कजरी तीज क्या है
कजरी तीज वर्षा ऋतु के तीन महान तीज पर्वों में से एक है - हरियाली तीज और हरतालिका तीज के साथ। राजस्थान में बड़ी तीज और प्रसिद्ध सत्तू अर्पण के कारण सातुड़ी तीज कहलाने वाली यह तिथि वह दिन है जब विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु व कल्याण के लिए व्रत रखती हैं, और कुँवारी कन्याएँ अच्छे जीवनसाथी की प्रार्थना करती हैं। यह पर्व कजरी लोकगीतों, सावन के बादलों तले झूलों और संध्या के चंद्र पूजन से गुँथा है।
तिथि और 2026 में यह कब है
कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है - रक्षाबंधन के तीन दिन बाद और जन्माष्टमी से पाँच दिन पहले। ग्रेगोरियन कैलेंडर पर यह सामान्यतः अगस्त में आती है। चूँकि तिथि और चंद्रोदय का समय हर वर्ष और हर शहर में बदलता है, सही तिथि, पूजा मुहूर्त और चंद्रोदय समय वंदना पंचांग पर अवश्य देखें।
कजरी तीज व्रत कथा
पारंपरिक कथा एक निर्धन ब्राह्मण की पत्नी की है जिसने पूर्ण श्रद्धा से कजरी तीज का व्रत रखा। रीति के अनुसार नीमड़ी माता और चंद्रमा को सत्तू अर्पित करना था, पर घर में कुछ न था। पत्नी की भक्ति से द्रवित ब्राह्मण अँधेरी रात में निकला, चना और गेहूँ जुटाकर सत्तू पीसा, और दंपति ने माँगे हुए दीपक से पूजा पूरी की। निर्धनता में भी उनकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर नीमड़ी माता ने घर को आशीर्वाद दिया, और उनके जीवन में समृद्धि, सद्भाव और संतान-सुख भर गया। कथा सिखाती है कि देवी भक्ति देखती हैं, धन नहीं।
कौन और क्यों रखता है यह व्रत

विवाहित स्त्रियाँ (सुहागिनें) कजरी तीज का व्रत पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की प्रार्थना के साथ रखती हैं। कुँवारी कन्याएँ इसे प्रेममय और योग्य जीवनसाथी के आशीर्वाद के लिए रखती हैं। कई परिवारों में व्रत चंद्रोदय पूजा तक निर्जला रहता है, हालाँकि अस्वस्थ, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली स्त्रियाँ सौम्य फलाहार व्रत रखती हैं। यह दिन सखी-भाव का उत्सव भी है - स्त्रियाँ सुंदर वस्त्रों में एकत्र होती हैं, मेहंदी लगाती हैं, सजे झूलों पर झूलती हैं और प्रेम व विरह के कजरी गीत गाती हैं।
चरण-दर-चरण पूजा विधि
कजरी तीज की विशेष पहचान नीम वृक्ष की नीमड़ी माता रूप में पूजा है: 1. प्रातः स्नान कर नए या स्वच्छ उत्सवी वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें। 2. संध्या को गमले में लगी नीम की डाली या नीम वृक्ष के पास मिट्टी या गोबर की छोटी वेदी बनाएँ; उसके पास तालाब जैसा छोटा गड्ढा बनाकर जल भरें। 3. नीमड़ी माता को चुनरी, रोली, मेहंदी, चूड़ियाँ और दीपक से सजाएँ; काजल, सिंदूर और फल अर्पित करें। 4. सत्तू (घी और गुड़ मिला भुना चना या गेहूँ का आटा), ककड़ी और मौसमी फल अर्पित करें। 5. जल में दीपक और अर्पित वस्तुओं का प्रतिबिंब देखते हुए परिवार के सुख की प्रार्थना करें। 6. चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को जल व सत्तू का अर्घ्य दें, फिर सत्तू चखकर व्रत खोलें - परंपरा से यह पति या परिवार के बड़े के हाथ से दिया जाता है।
कजरी गीत, सत्तू और गौ पूजा
इस पर्व का नाम कजरी से आया है - उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के भावपूर्ण सावनी लोकगीत, जो काले बादलों, झूलों और पत्नी के विरह का गान करते हैं। राजस्थान में कई परिवार स्त्रियों के व्रत खोलने से पहले गाय को सत्तू और रोटी खिलाते हैं, जो गौ माता का सम्मान है। चंद्र पूजा के बाद परिवार और पड़ोसियों में सत्तू बाँटना व्रत का प्रसाद माना जाता है।
मंत्र, नियम और लाभ

पूजा के समय जप करें:
ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः - आदर्श दंपति शिव-पार्वती के आशीर्वाद के लिए।
ॐ सों सोमाय नमः - चंद्रमा को अर्घ्य देते समय।
नियम: दिन भर मन शांत और वाणी मधुर रखें, पारंपरिक व्रत में चंद्रोदय तक अन्न व नमक से बचें, और चंद्र दर्शन से पहले व्रत न खोलें। लाभ: यह व्रत पति की दीर्घायु, वैवाहिक सद्भाव, परिवार पर देवी की रक्षा, और कुँवारी कन्याओं को अच्छे वर का आशीर्वाद देता माना जाता है।
पाठकों के प्रश्न
कजरी तीज कब मनाई जाती है?+
कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया को, रक्षाबंधन के तीन दिन बाद, सामान्यतः अगस्त में आती है। सही तिथि और चंद्रोदय समय वंदना पंचांग पर देखें।
कजरी तीज पर नीम की पूजा क्यों होती है?+
कजरी तीज पर देवी की पूजा नीम की डाली या वृक्ष में नीमड़ी माता रूप में होती है। व्रत कथा एक निर्धन भक्त दंपति को उनके आशीर्वाद पर केंद्रित है, और नीम स्वयं आरोग्य व रक्षा का प्रतीक है।
कजरी तीज में सत्तू की क्या भूमिका है?+
घी और गुड़ मिला सत्तू नीमड़ी माता और चंद्रमा का मुख्य भोग है, इसीलिए इस दिन को सातुड़ी तीज भी कहते हैं। स्त्रियाँ चंद्रोदय अर्घ्य के बाद सत्तू चखकर व्रत खोलती हैं।
क्या कजरी तीज का व्रत निर्जला होता है?+
परंपरा से कई स्त्रियाँ चंद्रोदय पूजा तक निर्जला व्रत रखती हैं। किंतु अस्वस्थ, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली स्त्रियाँ फल व जल सहित फलाहार व्रत रख सकती हैं। कठोरता से अधिक भक्ति का महत्व है।
कजरी तीज, हरियाली और हरतालिका तीज से कैसे भिन्न है?+
हरियाली तीज श्रावण शुक्ल में, कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण में और हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल में आती है। कजरी तीज नीम पूजा, सत्तू भोग, कजरी गीतों और चंद्रोदय अर्घ्य के लिए विशिष्ट है।
क्या कुँवारी कन्याएँ कजरी तीज का व्रत रख सकती हैं?+
हाँ। कुँवारी कन्याएँ प्रेममय और योग्य जीवनसाथी की प्रार्थना के साथ यह व्रत रखती हैं, वही नीमड़ी माता पूजा और सत्तू सहित चंद्रोदय अर्घ्य करते हुए।
About the author
Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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