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लोहड़ी 2027: तिथि, महत्व, अग्नि अनुष्ठान और पंजाब का सबसे बड़ा शीत पर्व क्यों मायने रखता है
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लोहड़ी 2027: तिथि, महत्व, अग्नि अनुष्ठान और पंजाब का सबसे बड़ा शीत पर्व क्यों मायने रखता है

7 मिनट पढ़ेंप्रकाशित फ़रवरी 19, 2026
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By Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Reviewed by Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

वह अग्नि जो स्वयं शीत को जलाती है

लोहड़ी उन कुछ हिंदू पर्वों में जो किसी मानव-रूप देवता के बजाय अग्नि व फसल की पूजा करते। यह मकर संक्रांति की पूर्वसंध्या, शीत संक्रांति का अंत व उत्तरायण का स्वागत - आधे वर्ष का काल जब सूर्य उत्तर बढ़ता।

लोहड़ी 2027 बुधवार, 13 जनवरी 2027 को है। मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, दिल्ली, व विश्व भर पंजाबी प्रवासियों में मनाई।

लोहड़ी की केंद्रीय छवि सूर्यास्त पर जलाई जाने वाली अग्नि (लोहड़ी दी आग) जो देर रात्रि तक जलती। परिवार 7 बार दक्षिणावर्त घेरा बनाते, अग्नि में तिल, गुड़, मूँगफली, पॉपकॉर्न, रेवड़ी डालते। बच्चे दुल्ला भट्टी के लोकगीत गाते - पंजाबी रॉबिन हुड जैसा नायक जिसने अपहृत कन्याओं को बलात्कारिक विवाह से बचाया। नवजात शिशुओं व नई-शादीशुदा वधुओं की पहली लोहड़ी अतिरिक्त भव्यता से।

लोहड़ी की विशेषता - धर्मों के पार समान - हिंदू, सिख, ईसाई, यहाँ तक कि मुस्लिम पंजाबी इसे सामुदायिक शीत पर्व रूप मनाते।

🔥 लोहड़ी की अग्नि आपकी इच्छाएँ सीधे सूर्य तक ले जाती कही जाती। अग्नि में जो डालें - भौतिक (तिल, गुड़) या प्रतीकात्मक (पुराने बैर, भय) - खाया जाता व रूपांतरित।

दुल्ला भट्टी कथा - क्यों यह नायक लोहड़ी का सितारा

अब्दुल्लाह भट्टी (लोकप्रिय दुल्ला भट्टी) 16वीं सदी का पंजाबी विद्रोही जो मुग़ल सम्राट अकबर के कठोर भू-करों के विरुद्ध। 1599 में फाँसी हुई। पर जिसने उन्हें सभी पंजाबी समुदायों - हिंदू, सिख, मुस्लिम - में लोक नायक बनाया, वह भिन्न कार्य था।

उनके समय मुग़ल कुलीनों की क्रूर प्रथा थी - युवा पंजाबी कन्याओं को बलपूर्वक धनी खरीदारों के पास उपपत्नी बनाने ले जाना। दुल्ला भट्टी इन कारवाँओं को रोकते, अपहृत कन्याओं को मुक्त करते, उनके गाँवों में उचित हिंदू/मुस्लिम विवाह कराते - अपनी लूट से दहेज देते।

दो विशिष्ट कन्याएँ - सुंदरी व मुंदरी - दुल्ला भट्टी के हस्तक्षेप से प्रसिद्ध हुईं। उन्होंने इन दोनों के विवाह सामुदायिक अग्नि के सामने कराए व विवाह पर शक्कर छिड़की (आज तक चलती प्रथा - हर लोहड़ी, नई-विवाहित वधुओं पर आशीर्वाद हेतु शक्कर छिड़की जाती)।

लोहड़ी का लोकगीत 'सुंदर मुंदरिये, हो! तेरा कौण विचारा, हो!' सीधे यही कथा सुनाता। बच्चे घर-घर जाकर गाते, दुल्ला भट्टी के सम्मान में तिल-गुड़-रेवड़ी-पैसे माँगते। जो भी मिले, अग्नि में प्रतीकात्मक रूप से डालते - दुल्ला भट्टी की आत्मा का धन्यवाद।

