सावधान
समर्थ रामदास, जो नारायण सूर्याजीपंत ठोसर जन्मे, 1608 से 1681, महाराष्ट्र की रामदासी परंपरा के संस्थापक, दासबोध तथा मनाचे श्लोक के रचयिता, तथा ग्यारह मारुति मंदिरों के स्थापक हैं।
वे वारकरी नहीं। उन्हें पढ़ने के लिए यह महत्व रखता है।
वारकरी परंपरा पंढरपुर के विट्ठल पर, उस वार्षिक चलने पर, तथा अभंग पर केंद्रित है। रामदास राम तथा हनुमान पर, अनुशासन तथा सामर्थ्य पर, और गद्य शिक्षा पर केंद्रित हैं। दोनों परंपराएं महाराष्ट्र में साथ हैं और वे एक ही वस्तु नहीं।
उनका आरंभिक जीवन:
- जो अब जालना ज़िले में है वहां जांब में राम नवमी पर जन्मे
- पिता सूर्याजीपंत ठोसर, सूर्य के भक्त; माता राणूबाई
- बड़े भाई गंगाधर, जिन्हें श्रेष्ठ कहते हैं, जो स्वयं आध्यात्मिक आकृति थे
- उनके छोटे रहते उनके पिता चल बसे
- वे हर विवरण से कठिन बालक थे: सिमटे हुए, अकेले बैठने वाले, और पूछे जाने पर कि क्या कर रहे हैं, कहते थे कि वे संसार की चिंता कर रहे हैं
वह विवाह
उनकी माता ने, उनकी चिंता में, उनका विवाह तय किया। वे लगभग बारह के थे।
महाराष्ट्र के विवाह में क्या होता है: वर वधू के बीच वस्त्र रहता है, मंगलाष्टके पढ़े जाते हैं, और जिस क्षण वह वस्त्र गिराया जाना है पुरोहित सावधान पुकारते हैं।
सावधान का अर्थ है: सजग रहिए। सावधान रहिए। ध्यान दीजिए।
उन्होंने उसे अपने लिए कहा माना।
वे उस वस्त्र के नीचे से निकले और चलते गए, और चौबीस वर्ष घर नहीं लौटे।
इसे कैसे पढ़ें। ईमानदारी से, और वह स्पष्ट बात कहकर।
परंपरा उससे क्या लेती है: किसी साधारण शब्द को निर्देश की तरह सुनने का क्षण, और उस पर बिना मोल भाव के चलना।
वह यह भी है: बारह वर्ष के किसी बालक का मंडप में किसी वधू को छोड़ जाना, जो उस बालिका तथा उनके परिवार के लिए गंभीर बात थी, और वह कथा हमें नहीं बताती कि उनका क्या हुआ।
वह छिपाने के बजाय देखने योग्य है। उस परंपरा के आरंभ के क्षण में कोई और मूल्य चुकाता है, और विवरण उनके विषय में मौन हैं।
और स्थायी बात: बाल विवाह अब भारत में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 से निषिद्ध है, और चाइल्डलाइन 1098 सूचना लेती है।
वे कहां गए: नासिक के पास टाकळी, अर्थात नंदिनी तथा गोदावरी के संगम पर।
उन्होंने वहां बारह वर्ष क्या किया:
- भोर से पहले उठना
- नदी में खड़े होकर गायत्री का पाठ
- श्री राम जय राम जय जय राम का पाठ, अर्थात वह तेरह अक्षरों का मंत्र, जो तेरह करोड़ बार पूरा किया कहा जाता है
- रामायण तथा दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन
- पांच घरों से भिक्षा लेना
- थोड़ा सोना
फिर बारह वर्ष की यात्रा: पैदल, देश भर, काशी तक, हिमालय तक, श्रीशैलम तक, रामेश्वरम तक, नर्मदा तक, वह देखते हुए जो उन्होंने बाद में लिखा।
वे इससे लगभग छत्तीस पर निकले, और उन्होंने जो बनाया वह सब उसके बाद आया।
