जयपुर के पूर्व की घाटी
गलताजी जयपुर की परकोटा नगरी से लगभग दस किलोमीटर पूर्व अरावली पहाड़ियों की संकरी घाटी में है, जहां सूरजपोल और घाट की गूणी नामक दर्रे से होकर पहुंचा जाता है।
वहां क्या है:
- प्राकृतिक झरनों से भरने वाले पाषाण कुंडों की शृंखला, जो घाटी के तल पर सीढ़ीनुमा उतरती है
- गौमुख, गाय के मुख के आकार का पाषाण मुख, जिससे झरने का जल सबसे ऊपर के कुंड में गिरता है
- गुलाबी बलुआ पत्थर के मंदिर भवन, चित्रित छतों तथा स्तंभ युक्त मंडपों सहित, जो अठारहवीं शताब्दी में बने
- परिसर में राम, कृष्ण तथा हनुमान के स्थान
- ऊपर की चोटी पर सूर्य मंदिर, जो जयपुर के बड़े भाग से दिखता है
- रीसस वानरों की बहुत बड़ी स्थायी संख्या
गलताजी के विषय में पहली समझने योग्य बात जल है। जयपुर सूखे प्रदेश के छोर पर बसा है। इन पहाड़ियों की ऐसी घाटी जहां वर्ष भर, पर्याप्त मात्रा में, बिना सिंचाई या अभियांत्रिकी के झरने बहते हों, सचमुच दुर्लभ है, और यही कारण है कि यहां स्थान तब से है जब निकट कोई नगर था ही नहीं।
गलताजी की शेष हर बात उसी झरने का उत्तर है। ऋषि उसी के लिए आए, कुंड उसी के लिए काटे गए, पीठ उसी के पास स्थापित हुई, और वानर उसी के लिए रुके।
गालव ऋषि और नाम
स्थान का नाम गालव ऋषि से आया है, और यहां की परंपरा सीधे तप की परंपरा है।
क्या माना जाता है:
- गालव ऋषि ने इसी घाटी में बहुत लंबे काल तक तपस्या की
- झरना उसी तप के फलस्वरूप प्रकट हुआ, इसीलिए जल को भूमि की विशेषता नहीं, वरदान माना जाता है
- ऋषि गालव आश्रम में स्मरण किए जाते हैं, और परिसर का एक स्थान उनसे जुड़ा है
- गलता नाम उन्हीं से बना है
व्यापक परंपरा में गालव विश्वामित्र के शिष्य के रूप में आते हैं, और उनका एक प्रसिद्ध प्रसंग उस गुरुदक्षिणा पर टिका है जिसे देने का उन्होंने हठ किया, और जिस मांग ने उन्हें लंबी तथा कठिन खोज में डाल दिया। जो छवि उभरती है वह ऐसे व्यक्ति की है जो दायित्व से सरल छुटकारा स्वीकार नहीं करता।
यह इस स्थान के लिए उपयुक्त आश्रयदाता है। गलताजी में चलने वाला भाव यही है कि दृढ़ता का पुरस्कार जल है, और सूखे प्रदेश में उससे अधिक ठोस वरदान कोई नहीं।
इसे कैसे लें, इस पर एक बात। अरावली का झरना किसी भ्रंश रेखा का भूगर्भीय परिणाम है या किसी ऋषि के तप का, यह प्रश्न परंपरा हल करने नहीं बैठी है। कथा जो अंकित करती है वह यह है कि लोगों को यहां जल मिला, उन्होंने उसे पाया हुआ नहीं दिया हुआ समझा, और उसी के अनुसार निर्माण किया।
कुंड और गौमुख
कुंड गलताजी का कार्यशील हृदय हैं, और उन्हें भक्ति के साथ अभियांत्रिकी की दृष्टि से भी देखना चाहिए।
यह व्यवस्था कैसे चलती है:
- झरने का जल घाटी में ऊपर निकलता है और गौमुख से सबसे ऊपर के कुंड में गिरता है
- वहां से वह घाटी तल में काटे गए कुंडों की शृंखला से नीचे उतरता है, हर कुंड अगले में उमड़ता हुआ
- गलता कुंड प्रमुख कुंड है और माना जाता है कि वह कभी नहीं सूखता
- शृंखला के अन्य कुंडों के अपने नाम हैं, जिनमें एक सूर्य से जुड़ा है
- पुरुषों तथा स्त्रियों के लिए अलग कुंड रखे जाते हैं
यात्री यहां क्या करते हैं:
- कुंड में स्नान, जो यात्रा का केंद्रीय कार्य है
- स्नान के पश्चात मंदिरों में दर्शन
- मकर संक्रांति पर स्नान विशेष रूप से होता है, जब जयपुर से बड़ी संख्या में लोग आते हैं
इस व्यवस्था की व्यावहारिक बुद्धि ध्यान देने योग्य है। भीड़ के प्रयोग में एक ही कुंड शीघ्र दूषित हो जाता। निरंतर आवक तथा उमड़ाव वाली सीढ़ीनुमा शृंखला पूरे तंत्र में जल को चलता रखती है, इसीलिए यह रचना भारत भर के स्नान तीर्थों में तब से प्रयुक्त होती रही जब निस्पंदन पर किसी ने लिखा भी नहीं था।