गहरा अर्थ - लोहड़ी एकमात्र हिंदू/पंजाबी पर्व जो स्पष्ट रूप से लिंग-आधारित हिंसा व बलात्कारिक विवाह के विरुद्ध स्टैंड का स्मरण करता। सुंदरी-मुंदरी गीत मूलतः महिला-अधिकार गीत हैं, बिना समझे 5-वर्षीय बच्चों द्वारा गाए जाते। यही कारण कि परिवार में बेटी जन्म पर लोहड़ी भव्यता से मनाई जाती - दुल्ला भट्टी का आशीर्वाद आमंत्रित।

लोहड़ी दिवस अनुष्ठान - चरणबद्ध

प्रातः (दिवस 1, 13 जनवरी 2027) -

  • बच्चे घर-घर जाकर 'सुंदर मुंदरिये' गीत गाते
  • घर उन्हें मिठाई, पैसे, व तिल-गुड़ देते
  • माएँ विशेष भोजन तैयार करतीं - मक्की दी रोटी, सरसों दा साग, पिन्नी, गजक, तिल-रेवड़ी
  • नई-शादीशुदा दंपति व नवजात वाले परिवार विशेष उत्सव की तैयारी

संध्या अग्नि (सायं 5:30 – रात्रि 9:00) -

चरण 1 - अग्नि स्थापना - आँगन, बगीचे, या सामुदायिक स्थान में लकड़ी का ढेर (आम की लकड़ी पसंदीदा - शुभ)। उपलब्ध हो तो गोबर के उपले मिलाएँ। परिवार का हर सदस्य एक लकड़ी देता।

चरण 2 - सूर्यास्त पर अग्नि जलाएँ (लगभग 5:30) - सूर्य अस्त होते समय, परिवार के सबसे बड़े पुरुष अग्नि जलाते। अग्नि का स्वागत कथन - 'आई आई लोहड़ी आई।'

चरण 3 - प्रथम चक्र (संकल्प) - सब मुट्ठी भर तिल, गुड़, मूँगफली, पॉपकॉर्न, रेवड़ी, रवड़ी लें। संकल्प लें। अग्नि में डालते कहें - 'आदर आये, दलिद्र जाये!' (शुभ आये, अशुभ जाये!)

चरण 4 - 7 परिक्रमाएँ - परिवार सदस्य हाथ पकड़कर अग्नि की 7 बार दक्षिणावर्त परिक्रमा। बच्चे, वृद्ध, यहाँ तक कि छोटे बच्चे साथ। हर चक्र 7 पवित्र लक्ष्यों (स्वास्थ्य, धन, परिवार, ज्ञान, धर्म, मोक्ष, शांति) में से एक का प्रतीक।

चरण 5 - नवजात व वधुओं हेतु विशेष आशीर्वाद -

  • बेटी की पहली लोहड़ी - उसे लाल पहनाकर अग्नि के चारों ओर 5 बार ले जाते। परिवार उसका नाम अग्नि को घोषित करता - स्वयं सूर्य गवाह बनते।
  • नई-शादीशुदा वधू की पहली लोहड़ी - पति संग 7 बार अग्नि के चारों ओर चलती। उस पर शक्कर छिड़की।
  • नई-विवाहित दंपति के परिवार लोहड़ी दी सूर - मिठाई की टोकरी का आदान-प्रदान।

चरण 6 - भांगड़ा व गिद्दा - सब ढोल पर नाचते। दुल्ला भट्टी, फसल, व दिवंगत प्रियजनों की लालसा के भांगड़ा (पुरुष) व गिद्दा (स्त्रियाँ) गीत।

चरण 7 - सामुदायिक भोज - अग्नि बुझने (या अंगारे रहने) के बाद परिवार साथ भोजन - मक्की दी रोटी, सरसों दा साग, गजक, खीर, ठंडी लस्सी। अग्नि की ऊष्मा भोजन को आशीर्वादित करती।

चरण 8 - अग्नि बलपूर्वक न बुझाएँ - प्राकृतिक रूप से बुझने दें। अगले प्रातः राख एकत्र कर खेतों में (उर्वरता) या औषधीय उपयोग हेतु संग्रहित (लोहड़ी राख नवजात के माथे पर लगाने पर बुरी दृष्टि हटाती कही जाती)।

