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हिंदू धर्म में माया (भ्रम) क्या है
Spiritual Wisdom

हिंदू धर्म में माया (भ्रम) क्या है

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 4, 2026
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By Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

Reviewed by Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

माया क्या है

माया हिंदू दर्शन के गहनतम विचारों में एक है - वह ब्रह्मांडीय भ्रम जो एक सच्चे सत्य, ब्रह्म, को ढकता है और सदा-बदलते संसार को ही समस्त व अंतिम सत्य प्रतीत कराता है। माया का अर्थ यह नहीं कि संसार झूठा है; इसका अर्थ है कि हम क्षणिक को शाश्वत और आभास को सार मान बैठते हैं। मंद प्रकाश में रस्सी को साँप समझ लेने की भाँति, संसार अनुभव रूप में सत्य है पर अपने वास्तविक स्वरूप में गलत समझा जाता है।

शास्त्रों में माया

भगवद्गीता (7.14) में कृष्ण कहते हैं, 'मेरी यह दैवी माया, तीन गुणों से बनी, पार करना कठिन है; पर जो मेरी शरण लेते हैं वे इसे पार कर जाते हैं।' उपनिषद अपरिवर्तनीय ब्रह्म पर नाम-रूप के माध्यम से संसार के प्रकट होने की बात करते हैं। ऋषि आदि शंकराचार्य ने इसे अद्वैत वेदांत में विकसित किया, यह सिखाते हुए कि अंततः केवल ब्रह्म ही सत्य है, और माया वह शक्ति है जिससे एक अनेक रूप में प्रकट होता है।

माया की दो शक्तियाँ

वेदांत माया की दो शक्तियाँ बताता है। पहली आवरण (ढकना) है, जो शाश्वत आत्मा रूप में हमारे सच्चे स्वरूप को छिपाती है। दूसरी विक्षेप (प्रक्षेपण) है, जो नाम-रूप के एक पृथक, बदलते संसार का आभास उठाती है। मिलकर ये हमें भुला देती हैं कि हम कौन हैं और इसके बजाय शरीर, मन व संपत्ति से तादात्म्य कराती हैं, जो आसक्ति व दुःख की ओर ले जाता है।

गहरा आध्यात्मिक अर्थ

गहरा आध्यात्मिक अर्थ

माया अभिशाप नहीं बल्कि गुरु है। यह वही पट है जिस पर जीवन का खेल खुलता है, एक को अनेक रूप में स्वयं का अनुभव करने देता है। दुःख तभी आरंभ होता है जब हम खेल को खिलाड़ी, लहर को सागर मान लेते हैं। 'माया के पार देखना' संसार का त्याग नहीं बल्कि इसे हल्के भाव से भोगना है, यह जानते हुए कि हर क्षणिक रूप के पीछे अपरिवर्तनीय ब्रह्म, हमारा अपना सच्चा आत्म, प्रकाशित है।

माया के पार कैसे देखें

शास्त्र माया को भेदने के परीक्षित मार्ग देते हैं। ज्ञान (आत्म-विचार) 'मैं कौन हूँ?' तब तक पूछता है जब तक शाश्वत आत्म पहचान न लिया जाए। भक्ति और शरणागति, जैसा कृष्ण गीता में वचन देते हैं, कृपा को पट उठाने देती हैं। कर्म योग, स्वार्थ-आसक्ति बिना कर्म, माया की पकड़ ढीली करता है। स्थिर ध्यान और सत्संग धीरे-धीरे मन को शांत करते हैं ताकि सदा-विद्यमान सत्य प्रकाशित हो सके।

माया के रोज़मर्रा उदाहरण

माया सरल अनुभवों में दिखती है। एक स्वप्न जागने तक पूर्णतः सत्य लगता है; गरम सड़क पर जल का मृगतृष्णा झिलमिलाता है; एक चलचित्र हमें आँसुओं तक ले जाता है यद्यपि वह केवल पर्दे पर प्रकाश है। हर स्थिति में अनुभव सजीव है पर अंतिम सत्य नहीं। ऋषि कहते हैं कि हमारा जाग्रत जीवन भी ऐसा ही है - हमारे लिए पूर्णतः सत्य, फिर भी एक अपरिवर्तनीय सत्य पर क्षणिक आभास।

आज माया को समझना क्यों महत्वपूर्ण है

आज माया को समझना क्यों महत्वपूर्ण है

निरंतर शोर और लालसा के युग में माया की शिक्षा शांति लाती है। यह हमें सफलता व हानि को हल्के भाव से थामने में सहायता करती है, यह जानते हुए कि सभी रूप बदलते हैं जबकि हमारा गहरा आत्म नहीं बदलता। यह हमें निष्क्रिय नहीं बनाती; यह हमें परिणामों से कुचले बिना प्रेम व साहस से कर्म करने को मुक्त करती है। माया के पार देखना स्थायी शांति की जड़ और मोक्ष का द्वार है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिंदू धर्म में माया क्या है?+

माया वह ब्रह्मांडीय भ्रम है जो एक सत्य, ब्रह्म, को ढकता है और बदलते संसार को समस्त सत्य प्रतीत कराता है। यह वह शक्ति है जिससे एक अनेक रूपों में प्रकट होता है जिन्हें हम अनुभव करते हैं।

क्या माया का अर्थ है कि संसार असत्य है?+

ठीक वैसा नहीं। माया का अर्थ है कि हम क्षणिक को शाश्वत मान बैठते हैं। संसार अनुभव रूप में सत्य है पर अंतिम सत्य नहीं, जैसे मंद प्रकाश में रस्सी को साँप समझ लेना।

माया का उल्लेख शास्त्र में कहाँ है?+

भगवद्गीता (7.14) तीन गुणों से बनी माया को पार करना कठिन बताती है, केवल शरणागति से संभव। उपनिषद और आदि शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत इसे और विकसित करते हैं।

माया की दो शक्तियाँ क्या हैं?+

माया की आवरण शक्ति है, जो हमारे सच्चे आत्म को ढकती है, और विक्षेप शक्ति, जो नाम-रूप के एक पृथक, बदलते संसार का आभास उठाती है।

माया को कैसे पार किया जा सकता है?+

आत्म-विचार (ज्ञान), भक्ति व शरणागति, निष्काम कर्म (कर्म योग), स्थिर ध्यान और सत्संग के माध्यम से। गीता आश्वासन देती है कि ईश्वर की शरण कृपा को पट उठाने देती है।

माया को समझना दैनिक जीवन में कैसे सहायक है?+

यह हमें सफलता व हानि को हल्के भाव से थामने में सहायता करती है, यह जानते हुए कि रूप बदलते हैं पर गहरा आत्म नहीं। यह शांति लाती और परिणामों से कुचले बिना प्रेम व साहस से कर्म करने को मुक्त करती है।

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About the author

Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

Anjali is the managing editor for Vandnaa and oversees the festival and vrat coverage. She holds an M.A. in Religious Studies and reviews every published article for accuracy, accessibility, and tradition-fidelity.

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