तट पर का मंदिर
सुक्रेश्वर मंदिर गुवाहाटी की संध्याचल पहाड़ी पर है, ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी तट पर, जिसके घाट की सीढ़ियां नदी में उतरती हैं।
वहां क्या है:
- काफी बड़ा शिव लिंग, असम के सबसे बड़े लिंगों में
- वह लिंग मंदिर के तल से नीचे के कक्ष में है, इसलिए उपासक उसे नीचे देखते हैं
- नदी तक सीढ़ियों वाला घाट
- ब्रह्मपुत्र के पार मयूर द्वीप पर उमानंद तथा उत्तरी तट का दृश्य
भवन:
- जिसे अहोम राजा प्रमत्त सिंह ने 1744 में बनवाया
- जिसकी मरम्मत रजेश्वर सिंह ने कराई, जिन्होंने नवग्रह मंदिर भी बनवाया
- जिसका स्थल अहोम रचना से पुराना है
- जो भूकंप से क्षतिग्रस्त हुआ और सुधरा, जैसा गुवाहाटी के लगभग सभी पुराने मंदिरों के साथ है
नाम। सुक्रेश्वर का अर्थ सुक्र के ईश्वर है, और वह ऋषि शुक्राचार्य से जुड़ा है।
- शुक्राचार्य असुरों के गुरु हैं, दैत्यों के आचार्य
- उनके पास संजीवनी विद्या थी, अर्थात मृतकों को जिलाने का ज्ञान
- वे शुक्र ग्रह से पहचाने जाते हैं
- परंपरा उन्हें इसी स्थल पर तप करते रखती है
गड्ढे में लिंग क्यों। यह व्यवस्था उल्लेख योग्य है क्योंकि वह असामान्य है।
अधिकांश मंदिरों में लिंग उस तल पर या उससे थोड़ा नीचे होता है जहां उपासक खड़ा होता है। यहां वह धंसे कक्ष में है, और आगंतुक उतरता है अथवा नीचे देखता है।
उससे उस स्थान का अनुभव भिन्न बनता है। आप उसके आगे नहीं ऊपर होते हैं, जो सामान्य संबंध नहीं है, और उससे उस पाषाण का आकार उस तरह दिखता है जैसे उठे लिंग में नहीं दिखता।
घाट। सुक्रेश्वर की सीढ़ियां ब्रह्मपुत्र में उतरती हैं और घाट प्रयोग में है।
- लोग यहां स्नान करते हैं
- सीढ़ियों पर श्राद्ध तथा तर्पण होते हैं
- ब्रह्मपुत्र स्वयं तीर्थ है और मंदिर का नदी तट से मिलना ही ऐसे स्थान को उसका काम देता है
- अमावस्या, संक्रांति तथा ग्रहण के दिन घाट पर लोग आते हैं
सुक्रेश्वर जनार्दन मंदिर। पास ही, और उल्लेख योग्य, एक विष्णु स्थान है, इसलिए वह पहाड़ी दोनों परंपराएं लिए है।
वह जोड़ा, अर्थात एक ही पहाड़ी अथवा एक ही परिसर में शिव मंदिर और विष्णु मंदिर, भारतीय व्यवहार में अत्यंत सामान्य है और उस परंपरा को दर्शाता है जिसने दोनों को कभी उस तरह प्रतिद्वंद्वी नहीं माना जैसा बाहर के विवरण कभी कभी बताते हैं।
शुक्राचार्य तथा संजीवनी
जिन ऋषि के नाम पर यह मंदिर है वे परंपरा की अधिक रोचक आकृतियों में हैं, और उनकी कथा ठीक से कहने योग्य है।
वे कौन हैं:
- भृगु के पुत्र, महान ऋषियों में एक
- असुरों के गुरु, दैत्यों तथा दानवों के आचार्य
- शुक्र नीति के रचयिता, अर्थात राजनीति तथा आचार पर ग्रंथ के
- जो शुक्र ग्रह से पहचाने जाते हैं
- जिनके पास संजीवनी विद्या थी, अर्थात मृतकों को जिलाने का ज्ञान
संजीवनी। उनके विषय में यही केंद्रीय तथ्य है।
देवों के गुरु बृहस्पति थे। असुरों के शुक्राचार्य। जब वे लड़ते, देव असुरों को मारते और असुर देवों को।
