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मंदिर प्रवेश प्रार्थना और मंत्र - विधि
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मंदिर प्रवेश प्रार्थना और मंत्र - विधि

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 3, 2026
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By Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Reviewed by Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

ईश्वर के घर में प्रवेश

मंदिर देवता का निवास स्थान माना जाता है, पवित्रता से भरा एक स्थान जहाँ व्यक्ति दर्शन - प्रभु के पवित्र दर्शन - के लिए आता है। प्रवेश किसी भवन में जाने जैसा नहीं; यह चिंता और अहंकार के संसार से स्थिरता व कृपा के स्थान में सचेत प्रवेश है। प्रवेश द्वार पर की गई प्रार्थनाएँ व छोटे कर्म हृदय को तैयार करते हैं, ताकि व्यक्ति देव के समक्ष विनम्र, स्वच्छ और ग्रहण के लिए तत्पर पहुँचे।

देहरी पर अहंकार छोड़ना

प्रवेश से पूर्व *देहरी (दहलीज़) पर रुकें और प्रणाम करें। परंपरा सिखाती है कि अहंकार, क्रोध और सांसारिक चिंताएँ द्वार पर ही छोड़ दें, जैसे जूते बाहर उतार दिए जाते हैं। देहरी या सीढ़ी को स्पर्श कर फिर अपने माथे से लगाएँ, समर्पण व सम्मान का भाव। पहले दाहिना पैर रखकर* भीतर जाएँ, भक्ति के सिवा कुछ न लेकर। यह सरल विराम मंदिर प्रवेश का भीतरी हृदय है, किसी एक मंत्र से अधिक महत्वपूर्ण।

मंदिर प्रवेश प्रार्थना और मंत्र

प्रवेश द्वार पर हाथ जोड़कर एक विनम्र प्रार्थना अर्पित करें, जैसे:

अनायासेन मरणं, विना दैन्येन जीवनम्। देहि मे कृपया शम्भो, त्वयि भक्तिमचञ्चलाम्॥

अर्थ: हे प्रभु, मुझे बिना दीनता का जीवन, शांतिपूर्ण मृत्यु, और आप में अविचल भक्ति दीजिए। सबसे सरल रूप में व्यक्ति द्वार पर प्रणाम करते हुए 'ॐ' या देवता का मूल मंत्र जपता है - जैसे शिव के लिए ॐ नमः शिवाय, विष्णु के लिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, या गणेश के लिए ॐ श्री गणेशाय नमः

मंदिर की घंटी बजाना

मंदिर की घंटी बजाना

प्रवेश पर धीरे से *मंदिर की घंटी (घंटा) एक बार बजाएँ। घंटी का स्वर देवता को आपके आगमन की सूचना देता, भक्ति जगाता, और अपने गूँजते -समान स्वर से स्थान भरकर नकारात्मक विचारों को दूर करता माना जाता है। यह कोलाहलपूर्ण बाहरी संसार से एकाग्र प्रार्थना में परिवर्तन का संकेत है। इसे श्रद्धा से बजाएँ, यूँ ही नहीं, और दर्शन हेतु गर्भगृह* की ओर बढ़ने से पूर्व स्वर को मन स्थिर करने दें।

मंदिर दर्शन विधि - चरण दर चरण

1. स्नान कर स्वच्छ, मर्यादित वस्त्र पहनें; जूते व चमड़े की वस्तुएँ बाहर उतारें। 2. देहरी पर रुकें, अहंकार पीछे छोड़ें, सीढ़ी स्पर्श करें और दाहिने पैर से भीतर जाएँ। 3. श्रद्धा से एक बार घंटी बजाएँ। 4. देव के समक्ष खड़े हों, हाथ जोड़ें, क्षणभर आँखें मूँदें और 'ॐ' या मूल मंत्र जपें। 5. मंदिर की अनुमति अनुसार अपनी प्रार्थना, पुष्प या प्रसाद अर्पित करें, फिर पूर्ण प्रणाम करें। 6. प्रदक्षिणा (गर्भगृह की दक्षिणावर्त परिक्रमा) करें, चरणामृत या प्रसाद ग्रहण करें, और देव की ओर अचानक पीठ किए बिना शांति से निकलें। धीरे चलें, फोन दूर रखें, और भर समय मौन व भीतरी स्थिरता बनाए रखें।

महत्व और लाभ

उचित प्रार्थना और आचरण से मंदिर में जाना भक्ति को गहरा करता, मन को शांत करता और दर्शन को सचमुच फलदायी बनाता माना जाता है, जिससे व्यक्ति देव का आशीर्वाद व शांति लेकर घर लौटता है। प्रणाम करना, द्वार पर अहंकार छोड़ना और घंटी बजाना विनम्रता, सजगता व श्रद्धा का अभ्यास कराते हैं। अनुष्ठान से परे, सच्चे भाव से किया मंदिर दर्शन हृदय का पुनः-संयोजन है, स्थिरता के कुछ मिनट जो पूरे सप्ताह को स्थिर करते हैं।

भक्तों के सामान्य प्रश्न

मंदिर में प्रवेश करते समय कौन सी प्रार्थना कहनी चाहिए?+

हाथ जोड़कर 'ॐ' या देव का मूल मंत्र जपें, जैसे 'ॐ नमः शिवाय' या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'। भक्ति व शांतिपूर्ण जीवन हेतु एक छोटी विनम्र प्रार्थना भी अर्पित की जाती है।

मंदिर की देहरी पर क्यों रुकें?+

देहरी सांसारिक से पवित्र में प्रवेश का चिह्न है। व्यक्ति अहंकार, क्रोध व चिंताएँ पीछे छोड़ने को रुकता है, सम्मान से सीढ़ी स्पर्श करता, और शुद्ध भक्ति से दाहिने पैर से प्रवेश करता है।

प्रवेश पर मंदिर की घंटी क्यों बजाई जाती है?+

घंटी का ॐ-समान स्वर देव को आपके आगमन की सूचना देता, भक्ति जगाता और नकारात्मक विचार दूर करता है, कोलाहलपूर्ण संसार से एकाग्र प्रार्थना में परिवर्तन का चिह्न।

किस पैर से प्रवेश करना चाहिए?+

देहरी पर रुककर प्रणाम कर और अहंकार छोड़कर, शुभ व सम्मानजनक प्रवेश के चिह्न रूप में पहले दाहिने पैर से मंदिर में प्रवेश करें।

दर्शन करने का सही तरीका क्या है?+

देव के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हों, ॐ या मूल मंत्र जपें, अपनी प्रार्थना व प्रसाद अर्पित करें, पूर्ण प्रणाम करें, फिर दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा कर शांति से चरणामृत या प्रसाद ग्रहण करें।

मंदिर के भीतर किन बातों से बचना चाहिए?+

जूते, चमड़े की वस्तुएँ, ऊँची बातचीत और फोन प्रयोग से बचें। देव की ओर पैर न करें या अचानक पीठ न करें। मौन रखें, धीरे चलें और भीतरी स्थिरता व सम्मान बनाए रखें।

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About the author

Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.

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