देवी और उनका रूप
तुळजा भवानी देवी दुर्गा का उग्र किंतु वात्सल्यमय रूप हैं, जिनकी पूजा राक्षसों के संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक के रूप में होती है। उनकी मुख्य मूर्ति स्वयंभू ग्रेनाइट की है, जिसमें वे आठ भुजाओं में शस्त्र और महिषासुर राक्षस का कटा सिर धारण किए दर्शाई जाती हैं। वे अनगिनत मराठा परिवारों की कुलदेवी हैं और साहस, विजय व रक्षा हेतु उनका आह्वान किया जाता है।
स्थान - तुळजापुर
यह मंदिर महाराष्ट्र के उस्मानाबाद (धाराशिव) जिले के तुळजापुर में, बालाघाट पर्वतमाला की एक पहाड़ी पर स्थित है। यह शक्ति पीठों में से एक है और महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्ति पीठों में गिना जाता है। यह नगर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा है, निकटतम बड़ा रेल व वायु संपर्क सोलापुर है, और प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु इसकी सीढ़ियाँ चढ़ते हैं।
इतिहास और शिवाजी कथा
परंपरा के अनुसार, देवी ने ऋषि कर्दम के परिवार को सताने वाले कुकुर (मातंग) राक्षस का दमन करने हेतु प्रकट होकर भवानी रूप में तुळजापुर में निवास किया। यह मंदिर छत्रपति शिवाजी महाराज से अपने संबंध के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जिनका परिवार भवानी को अपनी कुलदेवी मानता था। माना जाता है कि देवी ने उन्हें प्रसिद्ध भवानी तलवार का आशीर्वाद दिया और स्वराज्य की स्थापना के उनके ध्येय का मार्गदर्शन किया, जिससे यह मंदिर मराठा शौर्य का प्रतीक बना।
मंदिर को क्या विशेष बनाता है

एक दुर्लभ विशेषता यह है कि मूर्ति चल है और इसे वर्ष में तीन बार अनुष्ठानिक निद्रा हेतु अपने स्थान से हटाया जाता है - घोरनिद्रा, श्रमनिद्रा और सुखनिद्रा - यह परंपरा बहुत कम मंदिरों में देखी जाती है। भक्तों को हल्दी (भंडारा) और लाल वस्त्र का प्रसाद भी मिलता है, जो योद्धा देवी के प्रतीक हैं। यहाँ का वातावरण उग्र शक्ति उपासना को अपनी कुलदेवी का सम्मान करने लौटे तीर्थयात्री परिवारों की गहरी भक्ति के साथ जोड़ता है।
दर्शन और समय संबंधी सुझाव
मंदिर सामान्यतः सुबह लगभग 5 बजे खुलता है, प्रातः व संध्या आरती होती है, और रात्रि की अंतिम आरती के बाद देर रात बंद होता है। मंगलवार, शुक्रवार और नवरात्रि काल की तुलना में सप्ताह के अन्य दिन व प्रातःकाल कहीं कम भीड़भाड़ वाले होते हैं। कम सामान साथ रखें, पंक्ति अनुशासन का पालन करें, और जूते व चमड़े की वस्तुएँ बाहर रखें, क्योंकि चढ़ाई और पर्वों की भीड़ कठिन हो सकती है।
भवानी मंत्र
भक्त देवी का आह्वान सरल, शक्तिशाली जप से करते हैं:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं भवान्यै नमः
अनेक लोग उनके समक्ष जय तुळजा भवानी और दुर्गा मंत्र व आरती भी पढ़ते हैं। स्वच्छ हृदय से जप, विशेषकर नवरात्रि में, साहस, रक्षा और कठिनाइयों पर विजय की शक्ति देता माना जाता है।
तुळजापुर के पर्व

सबसे भव्य उत्सव नवरात्रि है, जब देवी की नौ रात्रि पूजा होती है और लाखों भक्त तुळजापुर उमड़ते हैं। विजयादशमी (दशहरा) बुराई पर उनकी विजय का प्रतीक है और बड़े उत्साह से मनाया जाता है। अनुष्ठानिक निद्रा समारोह, गुड़ी पड़वा और चैत्र पूर्णिमा भी महत्वपूर्ण अवसर हैं जब मंदिर भक्ति व पारंपरिक उल्लास से जीवंत हो उठता है।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
तुळजा भवानी कौन हैं?+
तुळजा भवानी महाराष्ट्र के तुळजापुर में पूजित देवी दुर्गा का उग्र रूप हैं। वे शक्ति पीठ देवी और छत्रपति शिवाजी महाराज तथा अनेक मराठा परिवारों की कुलदेवी हैं।
मंदिर का शिवाजी से क्या संबंध है?+
भवानी शिवाजी महाराज की कुलदेवी थीं। परंपरा मानती है कि देवी ने उन्हें प्रसिद्ध भवानी तलवार का आशीर्वाद दिया और स्वराज्य स्थापना के उनके ध्येय का मार्गदर्शन किया, जिससे यह मंदिर मराठा शौर्य का प्रतीक बना।
तुळजा भवानी मंदिर कहाँ स्थित है?+
मंदिर महाराष्ट्र के उस्मानाबाद (धाराशिव) जिले के तुळजापुर में, बालाघाट पर्वतमाला की पहाड़ी पर स्थित है। निकटतम बड़ा रेल व वायु संपर्क सोलापुर है।
मूर्ति में क्या विशेष है?+
मूर्ति स्वयंभू ग्रेनाइट की है और चल है। इसे वर्ष में तीन बार अनुष्ठानिक निद्रा हेतु ले जाया जाता है - घोरनिद्रा, श्रमनिद्रा और सुखनिद्रा - यह दुर्लभ परंपरा बहुत कम मंदिरों में देखी जाती है।
दर्शन का सर्वोत्तम समय कब है?+
सप्ताह के दिनों में प्रातःकाल सबसे कम भीड़भाड़ वाला होता है। नवरात्रि और विजयादशमी सबसे जीवंत किंतु अत्यधिक व्यस्त हैं। मंदिर लगभग 5 बजे खुलता और अंतिम आरती के बाद देर रात बंद होता है।
तुळजा भवानी के लिए कौन सा मंत्र जपा जाता है?+
एक प्रचलित मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं भवान्यै नमः' है। अनेक भक्त जय तुळजा भवानी तथा दुर्गा मंत्र व आरती भी पढ़ते हैं, विशेषकर नवरात्रि में।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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