पर शुक्राचार्य मरे असुरों को जिला सकते थे, और बृहस्पति मरे देवों को नहीं जिला सकते थे।
उस असमानता का अर्थ था कि देव हार रहे थे, और उन्होंने उससे कैसे निपटा यही उस प्रसंग की वस्तु है।
कच तथा देवयानी। वह कथा, जो महाभारत की बेहतर कथाओं में है।
- देवों ने बृहस्पति के पुत्र कच को शुक्राचार्य के पास शिष्य बनाकर भेजा, संजीवनी सीखने
- शुक्राचार्य ने उन्हें स्वीकारा, क्योंकि गुरु शिष्य को मना नहीं करता
- असुरों ने, जो हो रहा था वह समझकर, कच को मार दिया
- शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को कच से लगाव हो गया था और उन्होंने पिता से उन्हें लौटाने को कहा
- शुक्राचार्य ने संजीवनी से उन्हें जिलाया
- असुरों ने उन्हें फिर मारा, देह जलाई और राख मदिरा में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दी
- देवयानी ने फिर कच को मांगा
- शुक्राचार्य ने पाया कि कच उनके भीतर हैं, और उन्हें जिलाने से स्वयं की मृत्यु होगी
- इसलिए उन्होंने कच को अपने भीतर रहते ही संजीवनी सिखाई, फिर उन्हें निकलने दिया, जिससे शुक्राचार्य मरे, और फिर कच ने नई सीखी विद्या से अपने गुरु को जिलाया
- फिर कच वह ज्ञान लेकर देवों के पास लौटे
देवयानी का भाग। फिर उन्होंने कच से विवाह करने को कहा।
उन्होंने मना किया, यह कहकर कि उनके पिता की देह से निकलने के कारण वे एक अर्थ में उनके भाई हैं।
उन्होंने शाप दिया कि वह विद्या तब काम नहीं करेगी जब वे स्वयं उसका प्रयोग करेंगे, केवल तब जब वे दूसरों को सिखाएंगे। उन्होंने माना, और बदले में शाप दिया कि किसी ब्राह्मण का पुत्र उनसे विवाह नहीं करेगा।
और इसी कारण उन्होंने बाद में क्षत्रिय ययाति से विवाह किया, और वह विवाह अपनी लंबी कथा बनाता है।
वह प्रसंग किस विषय में है। वह ज्ञान की तथा उसके चलने की कथा है।
एक पक्ष के पास रखा ज्ञान लाभ है। सच्चे शिष्य से ज्ञान रोका नहीं जा सकता बिना गुरु का धर्म तोड़े। इसलिए वह लाभ रखा नहीं जा सकता।
और संजीवनी, एक बार सिखाई जाने पर, सिखाए गए के लिए काम करती है पर गुरु के अपने प्रयोग के लिए नहीं, जो उस शाप की वस्तु है और जो इसका काफी ठीक विवरण है कि ज्ञान के संचरित होने पर उसका क्या होता है।
मदिरा वाली बात। एक दूसरा परिणाम प्रायः बताया जाता है।
शुक्राचार्य ने बिना जाने पिया कि पात्र में क्या है, और उसी से असुर उन्हें छल सके। उस प्रसंग के बाद कहा जाता है कि उन्होंने ब्राह्मणों के लिए मादक पेय वर्जित किया, इस तर्क पर कि जो व्यक्ति यह नहीं जान सकता कि वह क्या ले रहा है वह विवेक नहीं चला सकता।
जो अनुभव से निकला काफी ठोस कारण है, और वह इसका परंपरा का अपना विवरण है कि वह निषेध कहां से आता है।
शुक्राचार्य तथा बलि। वे फिर आते हैं, महत्वपूर्ण रूप से, वामन की कथा में।
- असुर राजा बलि ने तीनों लोक जीत लिए थे
- विष्णु वामन बनकर आए, अर्थात बौने ब्राह्मण, और बलि से तीन पग भूमि मांगी