दासबोध
वह क्या है: उनकी प्रमुख रचना, तथा मराठी की दो तीन सर्वाधिक पढ़ी पुस्तकों में एक।
उसकी बनावट, जो असामान्य रूप से व्यवस्थित है:
- बीस दशक
- हर दशक में दस समास, अर्थात भाग
- अर्थात दो सौ अध्याय
- लगभग 7,751 ओवी
वह कैसे बना: उन्होंने उसे बोला और उनके शिष्य कल्याण स्वामी ने लिखा, शिवथर घळ में, जिसे सुंदर मठ भी कहते हैं, अर्थात रायगढ़ ज़िले में किसी घाटी की गुफा में, किसी जलप्रपात के पीछे।
वह किन विषयों को लेता है। यही वस्तु उसे भिन्न बनाती है।
दासबोध एक मार्गदर्शिका है, और वह मुक्ति जितनी ही चिंता संसार में सामर्थ्य की करता है।
भाग इन पर हैं:
- वेदांत: माया, ब्रह्म, आत्म, विवेक, वाणी के चार प्रकार
- भक्ति: भक्ति के नौ रूप, क्रम से लिए गए
- गुरु तथा किसी को कैसे पहचानें
- प्रपंच तथा परमार्थ: सांसारिक जीवन तथा परम, और उनका यह आग्रह कि आपको पहले में सक्षम होना ही चाहिए
- सार्वजनिक रूप से कैसे बोलें
- स्पष्ट तथा सुपाठ्य कैसे लिखें
- लोगों को कैसे संगठित करें
- किसी मूर्ख को कैसे पहचानें, विस्तार से तथा आनंद से
- कोई मठ कैसे चलाएं
- किसी कार्यकर्ता का आचरण
- स्वच्छता, समय पालन, पूरापन
मूर्ख पर वह समास प्रसिद्ध है। वे दर्जनों पंक्तियों में मूर्ख के चिह्न गिनाते हैं: जो बिना जाने बोलता है, जो कोई बात नहीं रख सकता, जो अपने परिवार की उपेक्षा करके उसे वैराग्य कहता है, जो उधार लेकर नहीं चुकाता, जो देर करता है, जो काम आधा छोड़ता है, जो सबसे झगड़ता है, जो बुरा मान जाता है।
और सक्षम व्यक्ति पर उससे जुड़ा समास, अर्थात उत्तम पुरुष, उसका उलटा गिनाता है।
वह पुस्तक क्यों प्रयोग होती है। उसी जोड़ के कारण।
वह भक्ति का पाठ है जो ऐसे व्यक्ति ने लिखा जिन्होंने बारह वर्ष किसी नदी में कोई मंत्र पढ़ा, और उसमें लिखावट पर निर्देश हैं।
उनका केंद्रीय सूत्र: प्रपंची असावे साधक, परमार्थी असावे साधक। सांसारिक जीवन में सक्षम होइए, परम में सक्षम होइए। वे स्पष्ट हैं कि जो व्यक्ति अपनी गृहस्थी तथा काम नहीं संभाल सकता उसे वैराग्य का दावा करने का कोई अधिकार नहीं, और कि वैराग्य के वेश में उपेक्षा उपेक्षा ही है।
उसे पढ़ना: वह लंबा है, पर उसकी बनावट उसका प्रयोग सरल बनाती है।
- एक बार में एक समास पढ़िए। वे छोटे हैं
- मूर्ख तथा सक्षम व्यक्ति पर दशक 2 के समास मानक आरंभ बिंदु हैं
- दशक 12, विवेक पर, दार्शनिक केंद्र है
- आधुनिक भावार्थ सहित मराठी संस्करण सर्वत्र हैं, और अंग्रेज़ी तथा हिंदी अनुवाद हैं
- वह ऑडियो के रूप में भी व्यापक रूप से उपलब्ध है
मनाचे श्लोक
यही वह है जो हर मराठी बालक जानता है।
वह क्या है: 205 पद, भुजंगप्रयात छंद में, हर एक सीधे मना को संबोधित, अर्थात मन को, संबोधन में।
मना सज्जना, अर्थात भले मन। मना तूचि, अर्थात तू, मन। वे दो सौ पांच पदों तक अपने ही मन से बात करते हैं और उसे निर्देश देते हैं।
