दुर्गा अष्टमी और महा नवमी - नवरात्रि का चरमोत्कर्ष
दुर्गा अष्टमी (महा अष्टमी भी कही जाती है) और महा नवमी शारदीय नवरात्रि के आठवें व नौवें दिन और इसका सबसे पावन शिखर हैं। इन दिनों माँ दुर्गा की सबसे उग्र, सबसे विजयी रूपों में पूजा होती है - अष्टमी को महागौरी और नवमी को सिद्धिदात्री। ये वे दिन हैं जब देवी सर्वाधिक उपस्थित व सर्वाधिक उदार मानी जाती हैं, जो रक्षा, शक्ति और सच्ची मनोकामनाओं की पूर्ति प्रदान करती हैं।
तिथि और 2026 में ये कब हैं
दुर्गा अष्टमी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (आठवीं तिथि) और महा नवमी नवमी (नौवीं तिथि) को, शारदीय नवरात्रि के दौरान आती हैं। ग्रेगोरियन कैलेंडर में ये सामान्यतः सितंबर के अंत या अक्टूबर में, विजयादशमी से ठीक पहले पड़ती हैं। अष्टमी व नवमी के संधिकाल में होने वाली संधि पूजा का समय बहुत विशिष्ट होता है। अपने शहर के लिए सटीक अष्टमी, नवमी और संधि मुहूर्त वंदना पंचांग पर अवश्य देखें।
अष्टमी और नवमी का महत्व
महा अष्टमी को माँ दुर्गा ने महिषासुर की राक्षस सेनाओं के नाश हेतु अपनी सबसे उग्र शक्ति प्रकट की मानी जाती है। संधि पूजा - अष्टमी के अंतिम 24 मिनट व नवमी के प्रथम 24 मिनट को मिलाकर 48 मिनट का काल - वह सटीक क्षण है जब देवी ने चंड व मुंड राक्षसों के संहार हेतु चामुंडा का रूप धारण किया। महा नवमी को युद्ध अपने चरम पर पहुँचता है, जो विजयादशमी से पूर्व नवदुर्गा के नौ रूपों की उपासना पूर्ण करता है।
अष्टमी और नवमी पूजा विधि

दोनों दिन माँ दुर्गा की उपासना इस प्रकार करें: 1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा वेदी स्वच्छ करें। 2. घी का दीपक जलाएँ और यदि नवरात्रि भर अखंड ज्योत रखते हैं तो उसे प्रज्वलित रखें। 3. देवी को लाल पुष्प, लाल चुनरी, सिंदूर, अक्षत, धूप और नारियल अर्पित करें। 4. हलवा, पूरी, खीर या चना जैसा भोग लगाएँ। 5. दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का पाठ करें। 6. अष्टमी को यथासंभव सोलह दीपों से संधि पूजा करें; नवमी को व्रत पूर्ण करने हेतु हवन और कन्या पूजन करें।
कन्या पूजन और हवन
कन्या पूजन (कंजक भी कहा जाता है) अष्टमी व नवमी उपासना का हृदय है, जहाँ कन्याओं को देवी के साक्षात रूप में सम्मानित किया जाता है। 1. विषम संख्या में, परंपरागत रूप से नौ कन्याओं को, एक बालक (बटुक भैरव) के साथ आमंत्रित करें। 2. उनके चरण धोएँ, तिलक करें और कलाई पर मौली बाँधें। 3. उन्हें प्रसाद रूप में पूरी, हलवा और चना परोसें। 4. छोटा उपहार या दक्षिणा अर्पित कर उनका आशीर्वाद लें। हवन में दुर्गा मंत्रों के साथ पवित्र अग्नि में आहुतियाँ देकर नवरात्रि संकल्प पूर्ण किया जाता है।
अष्टमी और नवमी के मंत्र
इन दिनों इन शक्तिशाली मंत्रों का जप करें:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे
महागौरी (अष्टमी): ॐ देवी महागौर्यै नमः
सिद्धिदात्री (नवमी): ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः
सार्वभौम दुर्गा प्रार्थना सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्र्यम्बके गौरि, नारायणि नमोस्तुते दोनों दिन जपी जा सकती है।
महत्व और लाभ

दुर्गा अष्टमी और महा नवमी की उपासना देवी की पूर्ण कृपा प्रदान करती मानी जाती है - नकारात्मकता से रक्षा, कठिनाइयों पर विजय, स्वास्थ्य, समृद्धि और हार्दिक मनोकामनाओं की पूर्ति। कन्या पूजन विशेष पुण्यदायी माना जाता है, क्योंकि कन्याओं का सम्मान स्वयं शक्ति का सम्मान है। नवमी को हवन पूर्ण करना संपूर्ण नौ दिवसीय नवरात्रि साधना का फल देता है।
पाठकों के प्रश्न
दुर्गा अष्टमी और महा नवमी में क्या अंतर है?+
दुर्गा अष्टमी नवरात्रि का आठवाँ दिन है जो माँ महागौरी को समर्पित है, और महा नवमी नौवाँ दिन है जो सिद्धिदात्री को समर्पित है। दोनों सबसे शक्तिशाली दिन हैं, जिन्हें संधि पूजा जोड़ती है।
संधि पूजा क्या है?+
संधि पूजा अष्टमी के अंतिम 24 मिनट व नवमी के प्रथम 24 मिनट के 48 मिनट के काल में की जाती है। यह वह क्षण है जब माँ दुर्गा ने चंड व मुंड के वध हेतु चामुंडा रूप धारण किया।
कन्या पूजन कैसे किया जाता है?+
कन्याओं (परंपरागत रूप से नौ) को एक बालक के साथ आमंत्रित करें, उनके चरण धोएँ, तिलक करें, मौली बाँधें, और पूरी, हलवा व चना परोसें। दक्षिणा अर्पित कर देवी के साक्षात रूप में उनका आशीर्वाद लें।
कन्या पूजन किस दिन करना चाहिए?+
कन्या पूजन सामान्यतः अष्टमी या नवमी को किया जाता है। परिवार अपनी परंपरा निभाते हैं; दोनों ही दिन शुभ हैं, आदर्श रूप से प्रातः पूजा व हवन पूर्ण करने के बाद।
अष्टमी और नवमी के लिए कौन सा मंत्र सर्वोत्तम है?+
मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' दोनों दिन शक्तिशाली है। आप महागौरी व सिद्धिदात्री के दिन-विशेष मंत्र भी जप सकते हैं और दुर्गा सप्तशती का पाठ कर सकते हैं।
नवरात्रि व्रत कब खोलना चाहिए?+
अधिकांश भक्त अष्टमी या नवमी को हवन व कन्या पूजन पूर्ण करने के बाद व्रत खोलते हैं। अपने परिवार की परंपरा निभाएँ और पारण का समय वंदना पंचांग पर देखें।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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