- शुक्राचार्य ने, उनके गुरु होने से, विष्णु को पहचाना और बलि को न देने की चेतावनी दी
- बलि ने फिर भी दे दी, क्योंकि उनसे मांगा गया था और वे मना नहीं करते
- शुक्राचार्य ने पात्र की टोंटी में घुसकर संकल्प का जल रोकना चाहा, और विष्णु ने उसे कुश की नोक से बेधा जिससे उनकी एक आंख जाती रही
- वामन बढ़े, दो पग में लोक ढके, और बलि ने तीसरे के लिए अपना सिर दिया
अर्थात असुरों के गुरु, उस कथा में, वही हैं जिन्होंने साफ देखा और जिन्हें अनसुना किया गया, और बलि उन्हें ठीक इसी अनसुना करने के लिए महान दान की आकृतियों में स्मरण किए जाते हैं।
और वह परंपरा का इस बात पर ईमानदार होना है कि बुद्धिमान सलाहकार कभी कभी ठीक होता है और फिर भी वह नहीं होता जिसे माना जाना चाहिए।
तीर्थ के रूप में ब्रह्मपुत्र
इस मंदिर का काम उसके नीचे की नदी से अभिन्न है, और परंपरा में ब्रह्मपुत्र का स्थान अपने विवरण का अधिकारी है।
नाम। ब्रह्मपुत्र का अर्थ ब्रह्मा का पुत्र है, और वह उन बहुत थोड़ी बड़ी भारतीय नदियों में है जिन्हें पुल्लिंग माना जाता है।
शेष लगभग सब देवियां हैं: गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, सरस्वती।
उसकी उत्पत्ति की कथा:
- कुछ कथनों में ब्रह्मा का ऋषि शांतनु की पत्नी अमोघा से एक पुत्र हुआ, और उस पुत्र ने जल का रूप लिया
- उस शिशु को चार पर्वतों के बीच रखा गया
- परशुराम ने उस जल को छोड़ने के लिए झील से नाली काटी, जिससे नदी बनी
- जहां उन्होंने वह किया वह परशुराम कुंड है, अरुणाचल प्रदेश में, जहां वह नदी मैदानों में आती है
परशुराम कुंड। चूंकि कथा वहां ले जाती है, वह स्थल उल्लेख योग्य है।
- अरुणाचल प्रदेश के लोहित ज़िले में
- जहां कहा जाता है कि परशुराम ने अपनी माता के वध का पाप धोया, जो उन्होंने पिता के कहने पर किया था, और पाप जाते ही कुल्हाड़ी उनके हाथ से गिरी
- मकर संक्रांति पर बड़ा स्नान स्थल, जहां बहुत बड़ी संख्या आती है
- वह कुंड 1950 के असम भूकंप से बदला, जो अब तक दर्ज सबसे बड़े भूकंपों में था
1950 का भूकंप। उसे जानना योग्य है, क्योंकि उसने आधुनिक नदी गढ़ी।
- 15 अगस्त 1950, परिमाण लगभग 8.6, असम तिब्बत सीमा क्षेत्र में केंद्रित
- यंत्रों से दर्ज अब तक के सबसे बड़े भूकंपों में
- उससे विशाल भूस्खलन हुए, जिनसे नदियां रुकीं, जो फिर फूटीं
- उसने नदी तल के भागों को ऊपर तथा नीचे किया, जिससे ब्रह्मपुत्र का मार्ग और गहराई बदली
- उसके बाद गुवाहाटी का नदी मुख तथा पूरी घाटी का बाढ़ व्यवहार बदला
अर्थात जिस नदी को आप सुक्रेश्वर से देखते हैं वह मापने योग्य रूप से वह नदी नहीं जो एक शताब्दी पहले वहां थी।
वार्षिक बाढ़। असम की बाढ़ घाटी के जीवन की गढ़ने वाली विशेषता है।
- ब्रह्मपुत्र बहुत बड़ा गाद भार तथा बहुत बड़ा जल प्रवाह लिए है
- वह गुंथती है, चौड़े तल में अनेक धाराओं में बंटकर
- हर वर्षा में वह बाढ़ लाती है, और गंभीर वर्षों में वह बाढ़ प्रलयकारी होती है
- कटाव भूमि सदा के लिए ले लेता है, और गांव तथा माजुली के भाग तक खोए हैं