आरंभ गणेश तथा शारदा का स्मरण करता है, और फिर मन को संबोधन आरंभ होता है तथा रुकता नहीं।
वह क्या कहता है। छोटे, सीधे निर्देश, एक पद में एक विषय:
- किसी का बुरा मत सोचिए
- कठोर मत बोलिए, क्योंकि कठोर वचन किसी प्रहार से अधिक देर याद रहता है
- ईर्ष्या मत कीजिए
- मृत्यु निश्चित है तथा दूर नहीं, इसलिए ऐसे मत बरतिए मानो असीम समय है
- सज्जनों का संग रखिए
- राम का नाम लीजिए
- किसी और के धन अथवा किसी और के जीवनसाथी की चाह मत रखिए
- क्रोध उसी को नष्ट करता है जो उसे पकड़े है
- देह पर गर्व मत कीजिए, जो समाप्त होगी
- वह कीजिए जो आपने कहा कि करेंगे
सर्वाधिक प्रसिद्ध में एक: वे मन से कहते हैं कि कठोर वचन किसी शस्त्र से अधिक घाव करता है, और कि वाणी का किया घाव भरता नहीं।
एक और: वे मन से कहते हैं कि विचारिए कि कितने चल बसे और उनमें हर एक ने कितने विश्वास से यह अपेक्षा की थी कि वे नहीं जाएंगे।
वह इतना व्यापक रूप से क्यों प्रयोग होता है
- वह छोटा है। 205 पद, और पूरा पाठ लगभग आधा घंटा लेता है
- वह छंद सरल है और बालक उसे सुनकर सीख जाते हैं
- वह मराठी विद्यालयों में, घरों में, श्रावण मास में, और बहुत से लोगों से प्रतिदिन पढ़ा जाता है
- उसे कोई दीक्षा, कोई कर्म तथा कोई सामग्री नहीं चाहिए
- और उसकी सामग्री आचरण है, सिद्धांत नहीं, इसलिए उसमें कुछ भी तत्त्व मीमांसा पर सहमति नहीं मांगता
व्यावहारिक बात: मनाचे श्लोक प्रतिदिन पढ़ना महाराष्ट्र के सर्वाधिक सामान्य भक्ति अभ्यासों में एक है, और ऑडियो, मराठी भावार्थ सहित छपे पाठ, तथा हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवाद स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं।
उनकी अन्य रचनाएं:
- करुणाष्टके, ग्यारह विनती के स्तोत्र, जो उनकी शेष रचनाओं की तुलना में असामान्य रूप से भावुक हैं
- आत्माराम, छोटी वेदांत रचना
- आनंदवनभुवनी, आनंद से भरी किसी भूमि पर कविता, जिसे राजनीतिक रूप से पढ़ा गया है
- मनपंचक, पंचसमासी, चतुर्थमान
- मराठी में सुंदरकांड तथा अन्य रामायण सामग्री
- अभंगों तथा श्लोकों का बड़ा भंडार
- पत्र
ग्यारह मारुति, तथा शिवाजी वाला प्रश्न

ग्यारह मारुति
लगभग 1644 से 1654 के बीच उन्होंने महाराष्ट्र के सातारा तथा कराड क्षेत्र में ग्यारह हनुमान मंदिर स्थापित किए।
हनुमान क्यों। हनुमान जो हैं उसके कारण: सेवा में बल, बिना स्वार्थ के सामर्थ्य, ऐसी भक्ति जो शारीरिक रूप से समर्थ भी है।
रामदास का पूरा ज़ोर सामर्थ्य पर है। जो भक्त कुछ कर नहीं सकता वह उनके किसी काम का नहीं, और हनुमान वह आकृति हैं जो पूरी तरह भक्त तथा पूरी तरह प्रभावी दोनों हैं।
वे ग्यारह, अर्थात अकरा मारुति, यहां हैं: शहापुर, मसूर, चाफळ (दो, दास मारुति तथा वीर मारुति), शिंगणवाडी, उंब्रज, माजगांव, मानपाडळे, पारगांव, शिराळा तथा बाहे बोरगांव।
