पृथूदक
पेहोवा हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले का नगर है, सरस्वती के मार्ग पर, कुरुक्षेत्र से लगभग 25 किलोमीटर पश्चिम।
उसका शास्त्रीय नाम पृथूदक है, अर्थात पृथु का कुंड, और वह उत्तर भारत के प्रमुख पितृ तीर्थों में एक है।
वहां क्या है:
- सरस्वती की धारा पर घाट, जहां कर्म होते हैं
- मंदिरों का जमाव, जिनमें कार्तिकेय मंदिर है जो स्वयं दुर्लभ है
- पंडों के प्रतिष्ठान, अर्थात वे कर्म विशेषज्ञ जो कर्म कराते तथा अभिलेख रखते हैं
- वह नगर जिसकी अर्थव्यवस्था बहुत हद तक इसी भूमिका पर चलती है
नाम:
- पृथु पौराणिक परंपरा के राजा थे, जिनसे पृथ्वी को पृथ्वी नाम मिला
- उदक का अर्थ है जल
- पृथूदक उनका कुंड है
- पेहोवा वही नाम है, घिसा हुआ
पृथु की कथा:
- पृथु के पिता वेन दुष्ट राजा थे जिन्होंने यज्ञ रोका और जिन्हें ऋषियों ने नष्ट किया
- उनके शरीर से पृथु उत्पन्न हुए, धर्मी राजा
- पृथ्वी ने गाय का रूप लेकर अपनी उपज रोक ली
- पृथु ने उनका पीछा किया और वे मान गईं, तथा उन्होंने पृथ्वी की समृद्धि मनुष्यों को दी, और उसी से पृथ्वी पृथु की, अर्थात पृथ्वी कहलाई
- पृथु यहां आए और सरस्वती पर अपने पिता वेन के श्राद्ध कर्म किए
- तब से यह स्थान उन कर्मों का स्थल रहा है
यह कथा यहां क्यों महत्व रखती है। यह स्थल जो करता है उसके लिए वही ठीक उत्पत्ति कथा है।
- वेन की मृत्यु बुरी हुई। उनके आचरण के लिए ऋषियों ने उन्हें मारा
- उनके पुत्र ने फिर भी उनके कर्म किए
- वे कर्म स्वीकार हुए
- जिस स्थान पर किसी पुत्र ने अपमान में मरे पिता का श्राद्ध किया वह ठीक उस भूमिका के लिए है जो पेहोवा की है
पेहोवा किसलिए है। यही विशिष्ट बात है और उसे स्पष्ट कहना चाहिए।
पेहोवा वह स्थान है जहां अस्वाभाविक मृत्यु वाले लोगों का श्राद्ध होता है।
- दुर्घटनाएं
- आत्महत्या
- हत्या तथा हिंसक मृत्यु
- डूबने, जलने, सर्प दंश से मृत्यु
- घर से दूर मृत्यु
- उचित कर्मों के बिना मृत्यु
परंपरा मानती है कि ऐसी मृत्यु कर्म अधूरे छोड़ती है, और कि पेहोवा वह स्थान है जहां वे पूरे हो सकते हैं।
अस्वाभाविक मृत्यु भिन्न क्यों मानी जाती है
इसे सावधानी से संभालना चाहिए, क्योंकि यह वास्तविक शोक तथा वास्तविक हानि को छूता है।
परंपरा क्या मानती है:
- परंपरा में अच्छी मृत्यु वह है जो उचित समय पर, घर पर, परिवार की उपस्थिति में, होश में, उचित शब्द कहे जाने सहित आए
- दुर्घटना, हिंसा अथवा आत्महत्या से मृत्यु अकाल मृत्यु है
- ऐसी मृत्यु दिवंगत को अशांत छोड़ती मानी जाती है, और सामान्य श्राद्ध कर्म अपर्याप्त
- विशेष अतिरिक्त कर्म बताए गए हैं, तथा विशेष स्थान, जिनमें पेहोवा एक है, वे माने जाते हैं जहां वे किए जाने चाहिए
- इस बोध में उन कर्मों के बाद ही दिवंगत पितरों तक जा सकते हैं और सामान्य वार्षिक श्राद्ध आरंभ हो सकता है
यह कहां से आता है:
- गरुड़ पुराण, जो हिंदू अंत्येष्टि में पढ़ा जाता प्रमुख ग्रंथ है और जो मृत्यु के बाद की यात्रा विस्तार से रखता है