लोहड़ी गीत, अलाव भेंट और क्षेत्रीय रीति-रिवाज: एक संपूर्ण गाइड

लोहड़ी गीत, अलाव भेंट और क्षेत्रीय रीति-रिवाज: एक संपूर्ण गाइड

लोहड़ी उत्तर भारत के सबसे आनंदमय और समुदाय-केंद्रित त्योहारों में से एक है।

लोहड़ी अलाव: मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर सूर्यास्त के समय जलाया जाता है।

अलाव को भेंट: तिल, रेवड़ी, गजक, फुलिया, मूंगफली - "आदर आए, दलिद्दर जाए" बोलते हुए।

"सुंदर मुंदरिए" गीत: दुल्ला भट्टी की कहानी - जिन्होंने मुगल काल में लड़कियों को दासता से बचाया।

क्षेत्रीय विविधताएं:

  • पंजाब: भांगड़ा और गिद्दा
  • हरियाणा: क्षेत्रीय लोकगीत
  • दिल्ली: सामुदायिक उत्सव

पहली लोहड़ी: बच्चे की पहली लोहड़ी और विवाह के बाद पहली लोहड़ी सबसे महत्वपूर्ण।

वंदना ऐप पर लोहड़ी गीतों के बोल और अलाव मार्गदर्शन उपलब्ध है।

नई शुरुआत के त्योहार के रूप में लोहड़ी: आध्यात्मिक और कृषि महत्व

लोहड़ी को अक्सर केवल फसल उत्सव के रूप में समझा जाता है, लेकिन इसका गहरा आध्यात्मिक महत्व है।

कृषि संबंध: लोहड़ी रबी फसल के अंत का उत्सव है। अलाव की आग अग्नि को फसल की पहली भेंट है।

खगोलीय महत्व: लोहड़ी शीतकालीन संक्रांति पर - सबसे लंबी रात पर। इसके बाद दिन बड़े होने लगते हैं।

अग्नि शुद्धिकरण के रूप में: पुरानी वस्तुएं जलाना - अतीत के बोझ को छोड़ना।

आने वाले वर्ष के लिए प्रार्थनाएं:

  • अच्छी वर्षा और उत्पादक फसल
  • परिवार का स्वास्थ्य
  • नवविवाहितों और नवजात के लिए समृद्धि

शहरी और प्रवासी संदर्भ में लोहड़ी: मूल तत्व - आग, गीत, रेवड़ी, परिवार - कहीं भी बनाए जा सकते हैं।

वंदना ऐप पर लोहड़ी की प्रार्थनाएं और शहरी लोहड़ी आयोजन गाइड उपलब्ध है।

पारंपरिक लोहड़ी खाद्य पदार्थ और रेसिपी: रेवड़ी, गजक, मक्की की रोटी और अधिक

लोहड़ी के भोजन शीतकालीन फसल का उत्सव हैं - हार्दिक, गर्म और पारंपरिक।

रेवड़ी: तिल और गुड़ की मिठाई। विधि: तिल भूनें, गुड़ पिघलाएं, हार्ड क्रैक स्टेज पर तिल डालें, चपटी बनाएं।

गजक: तिल की मोटी स्लैब।

मक्की की रोटी और सरसों का साग: पंजाबी शीतकालीन भोजन। मक्की के आटे की रोटी + सरसों की पत्तियों का साग।

तिल की खीर: खीर में भुने तिल का पेस्ट डालें।

मूंगफली: ताजे भुने - अलाव में फेंके और बांटे जाते हैं।

कड़ाह प्रसाद: गुरुद्वारे में बांटा जाने वाला गेहूं का हलवा।

वंदना ऐप पर लोहड़ी व्यंजनों के वीडियो गाइड उपलब्ध हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या लोहड़ी केवल लड़कों के लिए मनाई जाती है, लड़कियों के लिए नहीं?+