- तटबंध आंशिक बचाव देते हैं और कभी टूटते हैं
वही वह संदर्भ है जिसमें नदी किनारे का मंदिर बैठता है। नदी पूजी जाती है और नदी लेती भी है।
नदी पर अनुष्ठान:
- संक्रांति पर स्नान, विशेषकर मकर संक्रांति तथा हर मास की संक्रांति
- पितरों के लिए तर्पण
- अस्थि विसर्जन
- अमावस्या स्नान, विशेषकर भाद्रपद की अमावस्या तथा महालया अमावस्या
- नवग्रह वाली प्रविष्टि में बताया ग्रहण स्नान
पुष्करम। ब्रह्मपुत्र का पुष्करम है, अर्थात बारह वर्षीय नदी पर्व जो गोदावरी तथा कृष्णा के संदर्भ में बताया गया, जब चक्र में उस नदी की बारी आती है।
पुष्करम में उस नदी पर स्नान विशेष पुण्य लिए माना जाता है और बहुत बड़ी संख्या जुटती है।
व्यावहारिक सुरक्षा की बात, चूंकि यह विवरण किसी घाट के विषय में है।
ब्रह्मपुत्र बहुत बड़ी तथा तेज़ नदी है जिसमें प्रबल धाराएं हैं, कहीं कहीं तट के पास गहरे प्रवाह हैं, और जिसका तल खिसकता है।
- केवल सीढ़ियों पर स्नान करें, उथले जल में, जहां और लोग स्नान कर रहे हों
- बाहर की ओर न तैरें
- बच्चों को बिना देखरेख जल में न जाने दें
- भारी वर्षा के समय अथवा बाद में न उतरें, जब प्रवाह बढ़ता है
- धारा तट से दिखने से अधिक प्रबल है, जो अधिकांश बड़ी नदियों के लिए सत्य है और इसी कारण लोग उनमें डूबते हैं
अनुष्ठान के स्नान का अर्थ है उतरना, डुबकी लेना, और निकल आना। उसका अर्थ उस आकार की नदी में जाना नहीं है।
अहोम निर्माता

इस श्रृंखला में गुवाहाटी के तीन मंदिर, नवग्रह, सुक्रेश्वर तथा अश्वक्रांता, अहोम राजाओं ने एक दूसरे से कुछ दशकों के भीतर बनवाए अथवा फिर बनवाए। अहोम राज्य विवरण का अधिकारी है।
अहोम कौन थे:
- ताई लोग जो तेरहवीं शताब्दी में पूर्व से, वर्तमान म्यांमार से, ब्रह्मपुत्र घाटी में आए
- उनके पहले राजा सुकाफा परंपरागत रूप से 1228 में रखे जाते हैं
- उन्होंने ऊपरी असम में राज्य बनाया और घाटी भर में फैले
- उन्होंने लगभग छह सौ वर्ष शासन किया, बर्मी आक्रमणों तथा 1820 के दशक के ब्रिटिश अधिग्रहण तक
छह सौ वर्ष। वही उल्लेखनीय संख्या है और उसे सीधे कहना चाहिए।
अहोम राज्य 1228 से 1826 तक चला। बहुत थोड़े भारतीय वंश उसके पास पहुंचते हैं, और अहोमों ने वह उस क्षेत्र में किया जो बार बार आक्रमण झेलता रहा।
मुगल युद्ध। अहोम मुगलों से बार बार लड़े और, असामान्य रूप से, टिके रहे।
- सत्रहवीं शताब्दी भर असम में अनेक मुगल अभियान
- निर्णायक भिड़ंत सराईघाट का युद्ध था, 1671 में, जो गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र पर लड़ा गया
- अहोम सेनापति लचित बरफुकन थे
- अहोम नौसेना ने, नदी तथा भूभाग का प्रयोग करके, कहीं बड़ी मुगल सेना को हराया
- सराईघाट के बाद ब्रह्मपुत्र घाटी में मुगल विस्तार वस्तुतः रुक गया
सराईघाट यहीं हुआ। वह युद्ध उसी नदी पर लड़ा गया जो सुक्रेश्वर घाट से दिखती है, गुवाहाटी के पास की संकरी जगह पर।
लचित बरफुकन:
- वे अहोम सेनापति जिन्होंने सराईघाट में नेतृत्व किया
- जो युद्ध में रोगी थे, और जिनके विषय में कहा जाता है कि सैनिकों के डगमगाने पर वे रोग शैया से उठकर नेतृत्व करने आए
- उनके विषय में सर्वाधिक कही कथा उनके मामा की है, जो रक्षा तटबंध बनाने के प्रभारी थे और जिन्होंने वह बुरा बनाया। लचित ने उन्हें मृत्युदंड दिया, यह कहकर कि उनके मामा उनके देश से बड़े नहीं
- युद्ध के थोड़े समय बाद उनकी मृत्यु हुई
- राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षु को लचित बरफुकन स्वर्ण पदक मिलता है
- गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र पर उनकी बहुत बड़ी प्रतिमा है
अहोम संस्थाएं। दो उल्लेख योग्य हैं क्योंकि वे विशिष्ट हैं।
- पाइक व्यवस्था, जिसके अधीन आबादी उन इकाइयों में बंटी थी जिन्हें बारी बारी श्रम तथा सैन्य सेवा देनी होती थी, और इसी से वह राज्य बिना स्थायी वेतनभोगी सेना के सेनाएं खड़ी करता और निर्माण करता था
- बुरंजी, अर्थात अहोम इतिहास, जो पहले ताई अहोम भाषा में और बाद में असमिया में लिखे गए, जो भारत के सर्वाधिक बड़े स्वदेशी ऐतिहासिक अभिलेखों में हैं और जो अहोम काल को असामान्य रूप से अच्छा प्रलेखित आधार देते हैं
बुरंजी पर ज़ोर देना चाहिए। अधिकांश भारतीय वंश शिलालेखों, सिक्कों तथा साहित्यिक उल्लेखों से फिर बनाए जाते हैं।
अहोमों ने इतिहास रखे, व्यवस्थित रूप से, राज्य के काम के रूप में, वर्ष दर वर्ष घटनाएं दर्ज करते हुए। उससे असम का मध्यकालीन इतिहास उस तरह प्रलेखित है जैसे भारत का बहुत भाग नहीं है, और इतिहासकार उन पर बहुत निर्भर करते हैं।
अहोम धर्म। वे अपना ताई धर्म लेकर आए और क्रमशः हिंदू धर्म अपनाया।
- मूल रीति में पितर उपासना तथा उनका अपना पुरोहित वर्ग था, अर्थात देवधाई, बैलुंग तथा मोहन
- सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी से राजाओं ने हिंदू धर्म अपनाया, शाक्त तथा वैष्णव दोनों
- राजाओं ने अपने अहोम नामों के साथ हिंदू नाम लिए, इसलिए रजेश्वर सिंह सुरेंफा भी हैं
- उन्होंने व्यापक रूप से मंदिर बनवाए तथा दान दिए, इसीलिए गुवाहाटी की पहाड़ियां अठारहवीं शताब्दी की रचनाएं लिए हैं
- कुछ राजाओं ने कामाख्या पर शाक्त रीति को संरक्षण दिया, अन्य ने वैष्णव सत्रों को, और राज्य तथा सत्रों के संबंध कभी तनावपूर्ण रहे
मोआमोरिया विद्रोह। उल्लेख योग्य है क्योंकि वह उस राज्य का पतन बताता है।
1760 के दशक से मोआमोरिया का, अर्थात मायामरा सत्र के अनुयायियों का, अहोम राज्य के विरुद्ध लंबा विद्रोह, जिसे राज्य ने अंततः दबाया पर जिसने उसे बहुत दुर्बल छोड़ा।
उस दुर्बलता ने 1810 तथा 1820 के दशकों के बर्मी आक्रमण संभव किए, जो अत्यंत विनाशकारी थे, और जो ब्रिटिश को लाए, जिन्होंने 1826 में यांडाबू की संधि से असम मिला लिया।
अर्थात छह सौ वर्ष समाप्त हुए, और इन पहाड़ियों के मंदिर उसकी अंतिम शताब्दी में बने।
मंदिर पर शिव उपासना
सुक्रेश्वर पर सामान्य क्रम में वस्तुतः क्या होता है।