- अंत्येष्टि के कर्मों पर धर्मशास्त्र का साहित्य
- स्थानीय तथा क्षेत्रीय रीति, जो काफी बदलती है
वह किसी परिवार के लिए क्या करता है। यही भाग गंभीरता से लेने योग्य है।
जिस परिवार का पुत्र किसी दुर्घटना में मरा, अथवा जिसने स्वयं को मार लिया, अथवा जिसकी हत्या हुई, वह ऐसी मृत्यु से जूझ रहा है जिसका वे अर्थ नहीं निकाल सकते और जिसका वस्तुओं के सामान्य क्रम में कोई स्थान नहीं।
परंपरा उन्हें देती है:
- वह कारण कि वह मृत्यु भिन्न क्यों लगती है, और वह लगती है
- करने को कुछ विशेष
- जाने को कोई स्थान, जिसके लिए यात्रा चाहिए
- कर्म की पूर्ति, जिसके बाद सामान्य वार्षिक आयोजन आरंभ हो सके
- उन अन्य लोगों का समुदाय जो उसी के लिए आए हैं
यह किसी को उनके जीवन के सबसे बुरे काल में देने के लिए बड़ा ढांचा है, और अधिकांश समाजों में विकल्प कुछ भी नहीं है।
और हानि। इसे कहना ही पड़ेगा, क्योंकि वह वास्तविक है।
- यह ढांचा यह मानता है कि दिवंगत अशांत हैं, और शोकग्रस्त परिवार को यह बताया जाना कष्टकर बात है
- वह यह विश्वास बना सकता है कि दिवंगत परिवार को कष्ट दे रहे हैं, जो शोक को भय में बदल देता है
- वह बड़ा व्यय बना सकता है, और शोक में डूबे परिवार से अनिश्चित काल तक अतिरिक्त कर्मों का शुल्क लिया जा सकता है
- जहां मृत्यु आत्महत्या से हुई हो वहां यह ढांचा उस कलंक को बढ़ा सकता है जो उससे तथा उस परिवार से पहले ही जुड़ा है
विशेष रूप से आत्महत्या पर। यह सीधे कथन का अधिकारी है।
- आत्महत्या अत्यधिक रूप से उपचार योग्य मानसिक रोग से जुड़ी है, और सबसे सामान्य रूप से अवसाद से
- वह नैतिक चूक, परिवार के प्रति पाप, अथवा दुर्बलता का चिह्न नहीं है
- भारत में आत्महत्या की दर ऊंची है और वह युवाओं में, विशेषकर युवा स्त्रियों में मृत्यु का प्रमुख कारण है
- मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 ने भारत में आत्महत्या के प्रयत्न को अपराध की श्रेणी से हटाया, तथा अभियोजन के बजाय गंभीर तनाव की पूर्वधारणा और देखभाल का अधिकार स्थापित किया
- शोकग्रस्त परिवारों को दोष नहीं, सहारा चाहिए
आप जूझ रहे हों, तो राष्ट्रीय सहायता पंक्ति टेली मानस 14416 है, जो नि:शुल्क तथा अनेक भाषाओं में उपलब्ध है। किरण 1800 599 0019 है। किसी से बात करना ही वह वस्तु है जो सहायता करती है और वह उपलब्ध है।
पेहोवा आते परिवार को क्या जानना चाहिए:
- ये कर्म परंपरा का वैध अंग हैं और उन्हें करना पूरी तरह उचित है
- वे इसका संकेत नहीं हैं कि किसी ने कुछ गलत किया
- जिस व्यक्ति ने आत्महत्या की वह अस्वस्थ थे, और परंपरा की पुरानी भाषा में वह शब्दावली नहीं थी
- लागत पहले से तय कर लें और अतिरिक्त कर्मों के लिए दबाव में न आएं
- कर्मों की पूर्ति का प्रयोजन विश्राम लाना है, परंपरा के बोध में दिवंगत को और वस्तुतः परिवार को
यदि कोई कर्म किसी परिवार को आने से अधिक भयभीत छोड़े तो वह बुरी तरह किया गया, चाहे जो भी पढ़ा गया हो।