एक चेतावनी स्पष्ट रूप से कहनी होगी। गलताजी में जल की गुणवत्ता ऋतु, भीड़ तथा रखरखाव के स्तर से बदलती है, और वह उपचारित जल नहीं है। उसे पिएं नहीं, सिर डुबोएं नहीं, और खुले घाव के साथ स्नान न करें। भक्ति जल जनित संक्रमण को नहीं रोकती, और प्रसाद मानकर लिया गया एक घूंट अनेक आगंतुकों को बीमार कर चुका है।
रामानंदी पीठ

गलताजी केवल स्नान तीर्थ नहीं है। वह रामानंदी संप्रदाय की महत्वपूर्ण पीठों में है, जो उत्तर भारत का सबसे बड़ा वैष्णव संन्यासी संप्रदाय है।
यह पीठ कैसे बनी:
- रामानंदी संत पयहारी कृष्णदास को यहां गद्दी की स्थापना से जोड़ा जाता है, लगभग पंद्रहवीं या सोलहवीं शताब्दी में
- आमेर के कछवाहा शासकों ने पीठ को आश्रय दिया, और जयपुर की स्थापना के बाद भी वंश तथा गलताजी का संबंध बना रहा
- वर्तमान मंदिर भवन बड़े भाग में अठारहवीं शताब्दी के हैं, जो सवाई जयसिंह द्वितीय के काल में बने, और अधिकांश निर्माण का श्रेय उनके दरबार के एक अधिकारी को दिया जाता है
- परिसर रामानंदी अध्ययन तथा सम्मेलन का केंद्र रहा है, और संप्रदाय का कुंभ जैसा जमावड़ा ऐतिहासिक रूप से इससे जुड़ा रहा है
व्यवहार में रामानंदी पीठ का अर्थ क्या है:
- राम तथा सीता केंद्रित उपासना, जिसमें हनुमान आदर्श भक्त हैं
- ऐसी परंपरा जो जाति के प्रश्न पर ऐतिहासिक रूप से खुली रही, और मध्यकालीन उत्तर भारत में इसका बहुत बड़ा महत्व था
- जीवित संन्यासी संस्थान, केवल तीर्थ स्थल नहीं
इससे वह बात समझ आती है जो आगंतुक को तुरंत दिखती है। गलताजी एक मंदिर जैसा नहीं लगता। वह बस्ती जैसा लगता है, निवास, आंगन, चित्रित कक्ष, भंडार तथा सीढ़ियों सहित, क्योंकि उसे ठीक वैसा ही बनाया गया था।
सूर्य मंदिर और वानर
गलताजी की दो बातें उस तीर्थयात्रा से कहीं आगे जानी जाती हैं जो लोगों को यहां लाती है।
सूर्य मंदिर
- वह घाटी में कुंडों के साथ नहीं, ऊपर की चोटी पर है
- वह सवाई जयसिंह द्वितीय तथा उनके दरबार के आश्रय से जुड़ा है
- छत से जयपुर का पूरा पुराना नगर नीचे फैला दिखता है
- गलता की ओर से खड़ी सीढ़ियां ऊपर जाती हैं, और मंदिर जयपुर की ओर से भी पहुंचा जा सकता है
जल स्थान के ऊपर सबसे ऊंचे बिंदु पर सूर्य मंदिर रखना स्थान चयन का संयोग नहीं है। घाटी में झरना और चोटी पर सूर्य, यह वही जोड़ी है जो भारतीय पवित्र भूगोल में बहुत दूर तक चलती है।
वानर
- गलताजी में कई सौ रीसस वानर रहते हैं, इसीलिए इसे प्रायः मंकी टेंपल कहा जाता है
- वे मनुष्यों के अभ्यस्त हैं, आगंतुकों तथा दुकानदारों से भोजन पाते हैं, और तनिक भी नहीं डरते
- क्षेत्र में लंगूर भी रहते हैं
वानर सचमुच इस स्थान का अंग हैं, पर उन्हें सराहने से अधिक संभालने की आवश्यकता है:
- भोजन, प्लास्टिक थैली, माला या प्रसाद हाथ में दिखाकर न ले जाएं
- चश्मा सिर से उतारें, फोन संभालें, और थैला झुलाएं नहीं
- हाथ से भोजन न खिलाएं, और किसी बड़े नर से आंख न मिलाएं, न मुस्कान में दांत दिखाएं
- छोटे बच्चों को पास रखें और उनके हाथ में भोजन न दें
यदि काट या खरोंच लगे, तो घाव को बहते जल में साबुन से कई मिनट धोएं और उसी दिन अस्पताल जाकर रेबीज़ का उपचार लें। भारतीय मंदिर स्थलों पर वानर के काटने की घटनाएं आम हैं और लक्षण आने के बाद रेबीज़ प्राणघातक है। यह सुविधा से तौलने वाली सावधानी नहीं है। उसी दिन जाएं।
गलताजी की यात्रा
कैसे पहुंचें
