाल्गुन वद्य द्वितीया के दिन - जो हर वर्ष तुकाराम बीज के रूप में मनाया जाता है - उन्होंने देहू में भक्तों को अंतिम कीर्तन के लिए एकत्र किया। परंपरा कहती है कि गाते-गाते एक दिव्य विमान उतरा और तुकाराम सदेह वैकुंठ ले जाए गए - यही सदेह वैकुंठ गमन है। उनका विदाई अभंग आज भी आँसुओं के साथ गाया जाता है: 'आम्ही जातो आमुच्या गावा, आमुचा राम राम घ्यावा' - 'अब मैं अपने गाँव जाता हूँ; मेरा राम-राम स्वीकार करो।' देहू में भक्तों की मान्यता है कि हर तुकाराम बीज पर मंदिर के पास का नांदुरकी वृक्ष उसी क्षण काँप उठता है। इसे जैसे भी समझें, महाराष्ट्र ने तुकाराम के लिए कभी 'मृत्यु' शब्द नहीं कहा - केवल यही कहा कि तुकोबा अपने घर चले गए।

आज के भक्त के लिए संत तुकाराम की सीख

आज के भक्त के लिए संत तुकाराम की सीख

तुकाराम का जीवन आज के भक्त से सीधे बात करता है। पहला, दुख रास्ते का अंत नहीं है; वह भगवान तक पहुँचने का द्वार बन सकता है, जैसे अकाल की हानियाँ उनके लिए बनीं। दूसरा, भक्ति के लिए कोई योग्यता नहीं चाहिए - न संस्कृत, न पुरोहिताई, न धन - केवल सच्चाई और हरिनाम, जिसका नामस्मरण वे जीवन भर करते रहे। तीसरा, सच्ची आध्यात्मिकता करुणा में प्रकट होती है; कर्ज के कागज बहाने वाले संत ने सिखाया कि दुखियों की सेवा ही पूजा है। चौथा, जब संसार उपहास करे तब भी डटे रहो; नदी ने स्वयं उनके गीत लौटा दिए। सरल शुरुआत करें: प्रतिदिन कुछ मिनट विट्ठल या प्रभु का कोई भी नाम लें, एक अभंग या भजन पूरे ध्यान से गाएँ, और किसी एक संघर्षरत व्यक्ति को अपना मानें। तुकोबा कहते, यही पूरी वारी है - हृदय के भीतर चली हुई।

त्वरित उत्तर

संत तुकाराम कौन थे और वे कब हुए?+

संत तुकाराम (लगभग 1608-1650) पुणे के पास देहू गाँव के मराठी भक्त संत थे। व्यापारी परिवार में जन्मे तुकाराम वारकरी संप्रदाय के महानतम संत-कवियों में गिने जाते हैं। वे पंढरपुर के भगवान विट्ठल के अनन्य भक्त थे और उनके हजारों अभंग तुकाराम गाथा में संकलित हैं।

अभंग क्या होता है?+

अभंग वारकरी परंपरा का मराठी भक्ति गीत है; शब्द का अर्थ है 'अखंड' - भक्ति की ऐसी धारा जिसे कोई तोड़ न सके। तुकाराम के अभंग गाँव की सरल भाषा में विट्ठल के प्रति गहनतम प्रेम व्यक्त करते हैं, इसीलिए किसान और मजदूर इन्हें काम करते हुए भी गा सकते थे।

तुकाराम की गाथा इंद्रायणी नदी में डुबोने पर क्या हुआ?+

परंपरा के अनुसार रूढ़िवादी आलोचकों ने तुकाराम के अभंगों की पोथियाँ इंद्रायणी नदी में डुबवा दीं। तुकाराम तेरह दिनों तक नदी किनारे उपवास करते हुए विट्ठल से प्रार्थना करते रहे। भक्तों की मान्यता है कि पोथियाँ अक्षत अवस्था में जल से ऊपर आ गईं और मुख्य आलोचक रामेश्वर भट्ट उनके प्रशंसक बन गए।

पंढरपुर वारी क्या है और वारकरी कौन हैं?+

वारी पंढरपुर में विट्ठल मंदिर की पैदल तीर्थयात्रा है, जो विशेष रूप से आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर की जाती है। वारकरी वे भक्त हैं जो इसे नियमित रूप से करते हैं - आलंदी से संत ज्ञानेश्वर और देहू से संत तुकाराम की पालकियों के पीछे अभंग गाते हुए चलते हैं।

संत तुकाराम का सदेह वैकुंठ गमन क्या है?+

सदेह वैकुंठ गमन का अर्थ है अपने भौतिक शरीर सहित वैकुंठ जाना। परंपरा कहती है कि 1650 में देहू के अंतिम कीर्तन के समय दिव्य विमान उतरा और तुकाराम सदेह प्रभु के धाम ले जाए गए। यह दिन हर वर्ष तुकाराम बीज के रूप में मनाया जाता है।

संत तुकाराम किस भगवान की पूजा करते थे?+

संत तुकाराम भगवान विट्ठल के अनन्य भक्त थे, जिन्हें विठोबा या पांडुरंग भी कहते हैं - महाराष्ट्र के पंढरपुर में पूजित भगवान श्रीकृष्ण का रूप। विट्ठल ईंट पर कमर पर हाथ रखे अपने भक्तों की प्रतीक्षा में खड़े हैं, और तुकाराम का हर अभंग उन्हीं की ओर बहता है।

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About the author

Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.

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