चाफळ प्रमुख केंद्र है, जहां उनका बनाया राम मंदिर है।
उन्होंने मठ भी स्थापित किए, अर्थात शिक्षा केंद्र, महाराष्ट्र भर तथा उससे आगे, और शिष्यों का जाल बनाया, जिनमें कल्याण स्वामी, उद्धव स्वामी, वेणाबाई तथा अक्काबाई सर्वाधिक जाने हैं। उन चारों में दो स्त्रियां हैं, जो सत्रहवीं शताब्दी के किसी मठ क्रम के लिए देखने योग्य है।
शिवाजी वाला प्रश्न
परंपरा क्या मानती है: कि छत्रपति शिवाजी महाराज रामदास के शिष्य थे, कि रामदास ने उन्हें मार्ग दिखाया, कि शिवाजी ने उन्हें अपना राज्य अर्पित किया और उनसे कहा गया कि उसे धरोहर मानकर चलाएं, और कि सज्जनगढ़ उन्हें शिवाजी ने दिया।
इतिहासकार क्या कहते हैं: यह विवादित है, और वह विवाद बनाया हुआ नहीं बल्कि वास्तविक है।
ईमानदार स्थिति, सीधे कही गई:
- वे दोनों उसी क्षेत्र में समकालीन थे, और इसमें संदेह नहीं कि वे एक दूसरे के विषय में जानते थे
- सज्जनगढ़ शिवाजी के शासन काल में रामदास को उपलब्ध कराया गया, और यह प्रश्न में नहीं
- यह दावा कि शिवाजी उनके दीक्षित शिष्य थे मुख्यतः बाद के स्रोतों पर टिका है, विशेषकर उन बखरों तथा संत कथाओं पर जो दोनों के जाने के बाद लिखी गईं, और उन लेखों पर जिनकी असलियत विवादित है
- शिवाजी के अपने समकालीन अभिलेख अन्य आकृतियों को तथा उनकी माता जिजाबाई को कहीं अधिक स्थान देते हैं
- अनेक इतिहासकार मानते हैं कि गुरु तथा शिष्य के उस संबंध पर उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी में भारी ज़ोर उस काल की राजनीति से जुड़े कारणों से दिया गया
- अन्य मानते हैं कि आदर का कोई वास्तविक संबंध था, उसकी विधिवत स्थिति जो भी हो
यह ऐप क्या कहेगा: वे दोनों समकालीन थे, सज्जनगढ़ शिवाजी के समय रामदास को मिला, परंपरा गुरु का संबंध मानती है, और विधिवत शिष्यत्व का ऐतिहासिक प्रमाण कमज़ोर तथा विवादित है। जो कोई दोनों में से किसी छोर को तय तथ्य बताए वह उस प्रमाण से आगे जा रहा है।
और उससे जुड़ी एक बात: रामदास कभी कभी आज की राजनीतिक बहस में खींचे जाते हैं। उनका वास्तविक लेखन आचरण, वाणी, संगठन तथा भक्ति पर मार्गदर्शिका है। पाठकों के लिए दासबोध का मूर्ख पहचानने वाला समास किसी के भी इन दावों से बेहतर है कि वे वर्तमान पर क्या सोचते।
सज्जनगढ़
- सातारा के पास पहाड़ी किला, जो पहले परळी था
- रामदास ने अपने अंतिम वर्ष वहां बिताए
- उन्होंने वहां 1681 में माघ कृष्ण नवमी को समाधि ली, जो दासनवमी के रूप में मनाई जाती है
- समाधि मंदिर तथा राम मंदिर प्रमुख स्थान हैं
- वह छोटी चढ़ाई है और वहां बहुत बड़ी संख्या आती है, विशेषकर दासनवमी पर
- शिवथर घळ, जहां दासबोध बोला गया, रायगढ़ ज़िले में अलग स्थल है, किसी घाटी में किसी जलप्रपात के पीछे, और वह वर्षा में जाने योग्य है
उनका प्रयोग
उनसे जुड़े अभ्यास असामान्य रूप से ठोस हैं।
