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प्रदक्षिणा (परिक्रमा) सही ढंग से कैसे करें - विधि, संख्या और अर्थ
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प्रदक्षिणा (परिक्रमा) सही ढंग से कैसे करें - विधि, संख्या और अर्थ

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 4, 2026
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By Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Reviewed by Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

प्रदक्षिणा क्या है

प्रदक्षिणा (जिसे परिक्रमा भी कहते हैं) किसी देवता, मंदिर, गर्भगृह या पवित्र वस्तु के चारों ओर श्रद्धापूर्वक गोल घूमने का भक्ति-कर्म है। इस शब्द का अर्थ है ईश्वर को सदा अपनी दाहिनी (दक्षिण) ओर रखते हुए चलना। यह उपासना के सबसे प्राचीन व सरल रूपों में एक है, जो हाथ जोड़कर मौन या प्रभु का नाम जपते हुए की जाती है। प्रत्येक कदम एक छोटा समर्पण है, जो साधारण चलने को चलती-फिरती प्रार्थना में बदल देता है।

सही दिशा - सदा दक्षिणावर्त

प्रदक्षिणा सदा दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) की जाती है, ताकि देवता पूरे समय आपकी दाहिनी ओर रहें। देवता के सामने से आरंभ करें, अपनी बाईं ओर बढ़ें ताकि आप देवता के दाहिनी ओर से गुज़रें, और घूमकर पुनः सामने आकर परिक्रमा पूरी करें। दाहिनी ओर सम्मान की दिशा मानी जाती है, इसीलिए ईश्वर को वहाँ रखा जाता है। देवता के चारों ओर कभी वामावर्त न चलें, क्योंकि उल्टी परिक्रमा (अप्रदक्षिणा) केवल कुछ विशेष अवसरों, जैसे दिवंगतों के कुछ संस्कारों के लिए ही होती है।

किस देवता के लिए कितनी परिक्रमा

परंपरा प्रत्येक देवता के लिए अलग संख्या में परिक्रमा बताती है: 1. गणेश - 1 प्रदक्षिणा। 2. विष्णु (और उनके अवतार) - 4 प्रदक्षिणा। 3. शिव - आधी परिक्रमा (चंद्र प्रदक्षिणा); आप अभिषेक जल निकालने वाली जलाधारी या सोमसूत्र नाली तक जाते हैं, फिर उसे लाँघे बिना उसी मार्ग से लौट आते हैं। 4. देवी (दुर्गा, लक्ष्मी, देवियाँ) - 1 प्रदक्षिणा। 5. सूर्य - 7 प्रदक्षिणा। 6. पीपल वृक्ष - 7 परिक्रमा, और विशेष व्रतों में 108 तक। संशय हो तो भक्तिपूर्वक की गई एक विषम या एकल सजग परिक्रमा सदा स्वीकार्य है।

चरण-दर-चरण विधि

चरण-दर-चरण विधि

प्रदक्षिणा जल्दबाज़ी के बजाय शांत ध्यान से करें: 1. पहले दर्शन करें, देवता के समक्ष प्रणाम करें और मन में अनुमति माँगें। 2. सामने खड़े हों, हाथ जोड़ें और प्रभु का नाम या मंत्र धीरे जपें। 3. अपनी बाईं ओर कदम बढ़ाएँ और धीरे चलते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा आरंभ करें। 4. दृष्टि कोमल रखें, मन देवता पर लगाएँ, और बातचीत या फोन से बचें। 5. निर्धारित संख्या में परिक्रमा पूरी करें, हर बार सामने लौटते हुए। 6. अंत में पुनः प्रणाम करें और कृतज्ञता के एक क्षण के लिए स्थिर खड़े रहें। बड़े मंदिरों में चिह्नित परिक्रमा पथ और भीड़ के प्रवाह का अनुसरण करें।

