अहोई अष्टमी क्या है
अहोई अष्टमी माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य व समृद्धि के लिए रखा जाने वाला दिनभर का व्रत है, परंपरा में विशेषकर पुत्रों हेतु, यद्यपि आज अनेक माताएँ इसे सभी संतानों के लिए रखती हैं। यह व्रत अहोई माता को समर्पित है, जो आदिशक्ति का करुणामय मातृ रूप हैं। माताएँ दिनभर निर्जल रहती हैं और संध्या को तारे या चंद्रमा के दर्शन के बाद ही व्रत खोलती हैं। यह व्रत पूर्णतः माँ के प्रेम और प्रार्थना में निहित एक कोमल व्रत है।
तिथि, समय और मास
अहोई अष्टमी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है, सामान्यतः अक्टूबर या नवंबर में। यह दीवाली से लगभग आठ दिन पहले और करवा चौथ के चार दिन बाद आती है, उसी उत्सव-काल का भाग बनाते हुए। व्रत सूर्योदय से रखा जाता और संध्या को, परंपरागत रूप से तारे देखकर, खोला जाता है; कुछ क्षेत्रों में माताएँ चंद्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं। सही तिथि और तारा या चंद्र दर्शन का समय अपने स्थानीय पंचांग से उस वर्ष हेतु अवश्य पुष्टि करें।
अहोई अष्टमी व्रत कथा
बहुत समय पहले एक स्त्री दीवाली से पहले अपने घर की लिपाई हेतु वन में मिट्टी खोदने गई। एक माँद के पास खोदते समय उसकी कुदाल से अनजाने में एक सेही (साही, कुछ कथाओं में सिंह का शावक) मारा गया, और शोकाकुल पशु-माता ने उसे शाप दे दिया। शीघ्र ही उस स्त्री की संतानें एक के बाद एक चल बसीं और वह गहरे शोक में डूब गई। एक वृद्धा ने उसे अहोई माता (सभी शिशुओं की माता) की उपासना करने और सच्चे हृदय से क्षमा माँगने की सलाह दी। स्त्री ने दीवार पर अहोई माता और उनके बच्चों का चित्र बनाया और सभी संतानों के कल्याण की प्रार्थना की। उसके पश्चाताप और भक्ति से प्रसन्न होकर अहोई माता ने उसे क्षमा कर स्वस्थ, दीर्घायु संतान का आशीर्वाद दिया। तभी से माताएँ प्रतिवर्ष यह व्रत रखती और अपनी संतान की रक्षा हेतु अहोई माता की उपासना करती हैं।
अहोई अष्टमी पूजा विधि

1. सूर्योदय से पूर्व उठें, स्नान करें और अपनी संतान हेतु निर्जला व्रत रखने का संकल्प लें। 2. स्वच्छ दीवार या कागज़ पर अहोई माता और उनके बच्चों का चित्र बनाएँ या रखें; अनेक स्त्रियाँ स्याहु माता का हार या चाँदी की अहोई वस्तु भी रखती हैं। 3. जल का कलश रखें, और पास में अनाज, रोली, चावल व करवा रखें। 4. संध्या को दीया जलाकर हाथ जोड़कर अहोई अष्टमी की कथा सुनें या पढ़ें। 5. अहोई माता को जल और भोग (पूरी, हलवा, मिठाई) अर्पित करें और अपनी संतान की दीर्घायु की प्रार्थना करें। 6. तारे (या स्थानीय रीति अनुसार चंद्रमा) के दर्शन पर अर्घ्य दें, फिर व्रत खोलें। भोजन से पहले परिवार के बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।
यह व्रत कौन और क्यों रखता है
यह व्रत मुख्यतः माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य व सफलता हेतु रखा जाता है। परंपरागत रूप से यह पुत्रों के लिए मनाया जाता था, पर आज अनेक माताएँ इसे प्रेमपूर्वक अपनी सभी संतानों, बेटियों सहित, के लिए रखती हैं। निःसंतान स्त्रियाँ या परिवार के कल्याण की कामना करने वाली स्त्रियाँ भी इसे रखती हैं। व्रत का मर्म माँ की निःस्वार्थ प्रार्थना है - वह दिनभर निर्जल रहती है ताकि उसकी संतान दीर्घायु व समृद्ध हो।
महत्व और लाभ
अहोई अष्टमी संतान को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य व विघ्नों से रक्षा का आशीर्वाद देती और घर में शांति, सामंजस्य व समृद्धि लाती मानी जाती है। अनुष्ठान से परे, यह माँ और संतान के बंधन को गहरा करती और परिवार हेतु माँ के प्रार्थनामय संकल्प को नवीन करती है। कथा की सीख अनुसार धैर्य, भक्ति और क्षमाशील, विनम्र हृदय से व्रत रखना ही इसका सच्चा लाभ माना जाता है।
त्वरित उत्तर
अहोई अष्टमी कब मनाई जाती है?+
अहोई अष्टमी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है, सामान्यतः अक्टूबर या नवंबर में, दीवाली से लगभग आठ दिन पहले। सही तिथि अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
अहोई अष्टमी व्रत कौन रखता है?+
माताएँ यह व्रत अपनी संतान की दीर्घायु व कल्याण हेतु रखती हैं। परंपरागत रूप से पुत्रों के लिए मनाया जाता था, आज अनेक माताएँ इसे प्रेमपूर्वक बेटियों सहित सभी संतानों के लिए रखती हैं।
अहोई अष्टमी व्रत कैसे खोला जाता है?+
निर्जला व्रत संध्या को तारे, या कुछ क्षेत्रों में चंद्रमा, के दर्शन के बाद खोला जाता है। माताएँ अर्घ्य देती हैं, पूजा पूर्ण करती हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेती हैं, फिर भोजन करती हैं।
अहोई अष्टमी कथा क्या सिखाती है?+
कथा सिखाती है कि अनजाने में की गई हानि भी दुख लाती है, पर सच्चा पश्चाताप, प्रार्थना और अहोई माता की भक्ति क्षमा तथा स्वस्थ, दीर्घायु संतान का आशीर्वाद देती है।
अहोई अष्टमी पर कौन सा भोग अर्पित होता है?+
अहोई माता को सामान्यतः पूरी, हलवा और मिठाई अर्पित की जाती है, साथ में जल, रोली, चावल और अनाज। व्रत खोलने के बाद भोग प्रसाद रूप में बाँटा जाता है।
क्या अहोई अष्टमी का करवा चौथ से संबंध है?+
ये अलग-अलग व्रत हैं पर निकट आते हैं। करवा चौथ पति की दीर्घायु हेतु है, जबकि अहोई अष्टमी, चार दिन बाद, संतान की दीर्घायु व कल्याण हेतु है।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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