दैनिक उपासना:
- जल, दूध तथा अन्य द्रव्यों से लिंग का अभिषेक
- बेल पत्र, अर्थात बिल्व वृक्ष का पत्ता, जो शिव का पत्ता है
- धतूरा तथा आक, जो भी परंपरागत रूप से शिव को चढ़ते हैं और जो विषैले पौधे हैं, और जो चढ़ाए जाते हैं खाए नहीं जाते
- भस्म
- दीप तथा धूप
- ॐ नमः शिवाय
बेल पत्र क्यों। बिल्व का पत्ता तीन दलों वाला है, एक डंठल पर तीन दल, और उसे शिव के तीन के रूप में पढ़ा जाता है: तीन नेत्र, तीन गुण, त्रिशूल।
वह पूरे भारत में मानक शिव चढ़ावा है और वह चिकनी ओर नीचे करके चढ़ाया जाता है।
धतूरा क्यों। क्योंकि शिव वही स्वीकारते हैं जो अन्य ठुकराते हैं।
शिव को चढ़ने वाले द्रव्यों में विषैले तथा अशुभ हैं: धतूरा, आक, श्मशान की भस्म। वही सैद्धांतिक बात है, कोई संयोग नहीं।
उन्होंने सागर मंथन में हलाहल विष पिया ताकि लोक नष्ट न हों, और पार्वती ने उनका कंठ पकड़ा ताकि वह नीचे न उतरे, इसीलिए वे नीलकंठ हैं।
जो देवता विष लेते हैं उन्हें विषैले पौधे चढ़ते हैं। वह संगत है।
शिवरात्रि:
- फाल्गुन की महाशिवरात्रि यहां भी वही प्रमुख पर्व है जो हर शिव मंदिर पर
- वह रात जागकर बिताई जाती है
- रात के चार प्रहर, हर एक का अपना अभिषेक
- दिन तथा रात भर उपवास
- बहुत बड़ी संख्या आती है
सावन:
- श्रावण मास, लगभग जुलाई से अगस्त, शिव का मास है
- श्रावण के सोमवार प्रमुख दिन हैं
- कांवड़ की रीति, अर्थात किसी नदी से जल लेकर शिव मंदिर तक लाना, मूल रूप से उत्तरी है पर अब व्यापक रूप से होती है
- ब्रह्मपुत्र का जल तथा यह मंदिर उस जोड़े को यहां स्वाभाविक बनाते हैं
सोमवार। हर सोमवार शिव का दिन है और सुक्रेश्वर पर साप्ताहिक वृद्धि होती है।
सोलह सोमवार। सोलह सोमवार व्रत, अर्थात लगातार सोलह सोमवार, व्यापक रूप से किया जाने वाला शिव व्रत है, और उसमें क्या आता है यह कहना योग्य है।
- सोमवार को उपवास, प्रायः एक भोजन
- स्नान तथा लिंग की उपासना
- सोलह सोमवार की कथा पढ़ना अथवा सुनना
- जो सोलहवें के बाद उद्यापन से पूर्ण होता है
उपवास पर एक बात। चूंकि उपवास शिव उपासना का बड़ा अंग है, व्यावहारिक सावधानी रखना योग्य है।
- जो कोई मधुमेह का रोगी हो, गर्भवती हो, स्तनपान कराती हो, वृद्ध हो, रोगी हो, ऐसी दवा पर हो जिसके साथ भोजन चाहिए, अथवा रोग से उबर रहा हो, उसे उपवास बदलना अथवा छोड़ना चाहिए
- परंपरा ने सदा यह दिया है। फलाहार, अर्थात फल तथा दूध, मान्य रूप है, और शास्त्र स्वयं बदलने तथा छूट की अनुमति देते हैं
- वह उपवास बेहतर नहीं जो आपका स्वास्थ्य बिगाड़े
- आप किसी भी स्थिति के लिए दवा लेते हों तो उपवास के कारण उसे बंद न करें। उसका समय कैसे रखें, यह चिकित्सक से पूछें
सुक्रेश्वर पर संध्या। यह बताना योग्य है कि वह स्थान उस समय कैसा लगता है जब वह सबसे अच्छा होता है।
मंदिर ब्रह्मपुत्र की ओर है। पिछले पहर सूर्य उस नदी पर डूबता है, जो गुवाहाटी में अत्यंत चौड़ी है, जिसके बीच मयूर द्वीप तथा उमानंद मंदिर हैं।