पंडों के बहीखाते
पेहोवा के पंडे वंशावली के बहीखाते रखते हैं, और वह कहीं भी अधिक उल्लेखनीय अभिलेख व्यवस्थाओं में एक है।
वे क्या हैं:
- हाथ से लिखे बहीखाते, अर्थात बही अथवा पोथी, जिन्हें पंडित परिवार रखते हैं
- जो उन परिवारों की यात्राएं दर्ज करते हैं जो कर्म करने आए
- जो क्षेत्र, गांव तथा परिवार से व्यवस्थित हैं
- हर परिवार की प्रविष्टियां दर्ज करती हैं कि कौन आया, कब, किसके लिए कर्म हुए, तथा उपस्थित परिजनों के नाम
- प्रविष्टियों पर आने वाले के हस्ताक्षर होते हैं
- बहीखाते पंडे के परिवार में आगे जाते हैं
पहुंचने पर यह कैसे चलता है:
- आप पंडे को अपना गांव तथा अपने परिवार का नाम और समुदाय बताते हैं
- वे पहचानते हैं कि आपके परिवार का बहीखाता किस पंडे के पास है, क्योंकि परिवार क्षेत्र से बंटे हैं
- बहीखाता लाया जाता है
- आपके परिवार की पिछली प्रविष्टियां खोजी जाती हैं
- आप नई प्रविष्टि जोड़ते हैं, इस यात्रा को दर्ज करते हुए
उससे क्या बनता है। किसी साधारण परिवार का वंशावली अभिलेख, जो कुछ स्थितियों में अनेक पीढ़ियों पीछे जाता है, और जो निरंतर रखा गया है।
यह और कहां है:
- हरिद्वार, घाटों पर, जहां पंडों के बहीखाते सर्वाधिक ज्ञात हैं और सबसे बड़ा क्षेत्र समेटते हैं
- पेहोवा, यहां
- गया, प्रयागराज, नासिक, कुरुक्षेत्र, बद्रीनाथ, रामेश्वरम तथा अन्य बड़े तीर्थ
- हर एक के अपने पंडा परिवार तथा अपना क्षेत्रीय बंटवारा
यह ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्व रखता है। इसे स्पष्ट कहना योग्य है क्योंकि ये अभिलेख सचमुच महत्वपूर्ण हैं।
- भारत में साधारण परिवारों के निरंतर वंशावली अभिलेख बहुत कम हैं
- जनगणना के अभिलेख उन्नीसवीं शताब्दी से आरंभ होते हैं और वे व्यक्तियों को समय के साथ दर्ज नहीं करते
- भूमि के अभिलेख हैं पर वे बिखरे हैं और वे संपत्ति के हैं, परिवारों के नहीं
- पंडों के बहीखाते अनेक परिवारों के लिए उनके पूर्वजों का एकमात्र लिखित अभिलेख हैं
वे क्या बता सकते हैं:
- आपके पूर्वजों के नाम, अनेक स्थितियों में कई पीढ़ियों पीछे तक
- परिवार कहां रहता था, और वह कब हटा
- परिवार की घटनाएं, क्योंकि यात्राएं मृत्यु के आसपास जुटती हैं
- कुछ स्थितियों में व्यवसाय, परिस्थितियों अथवा घटनाओं पर टिप्पणियां
विभाजन। यहीं इन बहीखातों ने विशेष महत्व पाया।
- 1947 में जो पाकिस्तान बना वहां से विस्थापित परिवारों ने सब कुछ खोया, कागज़ भी
- उनमें बहुत से लोगों के लिए उनके पैतृक गांव तथा परिवार का एकमात्र अभिलेख हरिद्वार अथवा पेहोवा के किसी पंडे के बहीखाते में है
- वंशज उसे खोजने गए हैं, और जाते रहते हैं
- जो परिवार उस गांव नहीं जा सकता जहां से वह आया, उसके लिए बहीखाता वही है जो शेष है
अभिलेखों की दशा:
- वे कागज़ पर हाथ से लिखे हैं, भिन्न लिपियों तथा हस्तलेखों में, और अनेक पुराने तथा नाज़ुक हैं
- उन्हें पंडा परिवार निजी रूप से रखते हैं और कोई केंद्रीय सूची नहीं है
