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वरलक्ष्मी व्रतम - महत्व, तिथि और पूजा विधि
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वरलक्ष्मी व्रतम - महत्व, तिथि और पूजा विधि

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 4, 2026
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By Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Reviewed by Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

वरलक्ष्मी व्रतम क्या है

वरलक्ष्मी व्रतम देवी लक्ष्मी के वरलक्ष्मी रूप को समर्पित पवित्र व्रत है, जो वर (वरदान) देती हैं। इसे मुख्यतः दक्षिण भारत - तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक - की विवाहित स्त्रियाँ रखती हैं, और यह स्त्रियों के सबसे प्रिय व्रतों में से एक है। वरलक्ष्मी की उपासना अष्टलक्ष्मी के आठों रूपों की एक साथ उपासना के समान मानी जाती है, जो धन, स्वास्थ्य, संतान व पारिवारिक कल्याण लाती है।

तिथि और कब रखा जाता है

वरलक्ष्मी व्रतम श्रावण मास (लगभग जुलाई से अगस्त) में पूर्णिमा से पहले के शुक्रवार को रखा जाता है, अधिकांश परंपराओं में श्रावण के दूसरे शुक्रवार को। शुक्रवार देवी लक्ष्मी का विशेष दिन है, और श्रावण भक्ति के लिए शुभ मास है। व्रत प्रातःकाल किया जाता है, यद्यपि कुछ इसे पारिवारिक रीति अनुसार संध्या को रखते हैं। प्रत्येक वर्ष सटीक तिथि व मुहूर्त क्षेत्रीय पंचांग से सुनिश्चित करें।

महत्व और कथा

कथा अनुसार भगवान शिव ने पार्वती को यह व्रत बताया ताकि स्त्रियाँ समृद्धि व वैवाहिक सुख प्राप्त कर सकें। कथा चारुमती नामक श्रद्धालु स्त्री की है, जिसके स्वप्न में देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं और उसे यह व्रतम करने को कहा। जब चारुमती ने भक्ति से उपासना की, उसका घर धन से भर गया और उसकी कृपा देखकर पड़ोसी भी व्रत करने लगे। कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति और संतोष स्थायी समृद्धि को आमंत्रित करते हैं, केवल अनुष्ठान नहीं।

कलश और पवित्र धागा

कलश और पवित्र धागा

उपासना की केंद्रीय वस्तु कलश (पवित्र पात्र) है, जिसे वरलक्ष्मी के आसन रूप में स्थापित किया जाता है। कांसे या चाँदी के पात्र को चावल या जल से भरकर, ऊपर आम के पत्ते और नारियल रखकर, प्रायः देवी का मुख, हल्दी, कुमकुम व पुष्पों से सजाया जाता है - जो स्वयं लक्ष्मी का प्रतिनिधित्व करता है। एक मुख्य अनुष्ठान है दाहिनी कलाई पर हल्दी लगा पीला पवित्र धागा (तोरणम या रक्षा) नौ गाँठों सहित बाँधना। यह धागा आने वाले वर्ष हेतु देवी की रक्षा व आशीर्वाद का प्रतीक है।

चरणबद्ध पूजा विधि

1. प्रातः जल्दी उठें, स्नान कर स्वच्छ पारंपरिक वस्त्र पहनें, आदर्श रूप से लाल या पीले। 2. पूजा स्थान स्वच्छ कर रंगोली (कोलम) बनाएँ; पूर्वमुखी लकड़ी का आसन रखें। 3. सजे हुए कलश को वरलक्ष्मी रूप में स्थापित करें और पवित्र धागा तैयार रखें। 4. गणेश पूजा से आरंभ करें, फिर अपना संकल्प कहते हुए संकल्प लें। 5. देवी का आह्वान करें और हल्दी, कुमकुम, पुष्प, फल तथा खीर, सुंडल या मिठाई जैसा भोग अर्पित करें। 6. कलाई पर पवित्र धागा बाँधें, लक्ष्मी अष्टोत्तर या श्री सूक्तम पढ़ें, और आरती करें। 7. विवाहित स्त्रियों को ताम्बूलम (पान, फल, कुमकुम) वितरित कर और प्रसाद बाँटकर समापन करें।