लोग घाट की सीढ़ियों पर बैठते हैं। नौकाएं पार जाती हैं। जल से प्रकाश उतर जाता है।
वह नाटकीय मंदिर नहीं है। वह बहुत पुराना स्थल है जहां गड्ढे में बड़ा पाषाण है और नदी में उतरती कुछ सीढ़ियां हैं, और जाने का कारण यह है कि वह बहुत लंबे समय से लगातार प्रयोग में रहा है और आज भी प्रयोग में है, संध्या को, नगर के उन लोगों से जो नीचे उतरकर बैठते हैं।
सुक्रेश्वर की यात्रा
कैसे पहुंचें
- सुक्रेश्वर मंदिर, संध्याचल पहाड़ी, पानबाज़ार, गुवाहाटी, असम
- ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी तट पर, नगर में, गुवाहाटी के नदी मुख के पास
- पानबाज़ार तथा नगर केंद्र से पैदल दूरी पर
- गुवाहाटी रेलवे स्टेशन कुछ किलोमीटर
- गुवाहाटी हवाई अड्डा लगभग 25 किलोमीटर
समय
- प्रायः प्रातः से संध्या तक। स्थानीय रूप से देख लें
कब जाएं
- फाल्गुन की महाशिवरात्रि, प्रमुख पर्व के लिए
- श्रावण के सोमवार
- कोई भी सोमवार
- नदी पर के प्रकाश के लिए पिछला पहर, जो सामान्य दिन वहां रहने का सबसे अच्छा समय है
- मौसम के लिए अक्टूबर से मार्च
मंदिर पर
- जूते बाहर छोड़े जाते हैं
- सादे वस्त्र
- लिंग तल से नीचे है, इसलिए उस कक्ष में नीचे देखें
- बेल पत्र तथा पुष्प बाहर मिलते हैं
घाट पर
- सीढ़ियां स्नान तथा श्राद्ध के लिए प्रयोग होती हैं
- वे फिसलन भरी हो सकती हैं, विशेषकर नीचे वाली और विशेषकर वर्षा के बाद
- पैर संभालकर रखें
- उथली सीढ़ियों से आगे नदी में न जाएं। ब्रह्मपुत्र की धारा प्रबल है
यात्रा को जोड़ना। सुक्रेश्वर गुवाहाटी के नदी मुख के बीच है और सब कुछ पास है।
- पास के घाट से नौका द्वारा मयूर द्वीप पर उमानंद, शिव मंदिर तथा स्वर्ण लंगूरों के लिए
- नीलाचल पहाड़ी पर कामाख्या
- चित्राचल पहाड़ी पर नवग्रह
- उत्तरी तट पर अश्वक्रांता
- पानबाज़ार में पास ही असम राज्य संग्रहालय
- गुवाहाटी तारामंडल
- ब्रह्मपुत्र नौका विहार, जो यहीं पास से चलता है
- फैंसी बाज़ार तथा पुराना नगर
- नदी पर लचित बरफुकन प्रतिमा
उमानंद स्वाभाविक जोड़ा है। नौका घाट क्षेत्र से चलती है, पार जाना छोटा है, और द्वीप का मंदिर छोटा तथा सुखद है।
स्वर्ण लंगूर स्वयं उस यात्रा के योग्य है। वह भारत के सर्वाधिक संकटग्रस्त वानरों में एक है, जो केवल पश्चिमी असम तथा भूटान के छोटे क्षेत्र में मिलता है, और मयूर द्वीप की आबादी वहां लाया गया समूह है। वे अभ्यस्त तथा दिखने वाले हैं।
उन्हें खिलाएं नहीं। जंगली वानरों को खिलाने से वे आक्रामक तथा निर्भर होते हैं और वह उन पशुओं के लिए बुरा है।
अंत में एक बात। यह मंदिर उस गुरु के नाम पर है जो मरे हुओं को लौटाना जानते थे और जो वह ज्ञान रख नहीं सके, क्योंकि जो गुरु शिष्य को मना करे वह गुरु नहीं रहता।
उसके नीचे ब्रह्मा के किसी पुत्र के नाम की नदी बहती है, जो हर वर्ष बाढ़ लाती और भूमि लेती है, और जिस पर 1671 में वह युद्ध लड़ा गया जिसने तय किया कि वह घाटी जीती जाएगी या नहीं।
