एक ही स्वरूप में हरि और हर
हरिहर नाथ बिहार के सारण ज़िले के सोनपुर में, वहां पूजित हैं जहां गंडक गंगा से मिलती है, पटना और हाजीपुर के सामने।
हरि अर्थात विष्णु। हर अर्थात शिव। हरिहर स्वरूप, जिसमें दोनों एक साथ हैं, भारतीय परंपरा में अनेक स्थानों पर मिलता है, कहीं ऐसी प्रतिमा के रूप में जो बीच से बंटी हो, एक ओर विष्णु के और दूसरी ओर शिव के लक्षण।
यह स्वरूप एक निश्चित सैद्धांतिक बात कहता है और हिंदू परंपरा उसे जानबूझकर कहती है:
- वैष्णव और शैव परंपराएं अपने-अपने देवता को सर्वोच्च मानती हैं, और यह बहस प्राचीन है
- हरिहर स्वरूप कहता है कि यह भेद मूल तक नहीं जाता
- ऐसे मंदिर वे स्थान हैं जहां इस दृष्टि पर बहस नहीं, उपासना होती है
सोनपुर में देवता लिंग रूप में पूजित हैं, और परंपरा मानती है कि उसमें हरि और हर दोनों विद्यमान हैं। भक्त उसी अनुसार अर्पण करते हैं, और मंदिर को शैव तथा वैष्णव दोनों प्रकार के अर्पण मिलते हैं।
हरिहर स्थान दुर्लभ हैं, यही एक कारण है कि यहां बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से भक्त आते हैं। सोनपुर स्वयं देश भर में किसी और बात के लिए जाना जाता है, अपने विशाल पशु मेले के लिए, और अनेक आगंतुकों को यह पता ही नहीं होता कि वह मेला इसी मंदिर के कारण है।
गजेंद्र मोक्ष की कथा
इस संगम से जुड़ी कथा भागवत पुराण की सर्वाधिक प्रिय कथाओं में है, और परंपरा सोनपुर को उन स्थानों में गिनती है जिनसे यह जुड़ी है।
गजराज गजेंद्र जल पीने और स्नान करने सरोवर में उतरे। एक ग्राह ने उनका पैर पकड़ लिया और छोड़ा नहीं। हाथी लड़ता रहा, और यह संघर्ष असाधारण रूप से लंबा चला, जिसे ग्रंथ हज़ार वर्ष का बताता है।
गजेंद्र का बल चुक गया। अंत में, जब कुछ शेष न रहा, उन्होंने सूंड में कमल उठाकर विष्णु को पुकारा, अब लड़ते हुए नहीं, केवल पुकारते हुए।
विष्णु तत्काल आए, उन्हें मुक्त किया और ग्राह को भी उसके शाप से मुक्त कर दिया।
भक्त इस कथा से क्या लेते हैं:
- सहायता तब आई जब संघर्ष रुका, उससे पहले नहीं। कथा का सार वही समर्पण का क्षण है।
- गजेंद्र न ऋषि थे, न पुराने भक्त। वे संकट में पड़े एक प्राणी थे जिसने सच्चे मन से पुकारा।
- मुक्ति दोनों को मिली। ग्राह केवल नष्ट नहीं हुआ, वह भी अपनी अवस्था से मुक्त हुआ।
स्थानीय परंपरा इस प्रसंग को गंगा और गंडक के संगम पर रखती है, इसीलिए मंदिर यहीं है और इसीलिए उसके चारों ओर उपजा मेला आरंभ से ही वह मेला रहा जहां हाथियों का व्यापार और प्रदर्शन होता था। सोनपुर के मेले का स्वभाव इसी संबंध से बना है।
सोनपुर मेला
सोनपुर मेला, जिसे हरिहर क्षेत्र मेला भी कहा जाता है, कार्तिक पूर्णिमा के आसपास आरंभ होकर सप्ताहों चलता है। इसे लंबे समय से एशिया के सबसे बड़े पशु मेलों में गिना जाता रहा है।
क्या होता है:
- भक्त कार्तिक पूर्णिमा को गंगा और गंडक के संगम पर स्नान करते हैं, जो इस आयोजन का धार्मिक केंद्र है
- स्नान के बाद हरिहर नाथ मंदिर में दर्शन
- मेला मैदान पर विशाल आयोजन फैलता है, जहां ऐतिहासिक रूप से पशु, अश्व, हाथी, पक्षी और हर प्रकार के जीव का व्यापार होता था
- बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और उससे आगे से व्यापारी, कलाकार, दुकानें और दर्शक आते हैं