- जयपुर की परकोटा नगरी से लगभग 10 किलोमीटर पूर्व, सूरजपोल तथा घाट की गूणी दर्रे से आगे
- जयपुर में कहीं से भी ऑटो या टैक्सी, यातायात के अनुसार लगभग आधा घंटा
- परिसर तक घाटी में उतरती सड़क जाती है, और मंदिरों से कुछ पहले पार्किंग है
- चोटी पर सूर्य मंदिर के लिए अलग सीढ़ियां चढ़नी होती हैं
समय और ऋतु
- दिन भर खुला रहता है पर मंदिरों में मध्याह्न विश्राम रहता है, इसलिए प्रातः या संध्या से पहले का समय उत्तम है
- सुखद मौसम के लिए अक्टूबर से मार्च। जयपुर की गर्मी कठोर है और घाटी ताप रोकती है
- जनवरी की मकर संक्रांति मुख्य स्नान अवसर है, और पूरा नगर उमड़ता है
- वर्षा ऋतु में कुंड भरते हैं और घाटी सबसे हरी रहती है, पर सीढ़ियां फिसलन भरी हो जाती हैं
किस क्रम में देखें
- कुंडों तक उतरें और घाटी के सिरे पर गौमुख देखें
- परिसर के चित्रित मंडप तथा राम, कृष्ण और हनुमान के स्थान
- गालव आश्रम का स्थान
- जयपुर पर सूर्यास्त के लिए सूर्य मंदिर की चढ़ाई
व्यावहारिक बातें
- पकड़ वाले जूते पहनें। पत्थर घिसकर चिकना है और गीले में फिसलता है
- जल साथ रखें। चढ़ाई पर छाया कम है
- परिसर की फोटो प्रायः मान्य है, पर गर्भगृह के भीतर नहीं। पूछ लें
- खुला भोजन साथ न रखें
यात्रा को जोड़ना
- जयपुर से इसी मार्ग पर सिसोदिया रानी का बाग है
- आमेर दुर्ग तथा जल महल नगर के आर पार थोड़ी दूरी पर हैं
अंत में यह कि यह स्थान क्यों टिका रहता है। जयपुर में इससे भव्य स्मारक और बेहतर संभाले मंदिर हैं। गलताजी के पास वह है जो उनमें से किसी के पास नहीं, अर्थात होने का ऐसा कारण जिसका किसी शासक के निर्णय से कोई संबंध नहीं। जल यहां पहले से था।
पाठकों के प्रश्न
गलताजी कहां है और वहां कैसे पहुंचें?+
जयपुर की परकोटा नगरी से लगभग 10 किलोमीटर पूर्व, सूरजपोल तथा घाट की गूणी दर्रे से आगे, अरावली की एक घाटी में। जयपुर में कहीं से भी ऑटो या टैक्सी से लगभग आधा घंटा लगता है, और घाटी में उतरती सड़क है जिसमें मंदिरों से पहले पार्किंग है।
गलताजी का नाम गालव ऋषि पर क्यों है?+
परंपरा मानती है कि गालव ऋषि ने इसी घाटी में लंबी तपस्या की और उसी के फलस्वरूप सदा बहने वाला झरना प्रकट हुआ। गलता नाम उन्हीं से बना है, और परिसर में एक स्थान तथा आश्रम उनसे जुड़े हैं।
गलताजी का गौमुख क्या है?+
घाटी के सिरे पर गाय के मुख के आकार का पाषाण मुख, जिससे झरने का जल सबसे ऊपर के कुंड में गिरता है। वहां से जल कुंडों की शृंखला में नीचे उतरता है, हर कुंड अगले में उमड़ता हुआ।
क्या कुंडों में स्नान किया जा सकता है?+
हां, और वही यात्रा का केंद्रीय कार्य है, जिसमें पुरुषों तथा स्त्रियों के लिए अलग कुंड हैं। जल उपचारित नहीं है और गुणवत्ता ऋतु तथा भीड़ से बदलती है, इसलिए उसे पिएं नहीं, सिर न डुबोएं, और खुले घाव के साथ स्नान न करें।
रामानंदी संबंध क्या है?+
गलताजी रामानंदी संप्रदाय की महत्वपूर्ण पीठ है, जो संत पयहारी कृष्णदास से जुड़ी है और जिसे आमेर तथा जयपुर के कछवाहा शासकों का आश्रय मिला। उपासना राम तथा सीता केंद्रित है जिसमें हनुमान आदर्श भक्त हैं, और परिसर संन्यासी संस्थान की तरह चलता है।
वानरों के विषय में क्या करना चाहिए?+
दिखने वाला भोजन या थैला साथ न रखें, चश्मा सिर से उतारें, फोन संभालें, हाथ से न खिलाएं और बच्चों को पास रखें। काटने या खरोंच लगने पर घाव को बहते जल में साबुन से कई मिनट धोएं और उसी दिन अस्पताल पहुंचकर रेबीज़ का उपचार लें।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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