और किसी सामान्य संध्या को पानबाज़ार के लोग नीचे उतरकर, सीढ़ियों पर बैठकर, नौकाएं देखते हैं।
वे तीनों एक ही स्थान हैं।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
सुक्रेश्वर मंदिर कहां है?+
गुवाहाटी के पानबाज़ार में संध्याचल पहाड़ी पर, ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी तट पर, नगर केंद्र से पैदल दूरी पर। उसे अहोम राजा प्रमत्त सिंह ने 1744 में पुराने स्थल पर बनवाया, और वह असम के सबसे बड़े शिव लिंगों में एक लिए है, जो तल से नीचे के कक्ष में है, और जिसके घाट की सीढ़ियां नदी में उतरती हैं।
शुक्राचार्य कौन थे?+
असुरों के गुरु, भृगु के पुत्र, शुक्र नीति के रचयिता, तथा संजीवनी विद्या के धारक, अर्थात मृतकों को जिलाने के ज्ञान के। वे शुक्र ग्रह से पहचाने जाते हैं, और मंदिर उन्हीं के नाम पर है। उनकी सर्वाधिक जानी कथा बृहस्पति के पुत्र कच की है, जो संजीवनी सीखने उनके पास शिष्य बनकर आए, और उन्होंने वह पाई, क्योंकि गुरु सच्चे शिष्य को मना नहीं कर सकता।
क्या सुक्रेश्वर घाट पर स्नान किया जा सकता है?+
लोग वहां स्नान करते हैं और सीढ़ियों पर तर्पण करते हैं। उन्हीं उथली सीढ़ियों पर रहें जहां और लोग स्नान कर रहे हों, बाहर न तैरें, बच्चों को बिना देखरेख न जाने दें, और भारी वर्षा के समय अथवा बाद में न उतरें। ब्रह्मपुत्र बहुत बड़ी तथा तेज़ है जिसमें प्रबल धाराएं और खिसकता तल है, और धारा तट से दिखने से अधिक प्रबल है। अनुष्ठान के स्नान का अर्थ है उतरना, डुबकी लेना और निकल आना।
सराईघाट का युद्ध क्या था?+
1671 में गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र पर लड़ा गया नौसैनिक युद्ध, जिसमें अहोम सेनापति लचित बरफुकन ने नदी तथा भूभाग का प्रयोग करके कहीं बड़ी मुगल सेना को हराया। उसके बाद ब्रह्मपुत्र घाटी में मुगल विस्तार वस्तुतः रुक गया। वह नदी के उसी भाग पर लड़ा गया जो सुक्रेश्वर घाट से दिखता है, और लचित की प्रतिमा गुवाहाटी के नदी मुख पर है।
यात्रा का सबसे अच्छा समय कौन है?+
फाल्गुन की महाशिवरात्रि प्रमुख पर्व है, और श्रावण के सोमवार दूसरे मुख्य दिन। सामान्य दिन पिछला पहर सबसे अच्छा है, जब सूर्य उस बहुत चौड़ी नदी पर डूबता है जिसके बीच मयूर द्वीप तथा उमानंद मंदिर हैं। मौसम के लिए अक्टूबर से मार्च सबसे अच्छा है, क्योंकि गुवाहाटी आर्द्र है और वर्षा भारी होती है।
सुक्रेश्वर के साथ क्या देखना चाहिए?+
मयूर द्वीप पर उमानंद स्वाभाविक जोड़ा है, जहां पास के घाट से छोटी नौका जाती है, और जहां शिव मंदिर तथा स्वर्ण लंगूरों की आबादी है, जो भारत के सर्वाधिक संकटग्रस्त वानरों में हैं। उन्हें खिलाएं नहीं। साथ ही नीलाचल पहाड़ी पर कामाख्या, चित्राचल पर नवग्रह, उत्तरी तट पर अश्वक्रांता, पानबाज़ार में असम राज्य संग्रहालय तथा नदी पर लचित बरफुकन प्रतिमा।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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