एक। मनाचे श्लोक।
205 पद, आधा घंटा, कोई दीक्षा नहीं चाहिए। महाराष्ट्र में बहुत बड़ी संख्या में लोग प्रतिदिन पढ़ते हैं, विशेषकर श्रावण में।
आप इस प्रविष्टि से एक वस्तु लें, तो यह लीजिए। वह भावार्थ सहित मराठी में, हिंदी तथा अंग्रेज़ी अनुवाद में, और ऑडियो के रूप में उपलब्ध है, और हर दिन तय संख्या में पद पढ़ने तथा चक्र पूरा करने का सामान्य अभ्यास है।
दो। श्री राम जय राम जय जय राम।
वह तेरह अक्षरों का मंत्र जो उन्होंने टाकळी में पढ़ा। उसे कुछ नहीं चाहिए, वह किसी भी लय में बैठता है, और वह मानक रामदासी अभ्यास है।
तीन। दासबोध, एक बार में एक समास।
दशक 2 में मूर्ख तथा उत्तम पुरुष पर समासों से आरंभ कीजिए। वे व्यवहारों की सूचियां हैं और वे ठीक ढंग से असहज पठन हैं।
चार। शनिवार को हनुमान, किसी भी मारुति मंदिर में, और आप सातारा क्षेत्र में हों तो वे ग्यारह मारुति।
पांच। उनका वास्तविक निर्देश, जो उपयोगी भाग है।
प्रपंची असावे साधक, परमार्थी असावे साधक। सांसारिक जीवन में सक्षम होइए तथा परम में सक्षम। स्वयं दासबोध से उसका व्यवहार में अर्थ:
- जो आरंभ किया वह पूरा कीजिए। आधा किया काम उनकी सर्वाधिक दोहराई शिकायत है
- समय पर रहिए
- सुपाठ्य लिखिए तथा अपने कागज़ क्रम में रखिए। लिखावट पर पूरा एक समास है
- अच्छा बोलिए: तैयारी कीजिए, संक्षेप में कहिए, सुनाई दीजिए, उस पर मत बोलिए जो आप नहीं जानते
- अपने परिवार की उपेक्षा करके उसे वैराग्य मत कहिए। वे इस पर स्पष्ट तथा बार बार हैं
- अपना आसपास स्वच्छ रखिए
- वह उधार मत लीजिए जो आप चुका नहीं सकते
- सरलता से बुरा मत मानिए
छह। और वह सावधानी।
रामदास ने कोई क्रम स्थापित किया तथा उसे कैसे संगठित करें इस पर लिखा, इसलिए मानक चेतावनियां उन पर भी वैसे ही लगती हैं जैसे किसी पर:
जो गुरु अथवा संस्था आशीर्वाद के लिए धन मांगे, आपको आपके परिवार से अलग करे, गोपनीयता मांगे, आपके परिणामों पर विशेष अधिकार का दावा करे, अथवा स्त्रियों या छोटों के प्रति ऐसे बरते जो सीधे बताए जाने पर न टिके, वह विफल है। दासबोध में स्वयं रामदास की कसौटियां उससे कड़ी हैं, और वे उनसे बताते हैं कि सद्गुरु क्या है और क्या नहीं।
इस प्रविष्टि से दैनिक अभ्यास:
- श्री राम जय राम जय जय राम
- मनाचे श्लोक का कोई भाग, प्रतिदिन, बढ़ाते हुए
- दासबोध का एक समास, साप्ताहिक
- दासनवमी पर, माघ कृष्ण नवमी, उनका समाधि दिवस
अंत में एक बात
बारह वर्ष के किसी बालक ने किसी पुरोहित को वह शब्द कहते सुना जिसका अर्थ है ध्यान दीजिए, और वे अपने ही विवाह से निकल गए, और अगले बारह वर्ष किसी नदी में खड़े होकर वही तेरह अक्षर बार बार कहते बिताए।
जब वे अंततः संसार में लौटे, तब उन्होंने जो लिखा वह दो सौ अध्यायों की पुस्तक थी, और उनमें एक लिखावट पर है, और एक उन बातों की सूची है जो कोई मूर्ख करता है, और उन सबमें बार बार आने वाला निर्देश यह है: जो आरंभ किया वह पूरा कीजिए, और अपनी उपेक्षा को वैराग्य मत कहिए।
