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आरती थाली की वस्तुएँ और आरती कैसे करें (विधि)
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आरती थाली की वस्तुएँ और आरती कैसे करें (विधि)

8 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 3, 2026
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By Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Reviewed by Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

आरती का अर्थ

आरती देवता के समक्ष जलते दीपक को घुमाते हुए भक्ति गीत गाने का अनुष्ठान है, जो पूजा के अंत में किया जाता है। यह शब्द आरात्रिक से आया है, जिसका अर्थ अंधकार का निवारण है। जब ज्योति देवता के चारों ओर घूमती है, भक्त प्रकाश, प्रेम व कृतज्ञता अर्पित करता और बदले में परमात्मा की ऊष्मा पाता है। यह पूजा का सबसे भावपूर्ण व आनंदमय क्षण है, जिसमें अक्सर पूरा परिवार सम्मिलित होता है।

आरती थाली में रखने योग्य वस्तुएँ

एक पारंपरिक आरती थाली में कुछ आवश्यक वस्तुएँ होती हैं: 1. एक दीया या दीपक - आमतौर पर पाँच-बत्ती (पंच-आरती) दीपक या कपूरदान। 2. सुगंध हेतु धूप या अगरबत्ती। 3. आरती के दौरान अर्पित करने हेतु पुष्प। 4. तिलक हेतु कुमकुम और अक्षत (चावल)। 5. छिड़काव व शुद्धि हेतु जल का छोटा पात्र। 6. आरती के दौरान बजाने हेतु एक घंटी। इन्हें सुव्यवस्थित रखें ताकि दीपक उठाना व बिना गिराए घुमाना सरल हो।

आरती कैसे करें - चरण-दर-चरण

पूजा के अंत में आरती करें, आदर्श रूप से खड़े होकर: 1. थाली पर दीपक या कपूर जलाएँ और आरंभ करने हेतु घंटी बजाएँ। 2. थाली दाएँ हाथ में पकड़ें, बाएँ हाथ का सहारा देते हुए। 3. देवता के समक्ष दीपक को दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) वृत्त में घुमाएँ, चरणों से आरंभ कर मुख की ओर ऊपर। 4. छोटे पूर्ण वृत्त बनाएँ - परंपरा अनुसार चरणों के पास चार, नाभि पर दो, मुख के पास तीन और पूरे रूप के चारों ओर सात। 5. घंटी बजाते हुए परिवार के साथ आरती गीत गाएँ। 6. अंत में ज्योति सभी उपस्थित जनों को अर्पित करें और हथेलियाँ उस पर घुमाकर आँखों से लगाकर आशीर्वाद लें।

दीपक दक्षिणावर्त क्यों घुमाया जाता है

दीपक दक्षिणावर्त क्यों घुमाया जाता है

आरती दीपक हमेशा दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाया जाता है, सूर्य व ब्रह्मांड की प्राकृतिक गति का अनुसरण करते हुए। यह दिव्य व्यवस्था के सामंजस्य में चलने और देवता व भक्तों की ओर सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करने का प्रतीक है। आरती के बाद ज्योति सभी में बाँटी जाती है, और लोग अपनी खुली हथेलियाँ उस पर घुमाकर आँखों व सिर से कोमलता से लगाते हैं ताकि प्रकाश की ऊष्मा व आशीर्वाद पा सकें।

एक सरल आरती समापन मंत्र

आरती पूर्ण करने के बाद इस सार्वभौमिक प्रार्थना के साथ ज्योति अर्पित करें:

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

या शांति मंत्र से समापन करें:

ॐ शांति शांति शांति।

फिर हाथ जोड़ें, देवता के समक्ष प्रणाम करें, और अपने परिवार व सभी प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें। शुद्धि हेतु थाली का जल कुछ बूँदें चारों ओर छिड़कें, और पूजा पूर्ण करने हेतु प्रसाद वितरित करें।

बचने योग्य सामान्य भूलें

आरती दीपक कभी वामावर्त (घड़ी की उल्टी दिशा) न घुमाएँ, और जल्दबाज़ी या लापरवाह वृत्त बनाने से बचें। लापरवाही से ज्योति बीच में बुझने न दें। थाली दाएँ हाथ में पकड़ें, बाएँ में नहीं, और आरती के दौरान सांसारिक बातों से बचें। थाली स्वच्छ रखें, मोम या तेल फर्श पर न टपकने दें, और ज्योति व प्रसाद हमेशा सभी उपस्थित जनों में बाँटें, अपने तक सीमित न रखें।

त्वरित उत्तर

आरती थाली के लिए कौन सी वस्तुएँ चाहिए?+

आरती थाली में दीया या दीपक (या कपूरदान), धूप, पुष्प, तिलक हेतु कुमकुम व अक्षत, जल का छोटा पात्र, और आरती के दौरान बजाने हेतु घंटी चाहिए।

आरती दीपक किस दिशा में घुमाना चाहिए?+

आरती दीपक हमेशा दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाया जाता है, सूर्य की गति का अनुसरण करते हुए। इसे देवता के समक्ष चरणों से आरंभ कर मुख की ओर ऊपर घुमाया जाता है।

आरती में दीपक कितनी बार घुमाना चाहिए?+

परंपरा अनुसार दीपक चरणों के पास चार बार, नाभि पर दो बार, मुख के पास तीन बार, और देवता के पूरे रूप के चारों ओर सात बार घुमाया जाता है, यद्यपि कुछ सरल दक्षिणावर्त वृत्त भी स्वीकार्य हैं।

लोग आरती की ज्योति पर हाथ क्यों घुमाते हैं?+

आरती के बाद भक्त अपनी खुली हथेलियाँ ज्योति पर घुमाकर आँखों व सिर से लगाते हैं ताकि उसकी ऊष्मा व आशीर्वाद पा सकें, जो दिव्य प्रकाश ग्रहण करने और मन से अंधकार हटाने का प्रतीक है।

आरती थाली किस हाथ में पकड़नी चाहिए?+

आरती थाली दाएँ हाथ में पकड़नी चाहिए, आवश्यकता हो तो बाएँ हाथ के सहारे से। देवता को ज्योति अर्पित करने हेतु दायाँ हाथ शुद्ध व सम्मानजनक माना जाता है।

क्या बिना गीत गाए आरती की जा सकती है?+

हाँ। यद्यपि आरती गीत गाना अनुभव को गहरा करता है, आरती मौन रूप से या 'ॐ जय जगदीश हरे' या 'ॐ शांति' जैसी सरल समापन प्रार्थना के साथ की जा सकती है। सच्ची भक्ति सर्वाधिक मायने रखती है।

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About the author

Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.

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