मेले का स्वरूप और चरित्र काफी बदला है। वन्यजीव संरक्षण कानूनों ने उन कई प्रजातियों का व्यापार समाप्त कर दिया जो कभी इसका अंग थीं, और विशेष रूप से हाथियों का व्यापार अब अनुमत नहीं है। जो शेष है वह पशु और अश्व मेला, बड़ा व्यापारिक आयोजन और संगम पर धार्मिक समागम है।
भक्तों के लिए जाने का कारण उसका धार्मिक पक्ष है। संगम पर कार्तिक पूर्णिमा का स्नान पूरे हिंदू व्यवहार में महत्वपूर्ण है, और यहां उसके साथ वह मंदिर भी है जहां हरि और हर साथ पूजित हैं, जो बहुत कम संगम दे पाते हैं।
मेले में जाना अर्थात भीड़, कठिन यातायात और भरे हुए आवास। मेले के बाहर जाना अर्थात एक शांत नदी तट मंदिर, जिसके बारे में भारत में अधिकतर लोगों ने सुना भी नहीं।
मंदिर और उसकी परंपराएं

मंदिर की अपनी परंपराएं उसे एक साथ बहुत प्राचीन स्मृति में और अपेक्षाकृत हाल के इतिहास में रखती हैं।
- परंपरा मानती है कि यह स्थान बहुत पूर्व काल में स्थापित हुआ, और स्थानीय विवरण इसे रामायण काल से जोड़ते हैं, जिनके अनुसार राम ने जनकपुर जाते समय यहां पूजा की
- वर्तमान संरचना का श्रेय बाद के संरक्षण को दिया जाता है, और मध्यकालीन पुनर्निर्माण प्रायः राजा मान सिंह से जोड़ा जाता है, तथा उसके बाद भी वृद्धि और मरम्मत होती रही
- देवता लिंग रूप में पूजित हैं, और मंदिर की अपनी विधि में हरिहर पहचान बनी रहती है
- मंदिर के नीचे का संगम वह स्थल है जहां का स्नान वार्षिक क्रम तय करता है
यहां दोनों परंपराओं की सामान्य सामग्री अर्पित होती है, जो असामान्य है और स्थान पर देखने योग्य है। हर के लिए बेलपत्र और जल, हरि के लिए तुलसी और पुष्प, और एक परंपरा के भक्त दूसरी परंपरा की विधि से बिना किसी कठिनाई के अर्पण करते हुए।
महाशिवरात्रि और सावन के सोमवार शैव भीड़ लाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा वर्ष का महान समागम लाती है। बीच के समय में मंदिर शांत रहता है, और नदी तट का परिवेश ही वह प्रभाव है जो आगंतुक साथ ले जाता है।
सोनपुर पटना, हाजीपुर और छपरा से सहज पहुंच में है, और पटना के इतने निकट है कि मेले के बाहर आधे दिन में दर्शन हो जाएं।
भारत में अन्यत्र हरिहर स्थान
हरिहर की धारणा पूरे भारत में मिलती है, और सोनपुर उसी बड़े क्रम की एक कड़ी है।
- हरिहर प्रतिमाएं, जो लंबवत बंटी होती हैं, एक ओर विष्णु के शंख-चक्र और दूसरी ओर शिव के त्रिशूल-जटा सहित, देश भर के मंदिरों और संग्रहालयों में मिलती हैं
- कर्नाटक और केरल के शंकरनारायण स्थान उसी संयुक्त स्वरूप की उपासना उसी नाम से करते हैं
- सबरीमला के अय्यप्पन को परंपरा हरि और हर का पुत्र कहती है, जो वही सिद्धांत है, संयुक्त प्रतिमा के बजाय जन्म के रूप में
- छत्तीसगढ़ का राजिम, जहां संगम पर एक ही यात्रा में विष्णु राजीव लोचन और शिव कुलेश्वर के दर्शन होते हैं, वही बात दो मंदिरों में कहता है
- सोनपुर, जहां एक ही लिंग दोनों रूपों में पूजित है
ये सब जो कहते हैं वह वही दृष्टि है जो हिंदू परंपरा बहुत लंबे समय से रखती आई है। वैष्णव और शैव का संप्रदाय भेद व्यवहार, परंपरा और रुचि के स्तर पर वास्तविक है, और उसे अंतिम नहीं माना जाता।
भक्त के लिए इसका व्यावहारिक रूप सरल है और सोनपुर में किसी भी सुबह दिख जाता है। कोई बेलपत्र चढ़ाता है, कोई तुलसी, उसी देवता को, और मंदिर में कोई इसे सुलझाने योग्य समस्या नहीं मानता।
