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पीपल वृक्ष पूजा - लाभ, नियम और विधि
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पीपल वृक्ष पूजा - लाभ, नियम और विधि

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 3, 2026
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By Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

Reviewed by Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

पीपल वृक्ष पवित्र क्यों है

पीपल (अश्वत्थ वृक्ष) सभी वृक्षों में सबसे पवित्र माना जाता है, जिसमें त्रिमूर्ति का वास माना जाता है - जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और पत्तों में शिव। स्वयं भगवद्गीता इसे सबसे पवित्र वृक्ष कहती है। देवी लक्ष्मी भी इसमें निवास करती मानी जाती हैं, विशेषकर शनिवार को। पीपल की पूजा संपूर्ण सृष्टि को एक रूप में सम्मान देने का तरीका माना जाता है।

पूजा का सर्वोत्तम दिन और समय

शनिवार पीपल पूजा का सबसे महत्वपूर्ण दिन है, क्योंकि यह शनि देव और देवी लक्ष्मी से जुड़ा है। जल सूर्योदय के बाद प्रातःकाल अर्पित करें, रात्रि में कभी नहीं। माना जाता है कि दिन में देवता वृक्ष में निवास करते हैं, जबकि रात्रि में इसे न छूना और न ही इसकी परिक्रमा करनी चाहिए। अमावस्या, सोमवती अमावस्या और वैशाख मास इसकी पूजा के लिए विशेष शुभ हैं।

पीपल पूजा कैसे करें - विधि

1. प्रातः स्नान कर सूर्योदय के बाद प्रातःकाल पीपल के पास जाएँ। 2. पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर जड़ों में थोड़ा कच्चा दूध मिला जल अर्पित करें। 3. इसके मूल में सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएँ, विशेषकर शनिवार को। 4. पुष्प, रोली, अक्षत (चावल) अर्पित करें, और व्रत हो तो जनेऊ चढ़ाएँ। 5. मंत्र जपते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा (3, 7 या 11 बार) करें। 6. हाथ जोड़कर प्रणाम करें और शांति, स्वास्थ्य व समृद्धि की प्रार्थना करें। वृक्ष के आसपास का क्षेत्र स्वच्छ रखें और इसकी जड़ों को कभी हानि न पहुँचाएँ।

पीपल वृक्ष मंत्र

पीपल वृक्ष मंत्र

जल अर्पित करते और वृक्ष की परिक्रमा करते समय यह पारंपरिक मंत्र जपें:

मूलतः ब्रह्मरूपाय, मध्यतः विष्णुरूपिणे। अग्रतः शिवरूपाय, अश्वत्थाय नमो नमः।

इसका अर्थ: अश्वत्थ को नमन, जिसकी जड़ों में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और शिखर पर शिव का वास है। तने में विराजमान विष्णु के लिए सरल ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भी जपा जा सकता है।

पीपल पूजा के लाभ

भक्त मानते हैं कि पीपल पूजा त्रिमूर्ति और लक्ष्मी का संयुक्त आशीर्वाद लाती है, और साढ़े साती जैसे शनि-संबंधी कष्टों को सरल करती है। यह मन की शांति, आर्थिक स्थिरता, पितृ दोष से राहत और नकारात्मकता से रक्षा लाती मानी जाती है। पीपल उदारता से ऑक्सीजन भी देता है, इसलिए इसकी देखभाल एक आध्यात्मिक व पर्यावरणीय भक्ति-कर्म दोनों है।

नियम - करें और न करें

करें: दिन में पूजा कर जल अर्पित करें, क्षेत्र स्वच्छ रखें, दक्षिणावर्त परिक्रमा करें, और छोटे पीपल पौधों को सींचकर पालें। न करें: रात्रि में पीपल को न छुएँ, न पूजें और न परिक्रमा करें, क्योंकि यह विश्राम का समय माना जाता है; जीवित पीपल कभी न काटें और न ही व्यर्थ पत्ते तोड़ें; रविवार और एकादशी को पत्ते तोड़ने से बचें, जो इसके लिए अशुभ माने जाते हैं। वृक्ष के पास सदा सम्मान और स्वच्छ, शांत मन से जाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पीपल वृक्ष में कौन से देवता निवास करते हैं?+

पीपल में त्रिमूर्ति का वास माना जाता है - जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और पत्तों में शिव। देवी लक्ष्मी भी इसमें निवास करती मानी जाती हैं, विशेषकर शनिवार को।

पीपल को जल किस दिन अर्पित करना चाहिए?+

शनिवार सबसे महत्वपूर्ण दिन है, जो शनि देव और लक्ष्मी से जुड़ा है। जल सूर्योदय के बाद प्रातःकाल अर्पित करें, रात्रि में कभी नहीं, क्योंकि अंधेरे के बाद वृक्ष विश्राम करता माना जाता है।

रात्रि में पीपल की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए?+

परंपरा मानती है कि दिन में देवता पीपल में निवास करते हैं, जबकि रात्रि इसका विश्राम काल है। इसलिए भक्त अंधेरे के बाद इसे छूने, परिक्रमा करने या पूजने से बचते हैं।

पीपल वृक्ष मंत्र क्या है?+

एक पारंपरिक मंत्र है 'मूलतः ब्रह्मरूपाय, मध्यतः विष्णुरूपिणे, अग्रतः शिवरूपाय, अश्वत्थाय नमो नमः', जिसे जल अर्पित करते और वृक्ष की परिक्रमा करते समय जपा जाता है।

पीपल की पूजा के क्या लाभ हैं?+

यह त्रिमूर्ति और लक्ष्मी का आशीर्वाद लाती, साढ़े साती जैसे शनि कष्टों को सरल करती, शांति व आर्थिक स्थिरता देती और पितृ दोष व नकारात्मकता से राहत देती मानी जाती है।

क्या पीपल के पत्ते तोड़ना गलत है?+

जीवित पीपल कभी नहीं काटना चाहिए, और पत्ते व्यर्थ नहीं तोड़ने चाहिए। भक्त विशेषकर रविवार और एकादशी को पत्ते तोड़ने से बचते हैं, जो इस पवित्र वृक्ष के लिए अशुभ माने जाते हैं।

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About the author

Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.

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