- कुछ खो गए, क्षतिग्रस्त हुए अथवा नष्ट हुए हैं
- अंकीकरण के प्रयत्न आरंभ हुए हैं पर वे आंशिक हैं
- पहुंच पूरी तरह संबंधित पंडा परिवार पर निर्भर है
अपना खोजना चाहें तो:
- आपको अपना पैतृक गांव, अपनी जाति अथवा समुदाय तथा अपना कुल नाम चाहिए
- घाट पर जाकर पूछें; पंडे आपको ठीक परिवार तक भेज देंगे
- तैयार रहें कि उसमें समय लगेगा और भुगतान होगा, और यह व्यवस्था सदा ऐसे ही चली है
- अनुमति हो तो फोटो लें, क्योंकि वह अभिलेख नाज़ुक है
- यह लक्ष्य करें कि पंडे किसी के परिवार के इतिहास के रक्षक हैं और उनके साथ तदनुसार बरतें
एक सावधानी। इस व्यवस्था में भुगतान आता है और इसमें लोगों से बहुत अधिक लेने की गुंजाइश है, विशेषकर तब जब वे किसी पूर्वज का नाम पाकर भावुक हों।
आप किसके लिए दे रहे हैं यह पहले तय कर लें। अभिलेख या तो है या नहीं है, और जो पंडा शुल्क लेने के लिए उत्तरोत्तर विस्तृत बातें खोजे उसके साथ वही संशय रखना चाहिए जो आप कहीं और रखते।
कार्तिकेय मंदिर

पेहोवा कार्तिकेय मंदिर धारण करता है, और उत्तर भारत में कार्तिकेय का मंदिर सचमुच असामान्य है।
कार्तिकेय कौन हैं:
- शिव तथा पार्वती के पुत्र, गणेश के भाई
- दिव्य सेनाओं के सेनापति, जो असुर तारक के वध के लिए उत्पन्न हुए
- जिन्हें स्कंद, मुरुगन, सुब्रह्मण्य, षण्मुख, कुमार, गुह तथा अनेक अन्य नामों से कहा जाता है
- जो शिव के तेज से जन्मे, जिन्हें अग्नि तथा गंगा ने ढोया, और जिन्हें छह कृत्तिकाओं ने पाला, अर्थात कृत्तिका नक्षत्र ने, जिससे उनके छह मुख तथा कार्तिकेय नाम है
- जिनका वाहन मयूर तथा अस्त्र वेल अथवा शक्ति है
उत्तर दक्षिण की बड़ी विषमता। यही रोचक तथ्य है।
- तमिलनाडु में मुरुगन के रूप में कार्तिकेय तर्क से प्रमुख देवता हैं, जहां अरुपडै वीडु, अर्थात छह धाम विशाल संख्या खींचते हैं, और जहां पूरा भक्ति साहित्य तथा पर्व पंचांग है
- केरल, कर्नाटक तथा आंध्र में सुब्रह्मण्य की व्यापक उपासना है, जहां कुक्के सुब्रह्मण्य, पलनी तथा तिरुचेंदूर जैसे बड़े स्थान हैं
- उत्तर भारत में कार्तिकेय के मंदिर दुर्लभ हैं, और प्रचलित उपासना में वे अपेक्षाकृत किनारे हैं
- उनके भाई गणेश कुछ हद तक उलटा ढांचा दिखाते हैं, क्योंकि वे सर्वत्र हैं पर उनकी सबसे बड़ी प्रचलित पकड़ पश्चिम तथा उत्तर में है
यह विषमता क्यों। कई व्याख्याएं दी जाती हैं और कोई पूर्ण नहीं है।
- आरंभिक ऐतिहासिक काल में कार्तिकेय उत्तर भारत में प्रमुख थे। कुषाण सिक्के उन्हें लिए हैं, गुप्त शासकों ने उनसे नाम लिए, और स्कंद पुराण तथा आरंभिक मूर्तिकला बड़ी उपासना प्रमाणित करते हैं
- फिर उत्तर में उनकी उपासना काफी घटी, उस काल में जो लगभग मध्यकाल तक समाप्त हुआ
- दक्षिण में वे पहाड़ों के स्वदेशी तमिल देवता मुरुगन से पहचाने गए, और उस पहचान ने वह अत्यंत प्रबल संश्लेषण बनाया जो चलता रहा है
- उत्तर में ह्रास की व्याख्याओं में अन्य देवताओं का उदय, उनकी भूमिकाओं का समावेश, तथा संरक्षण के परिवर्तन आते हैं