आंतरिक अर्थ

प्रदक्षिणा केवल गोल घूमने से कहीं अधिक है। केंद्र में स्थित देवता ईश्वर को हमारे जीवन का अचल केंद्र दर्शाते हैं, जबकि हम, किसी ग्रह की भाँति, उस स्थिर बिंदु के चारों ओर घूमते हैं। प्रत्येक परिक्रमा यह स्मरण कराती है कि हमारी समस्त गतिविधि अहंकार के बजाय ईश्वर के चारों ओर घूमनी चाहिए। प्रभु को दाहिनी ओर रखना ईश्वर को अपने मार्गदर्शक रूप में सम्मान देना है, और बार-बार की परिक्रमा भटकते मन को धीरे-धीरे उसके सच्चे केंद्र की ओर लौटाती है।

प्रदक्षिणा के लाभ

प्रदक्षिणा बेचैन मन को शांत व एकाग्र करती है, भक्ति व समर्पण को गहरा करती है, और साधारण गति को ध्यान का रूप बना देती है। प्रभु का नाम लेते हुए धीरे की गई परिक्रमा आंतरिक शांति और रक्षित होने का भाव देती है। कोमल चलना हल्की, स्वस्थ शारीरिक क्रिया भी है, और पीपल या पवित्र वृक्ष की परिक्रमा भक्त को प्रकृति की शांत, पोषक उपस्थिति से जोड़ती है।

करें और न करें

करें और न करें

करें: देवता को दाहिनी ओर रखते हुए दक्षिणावर्त चलें, हाथ जोड़कर धीरे चलें, नाम या मंत्र जपें, देवता-अनुसार संख्या का पालन करें, और मार्ग स्वच्छ रखें। न करें: कभी वामावर्त न चलें, जल्दबाज़ी या बातचीत न करें, शिव प्रदक्षिणा में जलाधारी नाली न लाँघें, परिक्रमा पथ में जूते न पहनें, और देवता की ओर असम्मानपूर्वक पीठ न करें - जाने से पहले प्रणाम करें।

भक्तों के सामान्य प्रश्न

प्रदक्षिणा किस दिशा में करनी चाहिए?+

सदा दक्षिणावर्त, देवता को पूरे समय अपनी दाहिनी ओर रखते हुए। दाहिनी ओर सम्मान की दिशा है, इसलिए ईश्वर वहाँ रखे जाते हैं। सामान्य उपासना में वामावर्त परिक्रमा से बचा जाता है।

प्रत्येक देवता के लिए कितनी परिक्रमा करूँ?+

गणेश 1, विष्णु 4, देवी 1, सूर्य 7 और पीपल 7 (व्रत में 108 तक)। शिव के लिए केवल आधी परिक्रमा जलाधारी तक करें और उसे लाँघे बिना उसी मार्ग से लौटें।

शिव के लिए केवल आधी परिक्रमा क्यों होती है?+

शिवलिंग का अभिषेक जल जलाधारी (सोमसूत्र) नाली से बाहर बहता है और अत्यंत पवित्र व शक्तिशाली माना जाता है। भक्त इसे लाँघते नहीं, इसलिए वहाँ तक परिक्रमा कर लौट आते हैं, जिससे आधी प्रदक्षिणा पूरी होती है।

प्रदक्षिणा का आंतरिक अर्थ क्या है?+

केंद्र में स्थित देवता ईश्वर को जीवन के अचल केंद्र रूप में दर्शाते हैं, जबकि हम उस स्थिर बिंदु के चारों ओर घूमते हैं। यह स्मरण कराता है कि अहंकार नहीं, ईश्वर को अपने सभी कर्मों का केंद्र बनाएँ।

क्या मैं घर पर प्रदक्षिणा कर सकता हूँ?+

हाँ। आप अपने घर के मंदिर या तुलसी या पीपल के पौधे की हाथ जोड़कर जपते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा कर सकते हैं। स्थान सीमित हो तो भक्ति से अपनी जगह दक्षिणावर्त घूमना भी आत्म-प्रदक्षिणा रूप में स्वीकार्य है।

क्या प्रदक्षिणा के समय जूते पहनने चाहिए?+

नहीं। प्रदक्षिणा नंगे पैर की जाती है, क्योंकि देवता के चारों ओर का परिक्रमा पथ पवित्र भूमि है। धीरे चलें, क्षेत्र स्वच्छ रखें, और परिक्रमा से पहले व बाद में प्रणाम करें।

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About the author

Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.

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