स्कंद षष्ठी क्या है
स्कंद षष्ठी भगवान मुरुगन (जिन्हें कार्तिकेय, स्कंद या सुब्रमण्य भी कहते हैं) का सम्मान करती है, जो शिव व पार्वती के योद्धा पुत्र और देवताओं की सेना के सेनापति हैं। यह पर्व उनकी राक्षस सूरपद्म पर महान विजय का उत्सव है, अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की जीत। यह विशेषकर तमिलनाडु व दक्षिण भारत में महत्वपूर्ण है, जहाँ तिरुचेंदूर व पलनी जैसे मुरुगन मंदिर भव्य उत्सव और उनके युद्ध का नाटकीय पुनर्मंचन करते हैं।
तिथि और 2026 में कब पड़ती है
स्कंद षष्ठी तमिल मास ऐप्पसि के शुक्ल पक्ष की षष्ठी (छठी तिथि) को रखी जाती है, जो कार्तिक (लगभग अक्टूबर से नवंबर) के अनुरूप है। छह दिवसीय व्रत प्रतिपदा (प्रथम तिथि) से आरंभ होकर षष्ठी को सूरसंहारम के साथ चरम पर पहुँचता है। 2026 में यह अक्टूबर से नवंबर के कार्तिक या ऐप्पसि काल में पड़ती है; सटीक दिन चंद्र तिथि पर निर्भर होने के कारण, सटीक तिथियाँ सदैव विश्वसनीय क्षेत्रीय पंचांग से सुनिश्चित करें।
महत्व और कथा
महान शक्ति से वरदान प्राप्त असुर सूरपद्म ने देवताओं व तीनों लोकों को आतंकित किया। धर्म की पुनर्स्थापना हेतु शिव की ऊर्जा से मुरुगन प्रकट हुए, जिन्होंने अपनी माता पार्वती द्वारा दिए वेल (पवित्र भाला) से दिव्य सेना का नेतृत्व किया। छह दिन के घोर युद्ध के बाद मुरुगन ने षष्ठी को सूरपद्म को पराजित किया। जब राक्षस ने पश्चाताप किया, प्रभु ने उसे अपने मयूर वाहन और ध्वज के मुर्गे में बदल दिया। कथा सिखाती है कि समर्पण से पतित भी मुक्त हो सकता है, और दिव्य कृपा सदैव अहंकार पर विजयी होती है।
सूरसंहारम

स्कंद षष्ठी का चरमोत्कर्ष सूरसंहारम है - मुरुगन द्वारा सूरपद्म वध का अनुष्ठानिक पुनर्मंचन, जो छठे दिन प्रमुख मंदिरों, विशेषकर तिरुचेंदूर में किया जाता है। भक्त विशाल संख्या में वेल द्वारा राक्षस को बेधते देखने एकत्र होते हैं, जो भीतर के अहंकार, अज्ञान व बुराई के नाश का शक्तिशाली प्रतीक है। अगला दिन तिरुकल्याणम के रूप में मनाया जाता है, मुरुगन व देवयानी का दिव्य विवाह, जो विजय के बाद आनंद व नवीनीकरण का प्रतीक है।
पूजा विधि और छह दिवसीय व्रत
1. व्रत प्रतिपदा से आरंभ होकर षष्ठी तक छह दिन चलता है। 2. प्रत्येक प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें, फिर मुरुगन की मूर्ति के समक्ष वेल सहित उपासना करें। 3. पुष्प, चंदन, फल और भोग जैसे पंचामृत, मीठा पोंगल या फल अर्पित करें। 4. प्रतिदिन स्कंद षष्ठी कवचम, सुब्रमण्य भुजंगम या मुरुगन के नाम पढ़ें। 5. अनेक भक्त छह दिन आंशिक उपवास रखते हैं, एक सात्विक भोजन या केवल फल व दूध लेते हैं, और षष्ठी को कठोर उपवास। 6. षष्ठी को सूरसंहारम देखें या स्मरण करें, आरती करें, और संध्या उपासना के बाद व्रत खोलें।
व्रत के नियम
भक्त छह दिन सात्विक उपवास रखते हैं, प्याज, लहसुन, मद्य और मांसाहार से पूर्णतः बचते हुए। अनेक केवल फल, दूध और हल्का सात्विक भोजन दिन में एक बार लेते हैं, जबकि सबसे श्रद्धालु अंतिम षष्ठी को सूरसंहारम तक लगभग पूर्ण उपवास रखते हैं। स्वच्छता, विचारों की शुद्धता, और शांत, एकाग्र मन बनाए रखें। व्रत प्रसाद से खोला जाता है, परंपरागत रूप से चंद्र दर्शन या संध्या पूजा पूर्ण करने के बाद।
मंत्र और स्कंद षष्ठी कवचम

मुख्य मुरुगन मंत्र है:
ॐ सरवणभव नमः
इन दिनों का सबसे शक्तिशाली पाठ स्कंद षष्ठी कवचम है, देवरायस्वामिगल द्वारा रचित रक्षक स्तोत्र, जो भक्तों को भय, रोग व नकारात्मकता से बचाता माना जाता है। प्रतिदिन ॐ सरवणभव नमः का 108 बार जप करें, और तन-मन पर मुरुगन की वेल-सम रक्षा के आह्वान हेतु कवचम भक्ति से पढ़ें।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
स्कंद षष्ठी किसका उत्सव है?+
यह भगवान मुरुगन की राक्षस सूरपद्म पर विजय, बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव है। छह दिवसीय पर्व सूरसंहारम में चरम पर पहुँचता है, जो राक्षस की पराजय का अनुष्ठानिक पुनर्मंचन है।
2026 में स्कंद षष्ठी कब है?+
यह तमिल मास ऐप्पसि (कार्तिक) के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को, लगभग अक्टूबर से नवंबर 2026 में पड़ती है। छह दिवसीय व्रत प्रतिपदा से आरंभ होता है। सटीक तिथियाँ सदैव क्षेत्रीय पंचांग से सुनिश्चित करें।
सूरसंहारम क्या है?+
सूरसंहारम मुरुगन द्वारा अपने वेल से राक्षस सूरपद्म वध का नाटकीय पुनर्मंचन है, जो छठे दिन तिरुचेंदूर जैसे मंदिरों में किया जाता है। यह भीतर के अहंकार, अज्ञान व बुराई के नाश का प्रतीक है।
स्कंद षष्ठी व्रत कितने दिन का है?+
व्रत छह दिन का है, जो प्रतिपदा से आरंभ होकर षष्ठी को समाप्त होता है। भक्त सात्विक उपवास रखते हैं, प्रायः केवल फल, दूध या दिन में एक हल्का भोजन लेते हैं, अंतिम षष्ठी को कठोर उपवास के साथ।
स्कंद षष्ठी कवचम क्या है?+
यह भगवान मुरुगन का शक्तिशाली रक्षक स्तोत्र है, देवरायस्वामिगल द्वारा रचित, विशेषकर इन छह दिनों में पढ़ा जाता है। यह भक्तों को भय, रोग व नकारात्मक शक्तियों से बचाता माना जाता है।
मुख्य मुरुगन मंत्र क्या है?+
मुख्य मंत्र 'ॐ सरवणभव नमः' है, जिसे व्रत के दौरान प्रतिदिन 108 बार जपा जाता है। 'सरवणभव' मुरुगन के सरवण सरकंडों में जन्म को दर्शाता है और उनका सबसे प्रिय आह्वान है।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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