संक्षिप्त रूप
कौन: समर्थ रामदास, जो नारायण ठोसर जन्मे, 1608 से 1681, जालना ज़िले के जांब के, रामदासी परंपरा के संस्थापक। वे वारकरी नहीं: उनका ध्यान विट्ठल तथा उस वार्षिक चलने के बजाय राम और हनुमान, अनुशासन तथा सामर्थ्य पर है।
वह विवाह: लगभग बारह की आयु में, पुरोहित को सावधान पुकारते सुनकर, उन्होंने उसे अपने लिए कहा माना, मंडप छोड़ा, और चौबीस वर्ष घर नहीं लौटे।
टाकळी: नंदिनी तथा गोदावरी के संगम पर बारह वर्ष, श्री राम जय राम जय जय राम का पाठ करते, जो तेरह करोड़ बार पूरा किया कहा जाता है, उसके बाद देश भर पैदल बारह वर्ष की यात्रा।
दासबोध: बीस दशक, हर एक में दस समास, दो सौ अध्याय, लगभग 7,751 ओवी, जो उन्होंने बोले तथा कल्याण स्वामी ने शिवथर घळ में लिखे। वह वेदांत तथा भक्ति के साथ साथ सार्वजनिक भाषण, सुपाठ्य लिखावट, संगठन, तथा मूर्ख के चिह्नों की प्रसिद्ध सूची लेता है।
मनाचे श्लोक: अपने ही मन को संबोधित 205 पद, छोटे, सरल, जो महाराष्ट्र भर प्रतिदिन पढ़े जाते हैं और जिन्हें बालक सुनकर सीखते हैं।
उनका सूत्र: सांसारिक जीवन में सक्षम होइए तथा परम में सक्षम। वैराग्य के वेश में उपेक्षा उपेक्षा ही है।
ग्यारह मारुति: लगभग 1644 से 1654 के बीच सातारा तथा कराड क्षेत्र में स्थापित हनुमान मंदिर, जिनमें चाफळ प्रमुख केंद्र है।
शिवाजी वाला प्रश्न: वे दोनों समकालीन थे, सज्जनगढ़ शिवाजी के समय रामदास को मिला, परंपरा गुरु का संबंध मानती है, और विधिवत शिष्यत्व का ऐतिहासिक प्रमाण बाद के तथा विवादित स्रोतों पर टिका है। जो कोई दोनों में से किसी छोर को तय तथ्य बताए वह उस प्रमाण से आगे जा रहा है।
उनका अंत: 1681 में सातारा के पास सज्जनगढ़ में, माघ कृष्ण नवमी को, जो दासनवमी के रूप में मनाई जाती है।
क्या रखें: जो आरंभ किया वह पूरा कीजिए, और अपनी उपेक्षा को वैराग्य मत कहिए।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
समर्थ रामदास कौन थे?+
जालना ज़िले के जांब में नारायण ठोसर जन्मे, 1608 से 1681, उन्होंने महाराष्ट्र की रामदासी परंपरा की स्थापना की, दासबोध तथा मनाचे श्लोक लिखे, और सातारा तथा कराड क्षेत्र में ग्यारह मारुति मंदिर स्थापित किए। वे वारकरी नहीं: उनका ध्यान पंढरपुर के विट्ठल तथा उस वार्षिक वारी के बजाय राम और हनुमान, अनुशासन तथा सामर्थ्य पर है। उन्होंने अपने अंतिम वर्ष सातारा के पास सज्जनगढ़ में बिताए, जहां उन्होंने 1681 में समाधि ली।
रामदास अपने विवाह से क्यों भागे?+
