मुंडन संस्कार क्या है
मुंडन, परंपरागत रूप से चूड़ाकरण कहलाता, शिशु के पहले केश (गर्भ में उगे केश) हटाने का संस्कार है। यह सोलह संस्कारों में से एक है और शिशु के जीवन का एक महत्वपूर्ण आरंभिक पड़ाव अंकित करता है। जन्म के केश प्रतीकात्मक समर्पण रूप में अर्पित किए जाते हैं, और बाद में उगने वाले नए केश स्वास्थ्य व शक्ति के नए आरंभ रूप में देखे जाते हैं। यह बालक व बालिका दोनों के लिए किया जाता है।
मुंडन का महत्व
मुंडन गर्भ और पूर्व जन्मों से लाई अशुद्धियों व नकारात्मकता को हटाकर शिशु को नए आरंभ हेतु शुद्ध करता माना जाता है। जन्म के केश हटाना खोपड़ी को स्वस्थ रखने और नए, मजबूत केश उगने में सहायक भी समझा जाता है। आध्यात्मिक रूप से यह त्याग (छोड़ना) और कृतज्ञता का कर्म है, शिशु के पहले केश दिव्य या पवित्र नदी को अर्पित करते हुए। सबसे बढ़कर, यह शिशु की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य व उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना है।
मुंडन की सही आयु
मुंडन परंपरागत रूप से शिशु के जीवन के विषम वर्ष में किया जाता है - सबसे सामान्यतः पहले या तीसरे वर्ष पूर्ण होने पर, और कभी पाँचवें या सातवें। सम संख्या की आयु प्रथा अनुसार प्रायः टाली जाती है। अनेक परिवार तब तक प्रतीक्षा करते हैं जब शिशु शांति से बैठने योग्य सशक्त हो। कुछ इसे कुलदेवता के प्रति मनौती रूप में पहले करते हैं। आयु जो भी हो, शिशु की सुविधा व स्वास्थ्य सदा प्रथम होने चाहिए।
यह कहाँ होता है और मुहूर्त

मुंडन प्रायः घर पर किया जाता है, पर अनेक परिवार इसे मंदिर या पवित्र मुंडन स्थल पर करने की मनौती लेते हैं - जैसे कुलदेवी या कुलदेवता मंदिर, तिरुपति, वैष्णो देवी, या किसी पवित्र नदी के तट - जहाँ केश अर्पित किए जाते हैं। मुहूर्त पंचांग अनुसार चुना जाता है, तिथि, नक्षत्र व दिन विचारकर, अशुभ कालों से बचते हुए। अपने शिशु हेतु सही तिथि व समय के लिए यादृच्छिक दिन तय करने के बजाय वंदना पंचांग देखें।
चरण-दर-चरण विधि
एक सरल पारंपरिक विधि: 1. शिशु को स्नान कराएँ और नए या स्वच्छ वस्त्र पहनाएँ; परिवार एकत्र होता है। 2. गणेश पूजा करें और शिशु के कल्याण हेतु कुलदेवता का आह्वान करें। 3. छोटा हवन प्रज्वलित होने पर पुरोहित मंत्रोच्चार करते हैं। 4. मामा या पिता शिशु को कोमलता से पकड़ते हैं जबकि बुजुर्ग द्वारा पहली लट काटी जाती है, फिर नाई सावधानी से सिर मूँडता है। 5. मूँडे सिर को धोया जाता है और खोपड़ी को शांत करने हेतु चंदन या हल्दी का लेप लगाया जा सकता है। 6. केश एकत्र कर देवता, पवित्र नदी को अर्पित या सम्मानपूर्वक दबाए जाते हैं, फिर आरती व भोज होता है।
सामग्री और तैयार रखने योग्य वस्तुएँ
तैयार रखें: जल भरा कलश, आम-पत्र, नारियल, रोली, चावल (अक्षत), पुष्प, घी व हवन सामग्री, शिशु के नए वस्त्र, मिठाई, और स्वच्छ उस्तरा या विश्वसनीय नाई। चंदन का लेप, हल्दी या हल्का एंटीसेप्टिक बाद में खोपड़ी को शांत करने में सहायक है। समारोह से पहले शिशु को खिला व विश्राम दिला दें, और कोई प्रिय खिलौना या आराम-वस्तु पास रखें ताकि नन्हा बच्चा पूरे समय शांत रहे।
करें और न करें

करें: विषम वर्ष और पंचांग अनुसार मुहूर्त चुनें, शिशु को खिला व शांत रखें, स्वच्छ उपकरण प्रयोग करें, और खोपड़ी कोमलता से संभालें। न करें: भयभीत या अस्वस्थ शिशु को बाध्य न करें, अशुभ दिन पर न करें, तेज़ ब्लेड लापरवाही से न प्रयोग करें, या ताज़े मूँडे सिर को तुरंत तेज़ धूप या ठंड में न रखें। शिशु की सुरक्षा व सुविधा सदा अनुष्ठान की पूर्णता से पहले आती हैं।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
मुंडन संस्कार क्या है?+
मुंडन, जिसे चूड़ाकरण भी कहते हैं, शिशु के गर्भ में उगे पहले केश हटाने का संस्कार है। यह सोलह संस्कारों में से एक है और शिशु को शुद्ध कर स्वास्थ्य का आशीर्वाद देता माना जाता है।
मुंडन किस आयु में किया जाता है?+
मुंडन परंपरागत रूप से विषम वर्ष में किया जाता है, सबसे सामान्यतः पहले या तीसरे वर्ष पूर्ण होने पर, और कभी पाँचवें या सातवें। सम संख्या की आयु प्रायः टाली जाती है।
मुंडन कहाँ किया जा सकता है?+
यह घर पर किया जा सकता है, पर अनेक परिवार इसे मंदिर या पवित्र मुंडन स्थल पर करने की मनौती लेते हैं, जैसे कुलदेवता मंदिर, तिरुपति, वैष्णो देवी, या पवित्र नदी-तट जहाँ केश अर्पित होते हैं।
मुंडन मुहूर्त कैसे तय होता है?+
मुहूर्त पंचांग अनुसार चुना जाता है, तिथि, नक्षत्र व दिन विचारकर, अशुभ कालों से बचते हुए। सही तिथि व समय हेतु यादृच्छिक दिन तय करने के बजाय वंदना पंचांग देखें।
क्या मुंडन बालक व बालिका दोनों के लिए होता है?+
हाँ। यद्यपि प्रथाएँ क्षेत्र व परिवार अनुसार भिन्न हैं, मुंडन परंपरागत रूप से बालक व बालिका दोनों के लिए शुद्धिकारक पहले-केश संस्कार और शिशु के स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्रार्थना रूप में किया जाता है।
मुंडन के बाद केशों का क्या किया जाता है?+
एकत्र केश कुलदेवता को अर्पित किए जाते, पवित्र नदी में प्रवाहित किए जाते, या सम्मानपूर्वक दबाए जाते हैं। इसे प्रतीकात्मक समर्पण और शिशु के कल्याण हेतु कृतज्ञता का भाव माना जाता है।
About the author
Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies
Anjali is the managing editor for Vandnaa and oversees the festival and vrat coverage. She holds an M.A. in Religious Studies and reviews every published article for accuracy, accessibility, and tradition-fidelity.
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