विजयादशमी (दशहरा) क्या है
विजयादशमी, जिसे आमतौर पर दशहरा कहा जाता है, सबसे महत्वपूर्ण हिंदू पर्वों में से एक है, जो बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय का प्रतीक है। यह दो महान विजयों का सम्मान करता है - भगवान राम द्वारा राक्षसराज रावण का वध, और नौ रात्रियों के युद्ध के बाद माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार। विजया-दशमी नाम का अर्थ ही है 'विजय की दसवीं तिथि', और इसे कोई भी नया कार्य आरंभ करने के लिए सबसे शुभ दिनों में से एक माना जाता है।
तिथि और 2026 में दशहरा कब है
विजयादशमी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी (दसवीं तिथि) को आती है, शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों के तुरंत बाद। ग्रेगोरियन कैलेंडर में यह सामान्यतः सितंबर के अंत या अक्टूबर में पड़ती है। पर्व दोपहर के विजय मुहूर्त में मनाया जाता है, जिसे नए कार्य आरंभ करने का सबसे शक्तिशाली समय माना जाता है। अपने शहर के लिए सटीक तिथि और विजय मुहूर्त का समय वंदना पंचांग पर देखें।
कथा - दो महान विजयें
रामायण में भगवान राम ने युद्ध से पूर्व माँ दुर्गा की उपासना की और इसी दिन दस सिर वाले रावण का वध कर सीता को मुक्त किया तथा संसार पर उसके अत्याचार का अंत किया। देवी महात्म्य में माँ दुर्गा ने रूप बदलने वाले राक्षस महिषासुर से नौ रात्रि युद्ध किया और दसवें दिन उसका संहार कर महिषासुर मर्दिनी कहलाईं। दोनों कथाओं का एक ही संदेश है - बुराई कितनी भी प्रबल क्यों न हो, धर्म की अंततः विजय होती है।
विजयादशमी पूजा विधि

पूजा विजय मुहूर्त में करें: 1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थान व देहली स्वच्छ करें। 2. भगवान राम या माँ दुर्गा का चित्र रखें और तिलक, पुष्प, रोली, अक्षत (चावल) तथा घी का दीपक अर्पित करें। 3. मौसमी मिठाई, गुड़ और फल भोग के रूप में अर्पित करें। 4. शमी वृक्ष और अपराजिता (बीडी) पत्तों की पूजा करें, उन्हें स्वर्ण व सद्भाव के प्रतीक रूप में आदान-प्रदान करें। 5. शस्त्र पूजा करें - अपने कार्य के उपकरण, पुस्तकें, वाहन या यंत्र स्वच्छ कर सम्मान दें। 6. क्रोध, लोभ व अहंकार जैसे भीतरी दोषों पर विजय की प्रार्थना करें और नई शुरुआत का आशीर्वाद माँगें।
रावण दहन, शमी और अपराजिता परंपरा
संध्या को सार्वजनिक मैदानों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं, जो अहंकार, आलस्य और मिथ्या गर्व के नाश का प्रतीक है। शमी वृक्ष की पूजा यह स्मरण कराती है कि कैसे पांडवों ने वनवास में अपने शस्त्र उसमें छिपाए थे और युद्ध से पूर्व भगवान राम के शमी पूजन की कथा। अपराजिता (अपटा) पत्तों का 'सोना' के रूप में आदान-प्रदान समृद्धि व सद्भाव की कामना लिए होता है, जो परिवारों व समाज में संबंधों को सँवारता है।
विजयादशमी के मंत्र
विजयादशमी पर विजय व रक्षा हेतु इनका जप करें:
ॐ अपराजितायै नमः
सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्र्यम्बके गौरि, नारायणि नमोस्तुते।
इस दिन का एक सरल राम मंत्र है श्री राम जय राम जय जय राम। महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् या दुर्गा चालीसा का पाठ उपासना को सुंदर रूप से पूर्ण करता है।
महत्व और लाभ

विजयादशमी वर्ष के साढ़े तीन सबसे शुभ मुहूर्तों में से एक है, जो संपत्ति या वाहन खरीदने, व्यवसाय आरंभ करने, अध्ययन शुरू करने (विद्यारंभ) या किसी भी महत्वपूर्ण कार्य के लिए आदर्श है। आध्यात्मिक रूप से यह दिन अपने भीतर के 'रावण' - अहंकार, क्रोध व बुरी आदतों - को जलाने की याद दिलाता है। इस दिन की उपासना साहस, सफलता, शत्रुओं से रक्षा और एक नए, धर्ममय आरंभ का आशीर्वाद लाती मानी जाती है।
पाठकों के प्रश्न
विजयादशमी को दशहरा भी क्यों कहते हैं?+
दशहरा 'दश' (दस) और 'हरा' (पराजय) से बना है, जो दस सिर वाले रावण की पराजय का प्रतीक है। विजयादशमी का अर्थ विजय की दसवीं तिथि है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव है।
विजयादशमी किस तिथि को आती है?+
यह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को आती है, शारदीय नवरात्रि के तुरंत बाद, सामान्यतः सितंबर के अंत या अक्टूबर में। सटीक तिथि वंदना पंचांग पर देखें।
दशहरे पर शस्त्र पूजा क्या है?+
शस्त्र पूजा अपने जीवनयापन के उपकरणों, शस्त्रों, पुस्तकों, वाहनों या यंत्रों को स्वच्छ कर पूजने की विधि है। यह हमारे कार्य के साधनों का सम्मान करती और सफलता व रक्षा का आशीर्वाद माँगती है।
विजयादशमी पर शमी वृक्ष की पूजा क्यों होती है?+
पांडवों ने वनवास में अपने शस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे, और भगवान राम ने युद्ध से पूर्व इसकी पूजा की थी। शमी पूजन विजय, साहस और समृद्धि का आह्वान करता है।
दशहरा नई शुरुआत के लिए शुभ क्यों माना जाता है?+
विजयादशमी वर्ष के सबसे शुभ मुहूर्तों में से एक है। विजय मुहूर्त संपत्ति या वाहन खरीदने, कार्य आरंभ करने या बच्चों के विद्यारंभ के लिए आदर्श है।
रावण का पुतला जलाना किसका प्रतीक है?+
रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाना अहंकार, आलस्य और मिथ्या गर्व के नाश का प्रतीक है - और अपने भीतर के अहंकार व क्रोध जैसे दोषों को जलाने का आह्वान भी।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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