रोक। उत्तर भारत के अनेक कार्तिकेय स्थानों पर, जिनमें पेहोवा है, यह परंपरा है कि स्त्रियां भीतर नहीं जातीं अथवा दर्शन नहीं करतीं।
क्यों। दी जाती व्याख्याएं भिन्न हैं और उन्हें रखना योग्य है।
- कि उत्तर भारतीय परंपरा में कार्तिकेय ब्रह्मचारी हैं, दक्षिण के विपरीत जहां मुरुगन की दो संगिनियां वल्ली तथा देवसेना हैं
- कि वे किसी बात से क्रुद्ध हुए और रोक उसी से आती है
- विभिन्न स्थानीय कथाएं
इसे कैसे लें। सीधे।
- यह रोक इन स्थानों पर है और आगंतुकों को उसका बोध होना चाहिए
- वह स्थानीय रीति है, कोई सार्वभौमिक हिंदू नियम नहीं, और दक्षिण में उन्हीं देवता की उपासना स्त्रियां विशाल संख्या में करती हैं
- इस प्रकार की रोकों का भारत में विरोध हुआ है, न्यायालयों में भी, और सबरीमला का मुकदमा सर्वाधिक ज्ञात उदाहरण है
- वंदना का पक्ष यह है कि किसी स्त्री की देवता तक पहुंच वह वस्तु नहीं जिसे सीमित करने का बचाव कोई विवरण करे, और कि दक्षिण भारतीय रीति, जहां मुरुगन के भक्तों में स्त्रियां बहुसंख्या हैं, इसका प्रमाण है कि इसमें कोई सैद्धांतिक अनिवार्यता नहीं
- आगंतुक को यह करना चाहिए कि पहुंचने से पहले स्थानीय रीति जान ले और स्वयं तय करे
तुलना के लिए दक्षिण की मुरुगन परंपरा:
- अरुपडै वीडु, अर्थात छह धाम: पलनी, स्वामिमलै, तिरुचेंदूर, तिरुपरंकुंड्रम, पऴमुदिर्चोलै तथा तिरुत्तणि
- तैपूसम, वह बड़ा पर्व, जो तमिलनाडु, मलेशिया, सिंगापुर तथा जहां जहां तमिल गए वहां मनाया जाता है, और जिसमें कावड़ी ढोना तथा देह बेधने की मनौतियां आती हैं
- अरुणगिरिनाथर का तिरुप्पुगऴ, जो तमिल भक्ति काव्य के बड़े समूहों में एक है
- अत्यंत बड़े पैमाने की जीवित परंपरा
हरियाणा के किसी छोटे कार्तिकेय मंदिर में खड़ा होना, जहां वस्तुतः कोई नहीं जाता, और यह जानना कि तमिलनाडु में उन्हीं देवता को करोड़ों की भक्ति मिलती है, इसका अधिक तीखा उदाहरण है कि कोई एक परंपरा भिन्न क्षेत्रों में कितने भिन्न रूप से विकसित होती है।
सरस्वती
पेहोवा सरस्वती पर है, और उसका क्या अर्थ है यह समझाना आवश्यक है।
ऋग्वैदिक सरस्वती। तेलंगाना के बैच में बासर में रखी गई, और फिर कहने योग्य।
- ऋग्वेद में नदी, जिसे नदियों में महानतम कहा गया है, और जो पर्वतों से समुद्र तक बहती थी
- जो बाद में मुख्यतः वाणी तथा विद्या की देवी बनीं
- स्वयं वह नदी प्रायः सूख गई अथवा जिसका मार्ग बदला माना जाता है
घग्घर हाकरा:
- वह ऋतु पर निर्भर नदी प्रणाली जो शिवालिक से होकर हरियाणा, पंजाब तथा राजस्थान से कच्छ के रण की ओर चलती है
- जो वर्षा में प्रबल बहती है और अन्यथा अधिकांशतः सूखी रहती है
- जिसे प्रायः ऋग्वैदिक सरस्वती से पहचाना जाता है
- जिसके पाट के किनारे बहुत बड़ी संख्या में हड़प्पा स्थल हैं, और इसीलिए यह पहचान पुरातत्व की दृष्टि से महत्व रखती है
क्या माना जाता है और क्या नहीं:
माना जाता है:
- इस क्षेत्र से बड़ी नदी प्रणाली बहती थी और वह क्षीण हुई
