इंदिरा एकादशी क्या है
इंदिरा एकादशी आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी है, और इसका स्थान किसी अन्य एकादशी का नहीं: यह पितरों को समर्पित पखवाड़े पितृ पक्ष के मध्य में आती है। हर एकादशी भगवान विष्णु का व्रत है जो भक्त को शुद्ध करती है, पर शास्त्र कहते हैं कि इंदिरा एकादशी का पुण्य अपने दिवंगत पितरों को अर्पित किया जा सकता है, जो उन्हें कष्ट से मुक्त कर विष्णु धाम की ओर ले जाता है। इस प्रकार यह भक्ति और पितृ सेवा का दुर्लभ संगम है।
तिथि और 2026 में यह कब है
इंदिरा एकादशी आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है - पितृ पक्ष के दौरान और सर्व पितृ अमावस्या से कुछ दिन पहले। ग्रेगोरियन कैलेंडर से यह सामान्यतः सितंबर में आती है। एकादशी का समय, पारण की अवधि और द्वादशी तिथि हर वर्ष व शहर में बदलती है, इसलिए सही तिथि और पारण मुहूर्त वंदना पंचांग पर अवश्य देखें।
राजा इंद्रसेन की कथा
सत्य युग में महिष्मती पर धर्मात्मा राजा इंद्रसेन का शासन था। एक दिन देवर्षि नारद पधारे और बताया कि राजा के दिवंगत पिता, पूर्व जन्म के एक व्रत-दोष के कारण, मुक्ति के बजाय अब भी यमलोक में कष्ट पा रहे हैं। पिता ने संदेश भेजा था: मेरा पुत्र इंदिरा एकादशी का व्रत कर उसका पुण्य मुझे अर्पित करे। नारद ने राजा को पूरी विधि सिखाई - दिन में पितरों का श्राद्ध, विष्णु पूजा और कठोर उपवास, रात्रि जागरण और पुण्य पिता को समर्पण। इंद्रसेन ने परिवार सहित इसे पूर्ण निष्ठा से किया, और आकाश से पुष्पवर्षा के बीच उनके पिता गरुड़ पर आरूढ़ होकर विष्णु के परम धाम जाते दिखे। राजा ने स्वयं दीर्घकाल राज्य किया और वही गति पाई।
कौन और क्यों रखता है यह व्रत

इंदिरा एकादशी कोई भी रख सकता है, पर इसे विशेष रूप से वे रखते हैं जो अपने दिवंगत माता-पिता और पितरों की सेवा करना चाहते हैं - पितृ पक्ष के कर्म करते पुत्र-पुत्रियाँ, पितृ दोष से पीड़ित परिवार, और निज शुद्धि के साथ पितरों की शांति चाहने वाले विष्णु भक्त। चूँकि इसका पुण्य आगे अर्पित किया जा सकता है, यह व्रत पितृ पक्ष में वंशज द्वारा किया जा सकने वाला सबसे करुणामय कर्म माना जाता है।
चरण-दर-चरण व्रत विधि
विधि तीन दिन की है, जैसी नारद ने इंद्रसेन को सिखाई: 1. दशमी को (एक दिन पहले) सूर्यास्त से पूर्व एक सरल सात्विक भोजन करें और शांत मन से जल्दी सोएँ। 2. एकादशी की प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु के सामने संकल्प लें और कठोर उपवास रखें - स्वास्थ्य अनुकूल हो तो निर्जला, अन्यथा फलाहार। 3. मध्याह्न में पितरों का श्राद्ध और तर्पण जल, काले तिल और अन्न अर्पण से करें; पितृ पक्ष की रीति से ब्राह्मण, गाय, कुत्ते और कौवे को भोजन कराएँ। 4. शालिग्राम या भगवान विष्णु के विग्रह की तुलसी दल, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा करें। 5. रात्रि में कीर्तन, विष्णु सहस्रनाम या नीचे दिए मंत्रों के साथ जागरण करें। 6. द्वादशी को प्रातः पूजा और ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराने के बाद पारण अवधि में व्रत खोलें, और व्रत का पुण्य मन से पितरों को अर्पित करें।
व्रत नियम और फलाहार
एकादशी के मानक नियम लागू होते हैं: किसी भी रूप में अन्न, चावल, दालें या फलियाँ नहीं, क्योंकि परंपरा मानती है कि इस तिथि को अन्न में नकारात्मकता का वास होता है। फलाहार में फल, दूध, दही, साबूदाना, सिंघाड़ा, राजगीरा, कुट्टू और सेंधा नमक से बने व्यंजन ले सकते हैं। व्रत न रखने वाले परिजनों के लिए भी प्याज, लहसुन, चावल और भारी भोजन से बचें। सत्य बोलें, क्रोध से बचें, और दिन विष्णु व पितरों के स्मरण में बिताएँ।
मंत्र और लाभ

दिन भर और जागरण में जप करें:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय - महान द्वादशाक्षर विष्णु मंत्र।
ॐ नमो नारायणाय - शरणागति और पितरों की शांति के लिए।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे - कीर्तन व जागरण हेतु महामंत्र।
लाभ: शास्त्र वचन है कि श्रद्धा से की गई इंदिरा एकादशी पितरों को कष्ट से मुक्त करती, पितृ दोष दूर करती, भक्त को पापों से शुद्ध करती, और कुल को लौकिक कल्याण व मोक्ष की ओर प्रगति दोनों देती है।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
इंदिरा एकादशी अन्य एकादशियों से कैसे भिन्न है?+
यह एकमात्र एकादशी है जो पितृ पक्ष में आती है, और इसकी विशेष शक्ति यह है कि व्रत का पुण्य पितरों की मुक्ति के लिए अर्पित किया जा सकता है, जैसा राजा इंद्रसेन की कथा में है।
इंदिरा एकादशी कब आती है?+
यह पितृ पक्ष में आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी को, सामान्यतः सितंबर में आती है। समय हर वर्ष बदलता है, इसलिए सही तिथि और पारण मुहूर्त वंदना पंचांग पर देखें।
क्या इंदिरा एकादशी पर श्राद्ध किया जा सकता है?+
हाँ। पारंपरिक विधि में ही मध्याह्न का श्राद्ध-तर्पण, विष्णु पूजा और उपवास साथ जुड़े हैं - ठीक वैसे ही जैसे नारद ने राजा इंद्रसेन को यह दिन मनाने का निर्देश दिया था।
इंदिरा एकादशी व्रत में क्या खाया जा सकता है?+
अन्न, चावल, दालें और फलियाँ वर्जित हैं। निर्जला व्रत न रखने वालों के लिए फल, दूध, दही, साबूदाना, सिंघाड़ा, राजगीरा, कुट्टू और सेंधा नमक से बने फलाहारी व्यंजन अनुमत हैं।
व्रत का पुण्य पितरों को कैसे अर्पित किया जाता है?+
द्वादशी को व्रत और पारण पूर्ण कर भक्त हाथ जोड़कर भगवान विष्णु से प्रार्थना करता है और व्रत का संपूर्ण पुण्य मन से दिवंगतों को अर्पित करते हुए उनकी शांति व मुक्ति माँगता है।
क्या इंदिरा एकादशी पर रात्रि जागरण आवश्यक है?+
कीर्तन और विष्णु स्मरण सहित जागरण व्रत का पारंपरिक और अति अनुशंसित अंग है, पर जो पूरी रात जाग न सकें वे संध्या की प्रार्थना बढ़ाकर विष्णु नाम के स्मरण के साथ सो सकते हैं।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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