महाराष्ट्र के विवाह में वर वधू के बीच वस्त्र रहता है, और जिस क्षण वह गिराया जाना है पुरोहित सावधान पुकारते हैं, जिसका अर्थ है सजग रहिए अथवा ध्यान दीजिए। रामदास ने, लगभग बारह वर्ष की आयु में, उस शब्द को अपने लिए कहा माना, वे उस वस्त्र के नीचे से निकले, और चौबीस वर्ष घर नहीं लौटे। वह कथा उस परंपरा के आरंभ का क्षण है, यद्यपि यह देखने योग्य है कि उस वधू ने वास्तविक मूल्य चुकाया और विवरण इस पर मौन हैं कि उनका क्या हुआ।
दासबोध क्या है?+
रामदास की प्रमुख रचना: बीस दशक, हर एक में दस समास, अर्थात दो सौ अध्याय, लगभग 7,751 ओवी, जो उन्होंने बोले तथा उनके शिष्य कल्याण स्वामी ने रायगढ़ ज़िले के शिवथर घळ में लिखे। उसे उसका विस्तार भिन्न बनाता है। वेदांत तथा भक्ति के नौ रूपों के साथ साथ वह सार्वजनिक भाषण, सुपाठ्य लिखावट, लोगों को संगठित करना, कोई मठ चलाना, किसी कार्यकर्ता का आचरण, तथा मूर्ख के चिह्नों की प्रसिद्ध और आनंद देने वाली सूची लेता है।
मनाचे श्लोक क्या हैं?+
भुजंगप्रयात छंद में 205 पद, हर एक सीधे उनके अपने मन को संबोधित, मना को। वे एक बार में एक विषय पर छोटे सीधे निर्देश देते हैं: किसी का बुरा मत सोचिए, कठोर मत बोलिए क्योंकि कठोर वचन किसी शस्त्र से अधिक घाव करता है और भरता नहीं, ईर्ष्या मत कीजिए, मृत्यु निश्चित है तथा दूर नहीं, सज्जनों का संग रखिए, राम का नाम लीजिए, वह कीजिए जो आपने कहा कि करेंगे। पूरा पाठ लगभग आधा घंटा लेता है, कोई दीक्षा नहीं चाहिए, और मराठी बालक उन्हें सुनकर सीखते हैं।
क्या शिवाजी सचमुच रामदास के शिष्य थे?+
यह वस्तुतः विवादित है। वे दोनों उसी क्षेत्र में समकालीन थे और निश्चित रूप से एक दूसरे के विषय में जानते थे, और सज्जनगढ़ शिवाजी के शासन काल में रामदास को उपलब्ध कराया गया, जो प्रश्न में नहीं। पर विधिवत दीक्षित शिष्यत्व का दावा मुख्यतः उन बाद की बखरों तथा संत कथाओं पर टिका है जो दोनों के जाने के बाद लिखी गईं, और उन लेखों पर जिनकी असलियत विवादित है, जबकि शिवाजी के अपने समकालीन अभिलेख अन्य आकृतियों को तथा उनकी माता जिजाबाई को अधिक स्थान देते हैं। अनेक इतिहासकार मानते हैं कि उस संबंध पर उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी में राजनीतिक कारणों से भारी ज़ोर दिया गया। जो कोई दोनों में से किसी छोर को तय तथ्य बताए वह उस प्रमाण से आगे जा रहा है।
ग्यारह मारुति क्या हैं?+
ग्यारह हनुमान मंदिर जो रामदास ने लगभग 1644 से 1654 के बीच महाराष्ट्र के सातारा तथा कराड क्षेत्र में स्थापित किए, शहापुर, मसूर, चाफळ में, जहां दो हैं, शिंगणवाडी, उंब्रज, माजगांव, मानपाडळे, पारगांव, शिराळा तथा बाहे बोरगांव में। उन्होंने हनुमान इसलिए चुने क्योंकि उनका पूरा ज़ोर सामर्थ्य पर है: जो भक्त कुछ कर नहीं सकता वह किसी काम का नहीं, और हनुमान वह आकृति हैं जो पूरी तरह भक्त तथा पूरी तरह प्रभावी दोनों हैं। चाफळ प्रमुख केंद्र है, जहां उनका बनाया राम मंदिर है।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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