- हड़प्पा की बसावट उसके किनारे केंद्रित थी
- उसका ह्रास हड़प्पा की बसावट के पूर्व की ओर खिसकने से जुड़ा है
- पुराने पाट उपग्रह चित्रों में दिखते हैं और उनका मानचित्र बना है
विवादित है:
- कि घग्घर हाकरा ऋग्वैदिक सरस्वती है या नहीं
- वह कब सूखी और वह ऋग्वेद से पहले की है या बाद की
- कि उसे कभी हिमालय के हिमनद स्रोत भरते थे अथवा वह सदा वर्षा से भरती थी
- ऋग्वेद के काल निर्धारण तथा भारतीय आर्य उत्पत्ति के व्यापक तर्क के लिए उसके क्या निष्कर्ष हैं, और वहीं यह बहस तीखी हो जाती है
यह तर्क तीखा क्यों है। इसे स्पष्ट कहना चाहिए।
सरस्वती का काल निर्धारण तथा पहचान इस प्रश्न से जुड़ी है कि वैदिक संस्कृति उपमहाद्वीप की अपनी थी अथवा बाहर से आई, और वह भारतीय पुरातत्व के सर्वाधिक राजनीतिक रूप से आवेशित प्रश्नों में एक है।
उस आवेश ने विज्ञान की सहायता नहीं की। पक्ष कठोर हुए हैं, प्रमाण सब ओर से चुनकर प्रयोग हुए हैं, और किसी नदी प्रणाली पर प्रश्नों का सचमुच रोचक समुच्चय किसी और बात का प्रतिनिधि बन गया है।
अब पेहोवा में क्या है:
- सरस्वती का नाम लिए धारा
- उसमें जल, जो वर्षा के प्रवाह तथा हाल के दशकों में नहर बनाने और पुनरुद्धार के प्रयत्नों के मेल से है
- हरियाणा के सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड ने धारा के पुनरुद्धार पर काम किया है, और पेहोवा तथा आदि बद्री सहित भागों तक जल लाया गया है
- वह प्राचीन नदी का पुनरुद्धार है अथवा उसके पुराने मार्ग पर नहर बनाना, यह परिभाषा का विषय है
आदि बद्री। उल्लेख योग्य है। यमुनानगर ज़िले में, शिवालिक की तलहटी में, वह स्थल है जिसे सरस्वती का उद्गम माना जाता है, जहां मंदिर हैं, और उसे उसी कार्यक्रम के अंग के रूप में विकसित किया गया है।
किसी तीर्थ पर इस सबको कैसे थामें। पेहोवा के कर्म सरस्वती पर होते हैं, और परंपरा मानती है कि यही सरस्वती हैं।
जो जांचा जा सकता है वह यह है कि वहां धारा है, कि उसे बहुत लंबे समय से सरस्वती कहा जाता रहा है, कि उस तीर्थ का अधिकार उसी पहचान पर टिका है, और कि परिवार अनेक शताब्दियों से उसी जल पर कर्म करने यहां आते रहे हैं।
उसमें अब जो जल है वह वही जल है या नहीं जिसकी ऋग्वेद ने प्रशंसा की, यह जल विज्ञान तथा पुरातत्व का प्रश्न है। वे कर्म उस उत्तर पर निर्भर नहीं हैं, और कभी नहीं थे।
पेहोवा की यात्रा
कैसे पहुंचें
- पेहोवा, कुरुक्षेत्र ज़िला, हरियाणा, सरस्वती पर
- कुरुक्षेत्र से लगभग 25 किलोमीटर पश्चिम
- दिल्ली से करीब 185 किलोमीटर
- निकटतम रेलहेड कुरुक्षेत्र जंक्शन है
- हवाई अड्डों के लिए दिल्ली तथा चंडीगढ़
- कुरुक्षेत्र, अंबाला तथा पटियाला से बसें चलती हैं
कब जाएं
- पितृ पक्ष, भाद्रपद अथवा आश्विन का पखवाड़ा, प्रायः सितंबर या अक्टूबर, जो प्रमुख काल है
- सोमवती अमावस्या तथा अन्य अमावस्या के दिन
- सूर्य ग्रहण के दिन
- कर्म वर्ष भर होते हैं और किसी परिवार के आने पर कब की कोई रोक नहीं
