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हम आरती क्यों करते हैं - महत्व और अर्थ
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हम आरती क्यों करते हैं - महत्व और अर्थ

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 3, 2026
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By Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Reviewed by Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

आरती का अर्थ

आरती पूजा के समापन पर देवता के सामने जलते दीप को घुमाने की क्रिया है, जो भक्ति से गाई जाती और घंटी के साथ की जाती है। यह शब्द आरात्रिक से आया है, जिसका अर्थ है प्रकाश द्वारा अंधकार का निवारण। दीप अर्पित करना अपने अहंकार और अज्ञान को परमात्मा को समर्पित करने तथा ज्योति की आभा में प्रकट ईश्वर के दर्शन का प्रतीक है। यह पूजा का हार्दिक समापन है, जब भक्त मानो कहता है - 'मैं जो कुछ भी हूँ, सब आपको अर्पित करता हूँ।'

दीप और पंच तत्व

एक पारंपरिक आरती थाली पंच महाभूत के माध्यम से समस्त सृष्टि को उसके रचयिता को लौटाती है:

  • दीप की ज्योति अग्नि (अग्नि) और प्रकाश का प्रतिनिधित्व करती है।
  • अगरबत्ती और धूप वायु (वायु) और आकाश (आकाश) का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • जल और पुष्प जल (जल) और पृथ्वी (पृथ्वी) का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इन्हें देवता के सामने घुमाकर भक्त कृतज्ञता से सम्पूर्ण ब्रह्मांड को ईश्वर को लौटाता है, यह स्वीकार करते हुए कि हमारे पास जो कुछ भी है वह पहले परमात्मा से ही आया।

शास्त्रीय और सांस्कृतिक कारण

सनातन धर्म में प्रकाश सदा सबसे पवित्र प्रतीक रहा है, दीप ज्योति प्रार्थना से लेकर दीपावली के पर्व तक। वेद अग्नि को उस दूत रूप में सम्मान देते हैं जो आहुतियों को देवताओं तक पहुँचाता है, इसलिए आरती की ज्योति वह माध्यम है जो भक्त और परमात्मा को जोड़ती है। एक साथ आरती गाना परिवारों और समुदायों को साझा भक्ति में बाँधता है, जो एक निजी प्रार्थना को मंदिरों, घरों और त्योहारों में सामूहिक भक्ति के क्षण में बदल देता है।

वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष

वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष

आरती कोमलता से हर इंद्रिय को संलग्न करती है, जिससे मन शांत होता और एकाग्रता गहरी होती है। गर्म प्रकाश, घंटी व ताली की ध्वनि, कपूर व धूप की सुगंध, और गीत की लय मिलकर एक ध्यानमय अवस्था बनाते हैं। कपूर और घी के दीप पारंपरिक रूप से वायु को शुद्ध करने वाले भी माने जाते थे, जबकि घंटी का कंपन विचलित करने वाले शोर को ढाँपकर मन को स्थिर करने में सहायता करता है। परिणाम ध्यान और भाव का एक संक्षिप्त, दैनिक नवीनीकरण होता है।

आरती कैसे सही ढंग से करें

आरती पूजा के अंत में, भोग अर्पित करने के बाद करें: 1. विषम संख्या की बत्तियों (एक, तीन या पाँच) वाला घी या कपूर का दीप जलाएँ। 2. दीप दाहिने हाथ में और घंटी बाएँ हाथ में पकड़ें। 3. ज्योति को देवता के चरणों से आरंभ कर, ऊपर उठाते हुए और सम्पूर्ण रूप को ढाँपते हुए दक्षिणावर्त घुमाएँ। 4. पूर्ण वृत्त बनाएँ, सामान्यतः चरणों पर सात छोटे, फिर शरीर व मुख पर बड़े वृत्त। 5. आरती भक्ति से गाएँ और घंटी लय बनाए रखे। 6. अंत में अपनी हथेलियाँ ज्योति के ऊपर ले जाएँ और उन्हें अपनी आँखों व सिर से स्पर्श कर प्रकाश को आशीर्वाद रूप में ग्रहण करें।