व्रत के नियम

वरलक्ष्मी व्रत कठोर के बजाय कोमल है। अनेक स्त्रियाँ आंशिक उपवास रखती हैं, पूजा के बाद केवल फल, दूध या एक सात्विक भोजन लेती हैं, जबकि कुछ उपासना पूर्ण होने तक पूर्ण उपवास रखती हैं। दिन को स्वच्छ, शांत और क्रोध व कटु वाणी से मुक्त रखना चाहिए। प्याज, लहसुन, मद्य और मांसाहार से बचें। व्रत देवी को अर्पित प्रसाद से खोला जाता है, प्रायः पहले अन्य विवाहित स्त्रियों के साथ बाँटकर।

जप करने का मंत्र

जप करने का मंत्र

व्रत के दौरान जप का सबसे सरल मंत्र है:

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

भक्त अधिक आशीर्वाद हेतु लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली (108 नाम) और श्री सूक्तम भी पढ़ते हैं। कलश की ओर मुख कर कमलगट्टे या स्फटिक की माला पर बीज मंत्र का 108 बार जप करें, सम्पूर्ण परिवार की समृद्धि व रक्षा का भाव धारण करते हुए।

लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं

वरलक्ष्मी व्रतम कब रखा जाता है?+

यह श्रावण मास में पूर्णिमा से पहले के शुक्रवार को, आमतौर पर दूसरे शुक्रवार को रखा जाता है, जो लगभग जुलाई से अगस्त में पड़ता है। सटीक तिथि व मुहूर्त सदैव क्षेत्रीय पंचांग से सुनिश्चित करें।

वरलक्ष्मी व्रतम कौन रख सकता है?+

इसे मुख्यतः विवाहित स्त्रियाँ अपने परिवार की समृद्धि व कल्याण के लिए रखती हैं, पर अविवाहित स्त्रियाँ और लक्ष्मी की अन्य भक्त भी रख सकती हैं। मुख्य बात सच्ची भक्ति और स्वच्छ, शांत मन है।

इस व्रत में कलश इतना महत्वपूर्ण क्यों है?+

आम के पत्तों व नारियल से सुसज्जित और देवी के मुख से सजा कलश स्वयं वरलक्ष्मी का प्रतिनिधित्व करता है। यह वह आसन है जिसमें देवी का आह्वान होता है, जो इसे सम्पूर्ण पूजा की केंद्रीय वस्तु बनाता है।

व्रतम में बाँधा जाने वाला पवित्र धागा क्या है?+

हल्दी लगा पीला धागा नौ गाँठों सहित दाहिनी कलाई पर रक्षा रूप में बाँधा जाता है। यह आने वाले वर्ष भर परिवार के लिए देवी की रक्षा व समृद्धि के आशीर्वाद का प्रतीक है।

वरलक्ष्मी व्रतम में कौन सा मंत्र जपना चाहिए?+

सबसे सरल 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' है, जिसे 108 बार जपा जाता है। भक्त धन व कल्याण के अधिक आशीर्वाद हेतु लक्ष्मी अष्टोत्तर (108 नाम) और श्री सूक्तम भी पढ़ते हैं।

क्या वरलक्ष्मी व्रत कठोर है?+

नहीं, यह कोमल है। अनेक पूजा के बाद केवल फल, दूध या एक सात्विक भोजन लेते हैं, जबकि कुछ उपासना पूर्ण होने तक पूर्ण उपवास रखते हैं। दिन स्वच्छ, शांत और प्याज, लहसुन व मांसाहार से मुक्त रखा जाता है।

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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.

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