देवता - दंडायुधपाणि
प्रमुख देवता भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) हैं, शिव व पार्वती के पुत्र, जिनकी यहाँ दंडायुधपाणि - अर्थात दंड धारण करने वाले - रूप में पूजा होती है। अन्यत्र अपने राजसी योद्धा रूपों के विपरीत, यहाँ वे एक युवा संन्यासी रूप में विराजमान हैं, सरल कौपीन धारण किए, मुंडित सिर, समस्त सांसारिक वस्तुओं का त्याग किए। यह रूप सिखाता है कि सच्ची बुद्धि व दिव्यता बाहरी धन में नहीं, भीतरी वैराग्य में है।
स्थान - अरुपडै वीडु
मंदिर तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले की पलनी पहाड़ियों के शिखर पर स्थित है, जहाँ सीढ़ियों की चढ़ाई, घुमावदार मार्ग या रोपवे व फनिकुलर से पहुँचा जाता है। यह अरुपडै वीडु में से एक है, तमिलनाडु में मुरुगन के छह पवित्र धामों में, और इनमें सर्वाधिक दर्शनीय में से एक। पलनी लाखों तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है, जिनमें से अनेक मन्नत के रूप में अर्पण लेकर पहाड़ी चढ़ते हैं।
ज्ञान फल (जनान पऴम) की कथा
मंदिर ज्ञान फल (जनान पऴम) की कथा के लिए प्रसिद्ध है। ऋषि नारद ने एक बार शिव को एक दिव्य आम दिया, जो उनके दो पुत्रों में अधिक योग्य को दिया जाना था। शिव ने प्रतियोगिता रखी - जो पहले संसार की परिक्रमा करे वह जीतेगा। बड़े गणेश ने केवल अपने माता-पिता की परिक्रमा कर, उन्हें ही अपना समस्त संसार घोषित कर, फल जीत लिया। क्रुद्ध छोटे मुरुगन कैलास छोड़कर पलनी आ गए, सब कुछ त्यागकर, और यहाँ वे दंडायुधपाणि बने - स्वयं ही सच्ची बुद्धि के पऴम (फल), जिससे पहाड़ी को पऴम-नी (तुम ही फल हो) नाम मिला, जो बदलकर पलनी हुआ।
पंचामृत अभिषेकम

पलनी की मूर्ति विशिष्ट रूप से नवपाषाणम के मिश्रण से बनी है, जो सिद्ध ऋषि भोगर द्वारा बनाई नौ औषधीय-हर्बल वस्तुएँ कही जाती हैं। इसीलिए पंचामृत - दूध, दही, शहद, चंदन लेप व अन्य वस्तुओं - से अभिषेकम (अनुष्ठानिक स्नान) उपचारात्मक गुण ग्रहण करता माना जाता है। प्रसाद रूप में अर्पित स्नान-द्रव्य अपनी पवित्र व रोगहर शक्ति हेतु पूजनीय हैं, जो इस अभिषेकम को मंदिर के सबसे प्रिय अनुष्ठानों में बनाता है।
दर्शन और समय संबंधी सुझाव
मंदिर बहुत जल्दी, लगभग 5.30 बजे खुलता है, दिनभर अनेक दैनिक अभिषेकम व आरती होती हैं, रात्रि में बंद होने तक। आप पहाड़ी की सीढ़ियाँ चढ़ सकते, मार्ग ले सकते, या सरल चढ़ाई हेतु रोपवे/फनिकुलर उपयोग कर सकते हैं। अनेक भक्त मन्नत रूप में अपने केश (मोट्टै) अर्पित करते या कावडी ढोते हैं। सबसे अधिक भीड़ से बचने हेतु प्रातःकाल सप्ताह-दिवस का दर्शन चुनें, विशेषकर पर्व काल में।
मुरुगन मंत्र
भक्त प्रभु को उनके स्नेहमय नामों से पुकारते हैं:
ॐ शरवणभव
वेट्री वेल, वीर वेल जप और स्कंद षष्ठी कवचम भी मुरुगन के समक्ष गाए जाते हैं। भक्ति से हरो हरा और मुरुगा मुरुगा पुकारना, विशेषकर पहाड़ी चढ़ते समय, साहस, बुद्धि और सच्ची इच्छाओं की पूर्ति देता माना जाता है।
पलनी के पर्व

सबसे भव्य पर्व थाईपुसम है, तमिल मास थाई (जनवरी-फरवरी) में, जब लाखों भक्त मन्नत पूर्ति हेतु कावडी व दूध-कलश लेकर पलनी उमड़ते हैं। पंगुनी उत्तिरम, स्कंद षष्ठी और वैकासी विशाकम (मुरुगन का जन्म नक्षत्र) भी बड़े उत्साह से मनाए जाते हैं। इन समयों में पहाड़ी हरो हरा की पुकार और कावडी नृत्य की लय से गूँज उठती है।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
पलनी की देवता कौन हैं?+
देवता भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) हैं, जिनकी पूजा दंडायुधपाणि, अर्थात दंड धारण करने वाले रूप में होती है। यहाँ वे समस्त सांसारिक वस्तुओं का त्याग किए युवा संन्यासी रूप में विराजमान हैं।
ज्ञान फल की कथा क्या है?+
शिव ने उसे दिव्य आम दिया जो पहले संसार की परिक्रमा करे। गणेश ने माता-पिता की परिक्रमा कर उसे जीता। क्रुद्ध मुरुगन कैलास छोड़ पलनी आए, जहाँ वे दंडायुधपाणि बने, स्वयं ही सच्ची बुद्धि के पऴम (फल)।
पंचामृत अभिषेकम विशेष क्यों है?+
पलनी की मूर्ति सिद्ध ऋषि भोगर द्वारा बनाई नौ औषधीय-हर्बल वस्तुओं, नवपाषाणम से बनी है। पंचामृत अभिषेकम उपचारात्मक गुण ग्रहण करता माना जाता है, और स्नान-प्रसाद अपनी रोगहर शक्ति हेतु पूजनीय है।
अरुपडै वीडु क्या है?+
अरुपडै वीडु तमिलनाडु में भगवान मुरुगन के छह पवित्र धाम हैं। पलनी उनमें से एक और सर्वाधिक दर्शनीय में है, जो प्रतिवर्ष लाखों तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है।
दर्शन का सर्वोत्तम समय कब है?+
प्रातःकाल सप्ताह-दिवस का दर्शन सबसे अधिक भीड़ से बचाता है। थाईपुसम, पंगुनी उत्तिरम और स्कंद षष्ठी सबसे जीवंत किंतु अत्यधिक व्यस्त हैं। मंदिर लगभग 5.30 बजे खुलता है।
मुरुगन के लिए कौन सा मंत्र जपा जाता है?+
भक्त 'ॐ शरवणभव' का जप करते और 'हरो हरा' तथा 'वेट्री वेल, वीर वेल' पुकारते हैं। स्कंद षष्ठी कवचम भी बड़ी भक्ति से गाया जाता है, विशेषकर पहाड़ी चढ़ते समय।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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