प्रतिदिन आरती करने के लाभ

दैनिक आरती दिन को एक शांत आध्यात्मिक आधार देती है, कुछ ही मिनटों में तनाव घोलती और कृतज्ञता लौटाती है। यह भक्ति को सुदृढ़ करती है, परिवार को प्रार्थना में एक साथ लाती है, और घर को सकारात्मक ऊर्जा, प्रकाश व सुगंध से भर देती है। अनेक भक्त आरती के बाद स्पष्ट मन, हल्का हृदय और दिव्य रक्षा का अनुभव करते हैं, जो इसे हिंदू जीवन की सबसे सरल फिर भी सबसे उत्थानकारी दैनिक साधनाओं में से एक बनाता है।

बचने योग्य सामान्य भूलें

बचने योग्य सामान्य भूलें

दीप को वामावर्त घुमाने से बचें, क्योंकि आरती सदा दक्षिणावर्त अर्पित की जाती है। गंदे हाथों या अधुले दीप से आरती न करें, और कभी टूटा दीया या अशुद्ध तेल प्रयोग न करें। ज्योति को स्थिर रखें और कभी अपनी साँस से न बुझाएँ; उसे जलकर समाप्त होने दें या कोमलता से बुझाएँ। अंत में, जल्दबाज़ी की बजाय ध्यान से गाएँ, क्योंकि आरती प्रेम का अर्पण है, शीघ्र निपटाने की औपचारिकता नहीं।

त्वरित उत्तर

हम पूजा के अंत में आरती क्यों करते हैं?+

आरती पूजा का प्रेमपूर्ण समापन है जहाँ हम देवता को प्रकाश अर्पित करते हुए अपना अहंकार व अज्ञान समर्पित करते हैं। यह सृष्टि के पंच तत्व ईश्वर को लौटाती और पूजा को कृतज्ञता व भक्ति से सम्पन्न करती है।

आरती किस दिशा में घुमानी चाहिए?+

आरती सदा दक्षिणावर्त घुमाई जाती है, देवता के चरणों से आरंभ कर शरीर व मुख तक ऊपर की ओर। दक्षिणावर्त गति हिंदू उपासना में ऊर्जा के शुभ प्रवाह का अनुसरण करती है।

आरती में पंच तत्व का क्या अर्थ है?+

दीप अग्नि है, धूप वायु व आकाश है, और जल व पुष्प जल व पृथ्वी हैं। ये मिलकर सृष्टि के पंच तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें कृतज्ञता से ईश्वर को लौटाया जाता है।

हम आरती की ज्योति पर हाथ क्यों फेरते हैं?+

आरती के बाद भक्त अपनी हथेलियाँ ज्योति पर फेरकर आँखों व सिर से स्पर्श करते हैं ताकि प्रकाश आशीर्वाद रूप में ग्रहण हो। यह ईश्वर की कृपा की दिव्य ऊर्जा व ऊष्मा को अपने भीतर लेने का प्रतीक है।

आरती के दीप में कितनी बत्तियाँ होनी चाहिए?+

आरती के दीप में आदर्श रूप से विषम संख्या की बत्तियाँ होती हैं, जैसे एक, तीन या पाँच। घी या कपूर का दीप उत्तम है, क्योंकि दोनों उपासना हेतु शुद्ध व शुभ माने जाते हैं।

क्या आरती घर पर प्रतिदिन की जा सकती है?+

हाँ। घर के मंदिर में दैनिक आरती, आदर्श रूप से प्रातः व संध्या, शांति, कृतज्ञता व सकारात्मक ऊर्जा लाती है। एक दीप के साथ छोटी, सच्ची आरती भी एक पूर्ण व उत्थानकारी साधना है।

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About the author

Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.

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