एक दैवीय गुण के रूप में क्षमा
भगवद गीता में क्षमा क्षमा है - हानि के बदले हानि लौटाने के बजाय क्रोध व द्वेष को जाने देने की क्षमता। श्रीकृष्ण इसे दैवी स्वभाव (दैवी सम्पत्) में जन्मे लोगों के गुणों में गिनाते हैं, इसे निर्भयता, पवित्रता, दान और सत्यवादिता के साथ रखते हैं। दुर्बलता से दूर, क्षमा संयमित शक्ति है: वह सबल हृदय जो प्रतिशोध पर शांति को चुनता है। क्षमा करना स्वयं को मुक्त करना है, केवल दूसरे को बरी करना नहीं।
दैवीय गुणों में क्षमा
जब श्रीकृष्ण अध्याय 16 में दैवी स्वभाव का वर्णन करते हैं, क्षमा सीधे नामित है। श्लोक 3 में:
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। (16.3)
अर्थ: तेज, क्षमा, धृति (धैर्य), शौच (पवित्रता), अद्रोह (द्वेषहीनता) और अभिमान का अभाव दैवी स्वभाव में जन्मे लोगों के गुण हैं। यहाँ क्षमा साहस व आंतरिक शक्ति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है, यह दर्शाते हुए कि गीता क्षमा करने की क्षमता को आध्यात्मिक परिपक्वता का चिह्न मानती है, कायरता का नहीं।
क्षमाशील भक्त जो श्रीकृष्ण को प्रिय है
भक्ति पर बारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्त का चित्र खींचते हैं - और क्षमा उसके हृदय में है। श्लोक 13 से 14 में:
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। (12.13) सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। (12.14)
अर्थ: जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं रखता, जो मित्रवत व करुणामय है, ममता व अहंकार से मुक्त, सुख-दुख में समान, क्षमाशील और सदा संतुष्ट - ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। गीता क्षमा को मित्रता व करुणा से जोड़ती है, इसे प्रेमपूर्ण, समर्पित हृदय का सहज फल बनाते हुए।
क्षमा आपको क्यों मुक्त करती है

द्वेष रखना मन को उसी व्यक्ति से बाँधे रखता है जिसने हमें चोट पहुँचाई, घाव को बार-बार दोहराते हुए। गीता समता (समत्व) सिखाती है - सुख व दुख, प्रशंसा व अपमान को स्थिर मन से मिलना। क्षमा चोट पर लागू समता है: हम अतीत को अपनी शांति भंग करने देना बंद कर देते हैं। जब हम क्षमा करते हैं, हम गलत को स्वीकार्य घोषित नहीं कर रहे; हम उसे अपने अंतर्जीवन को विषाक्त करने देने से इनकार कर रहे हैं। यही कारण है कि क्षमा देने वाले के लिए औषधि है।
प्रतिदिन क्षमा का अभ्यास
क्षमा शायद ही कभी एक भव्य कृत्य होती है; यह छोटे द्वेषों का दैनिक त्याग है। गीता की भावना से व्यावहारिक कदम:
1. जब किसी पर क्रोध उठे, स्मरण करें कि वही आत्मा उनमें वैसे ही बसती है जैसे आपमें। 2. व्यक्ति को कृत्य से अलग करें - आप हानि को स्वीकारे बिना द्वेष को जाने दे सकते हैं। 3. जिसने अन्याय किया उसके कल्याण की प्रार्थना करें; यह आपके अपने हृदय की गाँठ ढीली करता है। 4. यदि आज क्षमा असंभव लगे, तो बस क्षमा करने की इच्छा के लिए प्रार्थना करें। प्रत्येक छोटा त्याग हृदय को हल्का करता है।
एक छोटी क्षमा साधना
शांति से बैठें और एक व्यक्ति को मन में लाएँ जिसके प्रति आप द्वेष रखते हैं। धीरे साँस लें और मौन कहें: मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ, और स्वयं को मुक्त करता हूँ। फिर उन्हें व स्वयं को श्रीकृष्ण को अर्पित करें, यह प्रार्थना करते हुए कि दोनों हृदय शांति पाएँ। मन को स्थिर करने हेतु ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नाम कुछ बार दोहराएँ। यह कई दिनों तक एक समय एक व्यक्ति के लिए करें। सप्ताहों में, पुराने द्वेषों का भारी बोझ उठने लगता है, और हृदय अधिक हल्का व मुक्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद गीता क्षमा के बारे में क्या कहती है?+
गीता क्षमा को 'क्षमा' कहती और इसे दैवीय गुणों में गिनाती है (16.3)। यह क्षमा को आंतरिक शक्ति मानती है, दुर्बलता नहीं - क्रोध व द्वेष को जाने देने और प्रतिशोध पर शांति चुनने की शक्ति।
कौन सा श्लोक क्षमा को दैवीय गुण बताता है?+
अध्याय 16, श्लोक 3 क्षमा को तेज, धृति, पवित्रता, द्वेषहीनता और अभिमान के अभाव के साथ दैवी स्वभाव में जन्मे व्यक्ति के गुणों में नामित करता है।
श्रीकृष्ण क्षमाशील भक्त से क्यों प्रेम करते हैं?+
श्लोक 12.13-14 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भक्त द्वेषहीन, मित्रवत, करुणामय, क्षमाशील और सदा संतुष्ट है वह उन्हें प्रिय है। क्षमा प्रेमपूर्ण, समर्पित हृदय का सहज फल है।
क्या गीता में क्षमा दुर्बलता का चिह्न है?+
नहीं। गीता क्षमा को साहस व धृति के साथ एक दैवीय गुण के रूप में रखती है। क्षमा संयमित शक्ति है - वह सबल हृदय जो शांति चुनता और द्वेष को मन विषाक्त करने देने से इनकार करता है।
क्षमा करने वाले को क्षमा कैसे सहायता करती है?+
द्वेष मन को उस व्यक्ति से बाँधता है जिसने चोट पहुँचाई, घाव दोहराते हुए। क्षमा चोट पर गीता की समता लागू करती, हमें उस पकड़ से मुक्त करती है। यह देने वाले के लिए औषधि है, आंतरिक शांति लौटाते हुए।
किसी को क्षमा करने की एक सरल साधना क्या है?+
एक व्यक्ति को मन में लाएँ, धीरे साँस लें और कहें 'मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ, और स्वयं को मुक्त करता हूँ', फिर दोनों को श्रीकृष्ण को अर्पित करें। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' कुछ बार दोहराएँ। यह दिनों में एक समय एक व्यक्ति के लिए करें।
About the author
Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies
Anjali is the managing editor for Vandnaa and oversees the festival and vrat coverage. She holds an M.A. in Religious Studies and reviews every published article for accuracy, accessibility, and tradition-fidelity.
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