यह पुरानी भ्रांति। आधुनिक पंजाब पुत्रों व पुत्रियों दोनों हेतु समान लोहड़ी मनाता - और दुल्ला भट्टी की कथा (उन्होंने कन्याओं को बचाया) के कारण, संभवतः कन्या की पहली लोहड़ी का गहरा अर्थ। कई प्रगतिशील परिवार अब विशेष 'बेटी दी लोहड़ी' उत्सव कर नवजात कन्याओं को विशेष सम्मान देते। 1990 के दशक की पुत्रियों हेतु लोहड़ी छोड़ने की प्रथा सामुदायिक नेताओं ने सक्रिय रूप से उलट दी है, व अधिकांश पंजाबी परिवार आज हर नवजात समान मनाते।

अग्नि में भोजन क्यों डालें - क्या यह बर्बादी नहीं?+

मात्राएँ प्रतीकात्मक - प्रति व्यक्ति छोटी मुट्ठी। आध्यात्मिक रूप से, अग्नि सीधे सूर्य/अग्नि देवता तक अर्पण ले जाती (पुजारी आवश्यक नहीं)। भौतिक भोजन का धुएँ व ऊर्जा में रूपांतरण मानव शरीर के भोजन को जीवन-ऊर्जा में बदलने का दर्पण। दैनिक यथार्थ को पवित्र बनाया गया। व्यावहारिक रूप से, अर्पण चींटियों व कीटों का भोजन भी जो अदग्ध शेष खाते। कुछ भी वास्तव में बर्बाद नहीं - चक्र बस दिव्य से होकर जाता।

क्या गैर-पंजाबी लोहड़ी मना सकते हैं?+

हाँ - लोहड़ी का भाव (उत्तरायण स्वागत, शीत से ज्ञान कटाई, सामुदायिक अग्नि) सार्वभौमिक हिंदू, विशेष पंजाबी नहीं। कई दक्षिण भारतीय, बंगाली, महाराष्ट्रीय इसी दिन भिन्न नामों (भोगी, भोगी पोंगल, आदि) में समान अग्नि पर्व मनाते। सामुदायिक अग्नि + मिठाई आदान-प्रदान + नृत्य प्रारूप किसी भी समुदाय में काम करता। बस दुल्ला भट्टी लोकगीतों के प्रति सम्मान बनाए रखें (ये विरासत हैं, मनोरंजन नहीं)। बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली के महानगरीय वर्गों में आधुनिक लोहड़ी पार्टियाँ नियमित रूप से सभी समुदायों को शामिल करतीं।

लोहड़ी व मकर संक्रांति में क्या संबंध है?+

लोहड़ी मकर संक्रांति की संध्या/पूर्वसंध्या। लोहड़ी (13 जनवरी 2027 सायं) → मकर संक्रांति (14 जनवरी 2027 दिन)। खगोलीय रूप से, लोहड़ी दक्षिणायन का अंतिम सूर्यास्त चिह्नित करती; मकर संक्रांति उत्तरायण का प्रथम सूर्योदय। मिलकर वे देवताओं की रात्रि (दक्षिणायन) व देवताओं के दिवस (उत्तरायण) के बीच 24-घंटे का सेतु। लोहड़ी की अग्नि प्रतीकात्मक रूप से पुराना अर्ध-वर्ष जलाती। मकर संक्रांति का स्नान आपको नए अर्ध-वर्ष हेतु धोता। पंजाबी परंपरागत रूप से दोनों करते - संध्या लोहड़ी पार्टी, फिर अगले दिन प्रातः-काल संक्रांति स्नान।

क्या लोहड़ी पूजा विधि है या केवल अग्नि?+

अग्नि ही पूजा। लोहड़ी का अलग मंदिर अनुष्ठान या मूर्ति पूजा नहीं - अग्नि देवता व सूर्य देवता अग्नि के माध्यम से सीधे पूजित। फिर भी, धार्मिक परिवार संध्या अग्नि के अतिरिक्त संक्षिप्त प्रातः सूर्य पूजा (सूर्योदय पर अर्घ्य, 'ॐ सूर्याय नमः' 12 जप) करते। नवजात/वधू समारोह परिवारों में पीढ़ियों से चली विशिष्ट लिपियों का अनुसरण। किसी चरण पर पुजारी आवश्यक नहीं - लोहड़ी मूलतः लोक-आध्यात्मिक पर्व, मंदिर पर्व नहीं।

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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.

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