- मौसम के लिए अक्टूबर से मार्च
कर्मों के लिए आ रहे हों तो
- दिवंगत के ब्योरे लाएं: नाम, पिता का नाम, ज्ञात हो तो गोत्र, मृत्यु की तिथि तथा परिस्थितियां
- अपने गांव तथा परिवार के ब्योरे लाएं, ताकि पंडा आपका बहीखाता खोज सके
- लागत पहले से तय करें, पूरी, और हो सके तो लिखित में
- किसी को साथ लाएं। टाल सकें तो यह अकेले न करें
- पूरा दिन रखें
- यह समझें कि उस कर्म का प्रयोजन विश्राम लाना है, और कि आप आने से अधिक व्यथित होकर लौटें तो कुछ चूका है
परिवार के अभिलेख खोज रहे हों तो
- अपने पैतृक गांव का नाम, अपना समुदाय तथा अपना कुल नाम लाएं
- घाट पर पूछें और आपको भेज दिया जाएगा
- समय रखें तथा भुगतान की अपेक्षा रखें
- जो मिले उसकी अनुमति सहित फोटो लें
व्यावहारिक बातें
- पेहोवा छोटा नगर है जहां मूल सुविधाएं हैं
- कुरुक्षेत्र में बेहतर ठहराव है
- नकद
- परंपरागत वस्त्र उचित हैं
नगर में क्या है
- सरस्वती पर घाट
- कार्तिकेय मंदिर, ऊपर बताई रोक सहित
- अन्य कई मंदिर
- पंडों के प्रतिष्ठान
- वार्षिक पेहोवा घोड़ा मेला, जो उत्तर भारत के बड़े घोड़ा तथा पशु मेलों में एक है और जो तीर्थ से पूरी तरह भिन्न दृश्य है
घोड़ा मेला। जानने योग्य है क्योंकि वह अप्रत्याशित है।
पेहोवा में बड़ा वार्षिक घोड़ा मेला होता है, जो उत्तर भारत भर से व्यापारी तथा पालक खींचता है, और जिसमें घोड़े दिखाए, बेचे तथा दौड़ाए जाते हैं। वह बड़ी व्यापारिक घटना है जिसमें धार्मिक कुछ नहीं।
जिस नगर की प्रमुख भूमिका बुरी मृत्यु वालों के अंत्येष्टि कर्म हों वह क्षेत्र के सबसे बड़े घोड़ा बाज़ारों में एक भी रखे, यह उसी प्रकार का मेल है जो भारतीय नगर लगातार बनाते हैं।
यात्रा को जोड़ना
- कुरुक्षेत्र, 25 किलोमीटर, इस बैच में बताई हर वस्तु सहित
- थानेसर, भद्रकाली, ज्योतिसर, ब्रह्म सरोवर
- कपाल मोचन, लगभग 110 किलोमीटर, जो इस बैच में बताया गया है
- पटियाला, लगभग 60 किलोमीटर
- यमुनानगर ज़िले का आदि बद्री, सरस्वती का उद्गम स्थल
- उत्तर में अंबाला तथा चंडीगढ़
अंत में एक बात। अधिकांश तीर्थ सौभाग्यशालियों के लिए हैं: उन लोगों के लिए जो कुछ मांग रहे हैं, धन्यवाद दे रहे हैं, किसी अच्छे अवसर को चिह्नित कर रहे हैं।
पेहोवा दूसरी बात के लिए है। वह वह स्थान है जहां आप तब जाते हैं जब आपके परिवार में कोई ऐसे मरा हो जिसका कोई अर्थ नहीं निकाल सकता, और किसी ने आपको बताया हो कि कोई स्थान है जहां वे कर्म पूरे हो सकते हैं।
जो नगर उन परिवारों को लेने के लिए है, और बहुत लंबे समय से है, और जो हर आए परिवार का लिखित अभिलेख रखता है, वह सेवा दे रहा है जो उस समाज की कोई अन्य संस्था नहीं देती।
उसके पीछे का सिद्धांत ठीक है या नहीं यह एक प्रश्न है। कि वह शोक में डूबे लोगों को जाने का स्थान तथा करने को कुछ देता है इस पर संदेह नहीं, और वह कुछ नहीं ऐसा नहीं है।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
पेहोवा कहां है और वह किसलिए है?+
हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले में, सरस्वती पर, कुरुक्षेत्र से लगभग 25 किलोमीटर पश्चिम तथा दिल्ली से करीब 185 किलोमीटर। उसका शास्त्रीय नाम पृथूदक है और वह उत्तर भारत के प्रमुख पितृ तीर्थों में एक है, जहां विशेष रूप से अस्वाभाविक मृत्यु वालों का श्राद्ध होता है: दुर्घटनाएं, आत्महत्या, हत्या, डूबना, जलना, सर्प दंश अथवा घर से दूर मृत्यु।
अस्वाभाविक मृत्यु भिन्न क्यों मानी जाती है?+
परंपरा मानती है कि अच्छी मृत्यु उचित समय पर, घर पर, परिवार की उपस्थिति में आती है, और कि अकाल मृत्यु दिवंगत को अशांत तथा सामान्य श्राद्ध कर्म अपर्याप्त छोड़ती है, इसलिए विशेष स्थानों पर अतिरिक्त कर्म बताए गए हैं। वह शोकग्रस्त परिवार को कारण, करने को कुछ, जाने को स्थान तथा कर्म की पूर्ति देता है, और वह उनके जीवन के सबसे बुरे समय में बड़ा ढांचा है।
पंडों के बहीखाते क्या हैं?+
पंडित परिवारों के रखे हाथ से लिखे वंशावली बहीखाते, जो क्षेत्र, गांव तथा परिवार से व्यवस्थित हैं, और जो दर्ज करते हैं कि कौन आया, कब, किसके लिए कर्म हुए तथा उपस्थित लोगों के नाम, जिन पर आने वाले के हस्ताक्षर होते हैं और जो पंडे के परिवार में आगे जाते हैं। अनेक भारतीय परिवारों के लिए वे उनके पूर्वजों का एकमात्र लिखित अभिलेख हैं, और विभाजन में विस्थापित परिवारों के लिए वे प्रायः उस गांव का एकमात्र अभिलेख हैं जहां से वे आए।
अपने परिवार का बहीखाता कैसे खोजें?+
आपको अपने पैतृक गांव का नाम, अपनी जाति अथवा समुदाय तथा अपना कुल नाम चाहिए। घाट पर जाकर पूछें; पंडे आपको उस परिवार तक भेज देंगे जिसके पास आपके क्षेत्र का बहीखाता है। समय रखें, भुगतान की अपेक्षा रखें, आप किसके लिए दे रहे हैं यह पहले तय करें, और अनुमति हो तो जो मिले उसकी फोटो लें क्योंकि अभिलेख नाज़ुक हैं।
क्या स्त्रियां पेहोवा के कार्तिकेय मंदिर में जा सकती हैं?+
उत्तर भारत के अनेक कार्तिकेय स्थानों पर, जिनमें यह भी है, यह परंपरा है कि स्त्रियां भीतर नहीं जातीं अथवा दर्शन नहीं करतीं, और उसे उत्तर भारतीय परंपरा में उनके ब्रह्मचारी होने से समझाया जाता है। वह स्थानीय रीति है, कोई सार्वभौमिक नियम नहीं, और दक्षिण भारत में मुरुगन के रूप में उन्हीं देवता की उपासना स्त्रियां विशाल संख्या में करती हैं, जो इसका प्रमाण है कि इसमें कोई सैद्धांतिक अनिवार्यता नहीं। पहुंचने से पहले स्थानीय रीति जानें और स्वयं तय करें।
कर्मों के लिए आते परिवार को क्या जानना चाहिए?+
दिवंगत के ब्योरे तथा अपने गांव और परिवार के ब्योरे लाएं ताकि पंडा आपका बहीखाता खोज सके। लागत पहले से पूरी तय करें। किसी को साथ लाएं और पूरा दिन रखें। ये कर्म परंपरा का वैध अंग हैं और वे इसका संकेत नहीं कि किसी ने कुछ गलत किया, और आप आने से अधिक व्यथित होकर लौटें तो कुछ चूका है। जो कोई जूझ रहा हो, टेली मानस 14416 है और किरण 1800 599 0019।
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