यात्रा की योजना
सोनपुर पहुंचना सुविधाजनक है, जो बिहार के अनेक तीर्थ स्थलों के बारे में नहीं कहा जा सकता।
- स्थान - सोनपुर, सारण ज़िला, बिहार, गंगा-गंडक संगम पर, हाजीपुर के सामने और पटना के निकट
- पहुंच - सोनपुर का अपना रेलवे जंक्शन है, और पटना तथा हाजीपुर से सड़क मार्ग सरल है
- उपयुक्त समय - अक्टूबर से मार्च। कार्तिक पूर्णिमा और मेले के सप्ताह पूर्णतम अनुभव देते हैं और सर्वाधिक भीड़भाड़ वाले भी हैं।
- साथ क्या ले जाएं - बेलपत्र, पुष्प, तुलसी, संगम जल अर्पित करना हो तो छोटा पात्र, और स्नान की योजना हो तो वस्त्र
- मेले के समय - बड़ी भीड़, भारी यातायात और भरे हुए आवास की अपेक्षा रखें। पटना व्यावहारिक आधार है।
- शिष्टाचार - जूते बाहर उतारें, गर्भगृह में फोटो न लें, और कार्तिक पूर्णिमा को कतार व्यवस्था का पालन करें
साथ क्या जोड़ा जा सकता है:
- पटना, जहां रेलवे स्टेशन के पास महावीर मंदिर और पटन देवी के स्थान हैं
- पास ही वैशाली और हाजीपुर
- पिंडदान के लिए दक्षिण में गया, जो लंबी यात्रा है
- उत्तर में सीतामढ़ी और मिथिला परिपथ
मेले में जाने वालों के लिए एक बात। धार्मिक आयोजन और व्यापारिक मेला साथ होते हैं, पर एक नहीं हैं। यदि आपकी रुचि मंदिर और स्नान में है तो कार्तिक पूर्णिमा को जल्दी पहुंचें, दर्शन पूर्ण करें, और मेले को अलग यात्रा रहने दें।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
हरिहर नाथ कौन हैं?+
हरिहर नाथ बिहार के सोनपुर में गंगा-गंडक संगम पर पूजित देवता हैं, हरिहर स्वरूप में, जिसमें हरि यानी विष्णु और हर यानी शिव एक ही देवता में विद्यमान हैं। यहां उपासना लिंग रूप में होती है।
गजेंद्र मोक्ष की कथा क्या है?+
गजराज गजेंद्र को सरोवर में ग्राह ने पकड़ लिया और वे बहुत लंबे समय तक संघर्ष करते रहे। बल चुक जाने पर उन्होंने कमल उठाकर विष्णु को पुकारा, जो तत्काल आए, उन्हें मुक्त किया और ग्राह को भी शाप से मुक्त कर दिया। स्थानीय परंपरा इस प्रसंग को सोनपुर के संगम पर मानती है।
सोनपुर मेला कब लगता है?+
यह कार्तिक पूर्णिमा के आसपास आरंभ होकर सप्ताहों चलता है। भक्त गंगा-गंडक संगम पर स्नान कर हरिहर नाथ मंदिर में दर्शन करते हैं, और साथ ही विशाल पशु तथा व्यापारिक मेला चलता है।
क्या सोनपुर मेले में आज भी हाथियों का व्यापार होता है?+
नहीं। वन्यजीव संरक्षण कानूनों ने उन कई प्रजातियों का व्यापार समाप्त कर दिया जो कभी इसका अंग थीं, और विशेषकर हाथियों का व्यापार अब अनुमत नहीं है। शेष पशु तथा अश्व मेला और धार्मिक समागम है।
हरिहर नाथ मंदिर में क्या अर्पित किया जाता है?+
दोनों परंपराओं की सामग्री, जो असामान्य है और स्थान पर स्पष्ट दिखती है। हर के लिए बेलपत्र और जल, हरि के लिए तुलसी और पुष्प, और किसी भी परंपरा के भक्त दूसरी विधि से भी बिना कठिनाई अर्पण करते हैं।
सोनपुर कैसे पहुंचें?+
सोनपुर बिहार के सारण ज़िले में, हाजीपुर के सामने और पटना के निकट है। इसका अपना रेलवे जंक्शन है और सड़क मार्ग सरल है, तथा मेले के बाहर पटना से आधे दिन में दर्शन हो जाते हैं।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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